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इंडियन नेवी 'त्रिशक्ति' मोर्चे पर तैनात, समुद्र में ताकत तीन गुना बढ़ जाएगी

Indian Navy ने अपनी ताकत में तीन लेवल का इजाफा किया है. इंडियन नेवी में 21 जून को तीन नए जंगी जहाज INS Dunagiri, INS Agray और INS Sanshodhak शामिल हुए हैं. इन तीन जहाजों की अलग-अलग खासियत और रोल है.

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21 जून 2026 (पब्लिश्ड: 08:56 PM IST)
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इंडियन नेवी में शामिल हुए 3 जहाज (PHOTO-PIB)
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समंदर यानी धरती का वो हिस्सा जिस पर कब्जा हुआ तो पूरी दुनिया पर कंट्रोल किया जा सकता है. अंग्रेजों ने एक वक्त पर आधी से ज्यादा दुनिया पर राज किया और इस काम में सबसे ज्यादा काम आई उनकी नेवी यानी नौसेना. आज के जमाने में भी जिसकी नेवी मजबूत है, वो देश दुनिया का व्यापार कंट्रोल करता है. उदाहरण के लिए होर्मुज को ही देख लें. ईरान समंदर के इस हिस्से पर कब्जा होने की वजह से ही पूरी दुनिया का तेल व्यापार ठप करने में सफल रहा. 

ऐसे में ये बात साफ है कि अगर अपना दबदबा बनाए रखना है तो नेवी मजबूत होनी चाहिए. इसी कड़ी में इंडियन नेवी ने अपनी समुद्री ताकत में तीन लेवल का इजाफा किया है. इंडियन नेवी में 21 जून को तीन नए जंगी जहाज आईएनएस दूनागिरी (INS Dunagiri), आईएनएस अग्रय (INS Agray) और आईएनएस संशोधक (INS Sanshodhak) शामिल हुए हैं. इन तीन जहाजों की न सिर्फ खासियत अलग-अलग है बल्कि इनकी भूमिका भी एक दूसरे से अलग है. 

इन तीनों जहाजों में से एक INS दूनागिरी एक फायरपावर यानी हमलावर जहाज है. INS अग्रय शिकारी जहाज है जो समंदर के अंदर घूम रही खामोश सबमरीन्स को ढूंढकर निशाना बनाता है. और तीसरा जहाज INS संशोधक है जो एक सर्वे करने वाला जहाज है. 

आइए, समझते हैं कि इन जहाजों की क्या खासियत है और कैसे ये नेवी की ताकत में इजाफा करेंगे.

INS दूनागिरी

दूनागिरी का नाम उत्तराखंड में एक पहाड़ी के नाम पर रखा गया है. ये एक स्टेल्थ फ्रिगेट है जिसे नेवी के प्रोजेक्ट 17-A के तहत बनाया गया है. नीलगिरी-क्लास के इस फ्रिगेट को कोलकाता की कंपनी गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (GRSE) ने बनाया है. नेवी जहाजों में क्लास का मतलब है कि उस कैटेगरी का जो जहाज सबसे पहले बना होगा. उसी के प्लेटफॉर्म और बेसिक्स का इस्तेमाल करते हुए आगे और जहाज बनाए जाते हैं. नीलगिरी इस कैटेगरी का पहला जहाज था, इसीलिए दूनागिरी को ‘नीलगिरी क्लास फ्रिगेट’ कहा जाता है. ये फ्रिगेट क्या होते हैं, अब ये भी समझ लेते हैं.

दूनागिरी में ब्रह्मोस सरफेस-टू-सरफेस मिसाइल (जमीन से जमीन पर) और मीडियम-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (MRSAM) सिस्टम जैसे हथियार लगे हैं. साथ ही, इसमें मल्टी-फंक्शन सर्विलांस, ट्रैक एंड गाइडेंस रडार (MFSTAR), उन्नत सोनार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और एंटी-सबमरीन हथियार जैसे सेंसर भी शामिल हैं.

इसमें एक खास सिस्टम लगा है जिसे कंट्रोलेबल पिच प्रोपेलर कहते हैं. माने इसमें जो प्रोपेलर (वो पंखी जो जहाज को आगे बढ़ाती है) लगा है, उसका हर ब्लेड अलग तरीके से घूम सकता है. इससे जहाज को तुरंत दिशा बदलने में मदद मिलती है. 6600 टन डिस्प्लेसमेंट और 149 मीटर लंबे इस जहाज की रफ्तार 28 नॉट्स यानी 51 किलोमीटर प्रति घंटा है. खास बात ये है कि इसमें 75% से अधिक स्वदेशी कंपोनेंट्स लगे हैं जो भारत में नेवल सिस्टम्स के बढ़ते इकोसिस्टम का प्रतीक है. ये तट से दूर ऑपरेशंस करने में सक्षम है इसलिए इसका इंडियन नेवी में शामिल होना काफी अहम माना जा रहा है.

INS अग्रय

चीन-पाकिस्तान के बीच हाल ही में सबमरीन की डील हुई है. चीन 8 सबमरींस पाकिस्तान को देगा. इस डील में पाकिस्तान को पहली सबमरीन पहुंच भी चुकी है. ऐसे में एंटी सबमरीन जहाज इंडियन नेवी के लिए अहम हो गए हैं. ये जहाज एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट यानी ASW-SWC प्रोजेक्ट का हिस्सा है. यह जहाज समुद्र के किनारे और उथले पानी में छिपी दुश्मन सबमरीन्स को खोजने और मारने में माहिर है. 

आज की तारीख में समुद्री जंग का बड़ा खतरा सबमरींस को माना जाता है. मौका मिलते ही सबमरीन चुपचाप हमला कर सकती हैं. ऐसे में यह युद्धपोत समय रहते खतरे का पता लगाकर उसे तबाह कर सकता है. इसके नाम में हमने एक शब्द सुना, 'शैलो वाटर्स'. इसका मतलब है कि ये जहाज उथले पानी में सबमरीन से लड़ने में माहिर हैं. यानी अगर कोई सबमरीन भारत के तट के नजदीक आई तो इस जहाज को पता चल जाएगा. और वो न सिर्फ पता करेगा, बल्कि समय रहते उन्हें तबाह भी करेगा जिससे वो भारत के नेवल बेस या तट के नजदीक किसी मिलिट्री ठिकाने पर हमला नहीं कर पाएगी.

ये जहाज अपनी एक और खासियत के लिए भी जाना जाता है. खासियत है इसमें लगा एक सिस्टम जिसे 'वाटरजेट प्रोपल्शन' कहते हैं. ये पूरी तरह से न्यूटन के तीसरे लॉ पर काम करता है. तीसरा लॉ ये कहता है हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और वो भी बिल्कुल बराबर. इसी लॉ का इस्तेमाल वाटरजेट प्रोपल्शन में किया जाता है. नेवल मामलों पर नजर रखने वाली वेबसाइट मरीन इनसाइट के मुताबिक इस सिस्टम में एक पंप के जरिए पानी को खींचा जाता है. इसके बाद इसे एक नोजल से गुजारा जाता है, जहां इसे और स्पीड दी जाती है. आखिर में इसे जहाज के पीछे लगे नोजल से पूरे फोर्स से छोड़ा जाता है. इसकी वजह से जहाज आगे बढ़ता है. इसके कुछ फीचर्स देखें तो-

  • लंबाई: 77 मीटर 
  • डिस्प्लेसमेंट: 900 टन 
  • सोनार: Low Frequency Variable Depth Sonar = LFVDS
  • समुद्री माइंस बिछाने में माहिर 
  • वाटरजेट तकनीक 
  • 1800 नॉटिकल माइल्स की रेंज 
  • एंटी-सबमरीन रॉकेट्स 
  • लाइटवेट टॉरपीडो से लैस 
  • कम दूरी के लिए हाई कैलिबर मशीन गन

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INS संशोधक

ये एक बड़े साइज का सर्वे वेसल है (Survey Vessel Large- SVL), जिसकी लम्बाई 110 मीटर है. ये जहाज समुद्र में उथले और गहरे पानी में सर्वे, पोर्ट मैपिंग और सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन में काम आता है. 3400 टन डिस्प्लेसमेंट वाला ये जहाज इंडियन नेवी को समुद्र की उन गहराईयों se परिचित कराएगा, जहां आम जहाज नहीं पहुंच पाते.

ये जहाज पानी के अंदर चलने वाली सबमरीन्स के अलावा समुद्र का तल, कोरल रीफ आदि की जानकारी देगा, जिससे बाकी जहाज सुरक्षित चल सकें. साथ ही किसी दुर्घटना की सूरत में ये सर्च एंड रेस्क्यूवेसल का काम भी करेगा. इसमें एक छोटी नाव है जिसे Rigid Hull Inflatable Boat कहते हैं. ये छोटी, तेज लेकिन बहुत मजबूत होती हैं. अगर इनमें पानी भी भर जाए तो भी ये डूबती नहीं हैं. इससे तेज लहरों में रेस्क्यू ऑपरेशन में काफी मदद मिलेगी. इस जहाज के कुछ फीचर्स को देखें तो

  • ऑटोनॉम्स अंडरवाटर व्हीकल (एक तरह का समुद्री ड्रोन) 
  • रिमोट कंट्रोल व्हीकल 
  • साइड स्कैन सोनार 
  • हेलीपैड 
  • हथियार के लिए CRN 71 नेवल गन 
  • 16 नॉट्स की रफ्तार 
  • 6500 नॉटिकल मील की रेंज (लगभग 12 हजार किलोमीटर)

मॉडर्न वॉरफेयर को देखें तो नेवी का महत्व बढ़ता जा रहा है. वजह है समुद्र और उसमें होने वाला व्यापार. कुल जमा बात ये है कि व्यापार सुरक्षित तो इकोनॉमी सुरक्षित. और इकोनॉमी सुरक्षित तो देश सुरक्षित. इस कड़ी में फ्रिगेट्स, एंटी-सबमरीन जहाज और सर्वे वेसल्स काफी मायने रखते हैं. भारत तीन तरफ से समुद्र से घिरा है इसलिए इन तीन जहाजों की कमिशनिंग काफी अहम है जिससे पाकिस्तान और चीन के खतरों को काउंटर करने में भारत को मदद मिलेगी.

वीडियो: इंडियन नेवी वॉरशिप महेंद्रगिरी समुद्र में उतरा, लेकिन सेना को कब मिलेगा?

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