सुलग रहा है पेरिस, उबल रहा है यूरोप! क्या 'क्लाइमेट चेंज' ने ठंडे देशों को बना दिया है भट्टी?
European Heatwave: फ्रांस, स्पेन और इटली समेत पूरे यूरोप में ऐतिहासिक हीटवेव के कारण तापमान 45 डिग्री के पार पहुंच गया है. आखिर कैसे हीट डोम और जेट स्ट्रीम में बदलाव ने ठंडे देशों को भट्टी बना दिया है और इसमें भारत के लिए क्या सबक हैं.

जो देश अपनी ठंडी हवाओं, बर्फबारी और सुहाने मौसम के लिए मशहूर थे, वो इन दिनों आग की भट्टी की तरह दहक रहे हैं. यूरोप में इस समय ऐसी भीषण लू (Heatwave) चल रही है, जिसने पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं. फ्रांस की राजधानी पेरिस हो या स्पेन की राजधानी मैड्रिड या फिर इटली के शहर रोम और वेनिस की गलियां… हर तरफ गर्मी के प्रकोप से हाहाकार मचा हुआ है.
बीबीसी के मुताबिक तापमान 42 से लेकर 45 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है. सबसे डराने वाली बात ये है कि इस गर्मी की वजह से अस्पतालों में मरीजों की कतारें लंबी हो रही हैं. पूरे यूरोप से हीटस्ट्रोक के चलते होने वाली मौतों का ग्राफ तेजी से ऊपर भाग रहा है.
भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के लिए 40 या 42 डिग्री का तापमान कोई नई बात नहीं है. हम हर साल मई-जून में इससे ज्यादा तपते हैं. लेकिन यूरोप के लिए ये तापमान किसी कयामत से कम नहीं है. इसके पीछे की वजह सिर्फ मौसम का बदलना नहीं है, बल्कि वहां का पूरा ढांचा और लाइफस्टाइल है जो इस भीषण आपदा को झेलने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था. ये पूरी कहानी ग्लोबल वार्मिंग के उस डरावने चेहरे को दिखाती है, जिससे अब दुनिया का कोई भी कोना सुरक्षित नहीं बचा है.
आंकड़े और तबाही: सुलगते देशों का पूरा हाल
यूरोप के कई देशों में मौसम विभागों ने रेड अलर्ट जारी कर दिया है. स्पेन और पुर्तगाल जैसे देशों में गर्मी का ये आलम है कि जंगलों में आग (Wildfires) भड़क उठी है, जिससे हजारों लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा है. फ्रांस के कई शहरों में स्कूलों को बंद करना पड़ा है और बुजुर्गों को घरों के अंदर ही रहने की सख्त हिदायत दी गई है. इटली के स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के 15 से ज्यादा प्रमुख शहरों के लिए 'इमरजेंसी बुलेटिन' जारी किया है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूरोपियन स्टेटिस्टिक्स ऑफिस के आंकड़े बताते हैं कि जब भी यूरोप में तापमान इस तरह असामान्य रूप से बढ़ता है, तो दिल और सांस की बीमारी से पीड़ित मरीजों की मौत का आंकड़ा अचानक बढ़ जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लगातार बनी रहने वाली उमस और गर्मी से शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होने लगता है.
इंफ्रास्ट्रक्चर फेलियर: ठंडे देशों के घर कैसे बने 'तंदूर'
यूरोप के घर और वहां के शहर इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि वो बाहर की ठंड को अंदर आने से रोकें. सदियों से वहां की आर्किटेक्चरल प्लानिंग का पूरा फोकस 'इंसुलेशन' पर रहा है, ताकि सर्दियों में घरों को गर्म रखा जा सके और हीटिंग का खर्च बचे. इन घरों की दीवारें मोटी होती हैं और खिड़कियां इस तरह बनाई जाती हैं कि सूरज की रोशनी और गर्मी ज्यादा से ज्यादा अंदर ही रुकी रहे.
अब यही खूबी उनके लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन गई है. जब बाहर का तापमान 43 डिग्री पहुंचता है, तो ये इंसुलेटेड घर उस गर्मी को अंदर कैद कर लेते हैं. नतीजा ये होता है कि रात के समय भी घर ठंडे नहीं हो पाते और वो किसी तंदूर की तरह तपने लगते हैं. सबसे बड़ी समस्या ये है कि यूरोप के 90 प्रतिशत से ज्यादा घरों में एयर कंडीशनर (AC) की कोई व्यवस्था नहीं होती है. वहां लोग पारंपरिक रूप से सिर्फ वेंटिलेशन या छोटे पंखों पर निर्भर रहते हैं.
‘सीएनएन इंटरनेशनल’ के मुताबिक सिर्फ घर ही नहीं, बल्कि यूरोप का ट्रांसपोर्ट सिस्टम भी इस गर्मी के आगे घुटने टेक चुका है. वहां के सार्वजनिक परिवहन, खासकर ट्रेनों की पटरियां और ओवरहेड बिजली की तारें अत्यधिक ठंड को सहने के लिए डिजाइन की गई हैं. जब तापमान 40 डिग्री के पार जाता है, तो स्टील की रेल पटरियां फैलने (buckling) लगती हैं. इस वजह से ट्रेनों की रफ्तार को बहुत धीमा करना पड़ा है या कई रूटों पर ट्रेनों को पूरी तरह रद्द करना पड़ा है. सड़कों का डामर (Asphalt) पिघलने लगा है और पावर ग्रिड्स पर लोड बढ़ने से कई इलाकों में ब्लैकआउट का खतरा मंडरा रहा है.
ग्लोबल वार्मिंग का कनेक्शन: क्या है 'हीट डोम' का विज्ञान?
इस ऐतिहासिक गर्मी के पीछे कोई सामान्य मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे सीधे तौर पर क्लाइमेट चेंज और 'हीट डोम' (Heat Dome) की वैज्ञानिक प्रक्रिया काम कर रही है. जब वायुमंडल में हाई प्रेशर (उच्च दबाव) का एक क्षेत्र बनता है, तो वो एक ढक्कन की तरह काम करता है. ये हाई प्रेशर अपने नीचे की गर्म हवा को बाहर नहीं निकलने देता और उसे जमीन की तरफ दबाता जाता है. जैसे-जैसे ये हवा नीचे दबती है, ये और ज्यादा गर्म और सघन होती जाती है.
नीचे दिए गए ग्राफिक के जरिए आप समझ सकते हैं कि 'हीट डोम' का ये पूरा चक्र कैसे काम करता है और क्यों इसके प्रभाव वाले इलाकों में हफ्तों तक हवा रुक जाती है और सूरज की किरणें जमीन को लगातार झुलसाती रहती हैं.

इसके साथ ही, पृथ्वी के चारों तरफ चलने वाली तेज हवाओं की पट्टी, जिसे 'जेट स्ट्रीम' (Jet Stream) कहा जाता है, वो भी ग्लोबल वार्मिंग के कारण कमजोर और लहरदार हो गई है. ‘नेशनल ओशिनिक एंड एटमॉस्फेयर एडमिनिस्ट्रेशन’ (NOAA) के मुताबिक सामान्य तौर पर जेट स्ट्रीम मौसम के सिस्टम को आगे बढ़ाती रहती है, जिससे एक जगह बहुत लंबे समय तक गर्मी या ठंड नहीं रुकती. लेकिन अब ये हवाएं सुस्त पड़ चुकी हैं. इसका नतीजा ये हो रहा है कि अफ्रीका के सहारा मरुस्थल से उठने वाली बेहद गर्म हवाएं यूरोप के ऊपर आकर लॉक हो गई हैं और वहां से हिलने का नाम नहीं ले रही हैं.
भारत के लिए सबक: 'अर्बन हीट आइलैंड' से बचना होगा
यूरोप की ये स्थिति भारत के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी है. अगर दुनिया के सबसे विकसित और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर वाले देश प्रकृति के इस बदले मिजाज के सामने बेबस हो सकते हैं, तो हमें अपने शहरों को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर होने की जरूरत है. केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक भारत के शहर तेजी से 'अर्बन हीट आइलैंड' (Urban Heat Island) में बदल रहे हैं. इसका मतलब ये है कि कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें और पेड़ों की लगातार होती कटाई की वजह से शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा दर्ज किया जा रहा है.
हमें अपने शहरी विकास के मॉडल को तुरंत बदलना होगा. इसके लिए कुछ बेहद जरूरी कदम उठाने होंगे,
ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर: कंक्रीट के जंगलों के बीच बड़े पार्क, शहरी वन (Miyawaki Forests) और हर सोसायटी में पेड़-पौधों के लिए जगह अनिवार्य करनी होगी.
कूल रूफ टेक्नोलॉजी: इमारतों की छतों पर सफेद रिफ्लेक्टिव पेंट या ग्रीन रूफिंग (छत पर बागवानी) को बढ़ावा देना होगा, ताकि घर अंदर से कम गर्म हों.
वेटलैंड्स का संरक्षण: शहरों के भीतर मौजूद तालाबों, झीलों और जल निकायों को पुनर्जीवित करना होगा, जो प्राकृतिक रूप से तापमान को नियंत्रित रखने का काम करते हैं.
और चलते-चलते यूरोप की इस जानलेवा गर्मी से जुड़े सारे एंगल्स को इस ग्राफिक्स चार्ट के जरिए समझने की कोशिश करते हैं.

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अब सवाल ये है कि पेरिस और लंदन से दिल्ली वालों को क्या सबक मिलता है. अगर हमने आज यूरोप की इस तबाही से सबक लेकर अपने शहरों को क्लाइमेट-रजिस्टेंट (मौसम के अनुकूल) नहीं बनाया, तो आने वाले सालों में हमारे सामने पानी और बिजली का ऐसा संकट खड़ा होगा जिसे संभालना किसी भी सरकार के बस की बात नहीं होगी.
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