दावोस में बड़ा सवाल: क्या भारत बनने जा रहा है दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था?
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दावोस सत्र में भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बनने की संभावना पर चर्चा हुई. भारतीय अर्थवस्था के फील गुड फैक्टर्स और चुनौतियों पर भी खुलकर चर्चा हुई.

दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) में भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावनाओं पर गहन चर्चा हुई. इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन और एग्जीक्यूटिव एडिटर-इन-चीफ कली पुरी द्वारा मॉडरेटेड इस सेशन में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की इकोनॉमिस्ट गीता गोपीनाथ, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव, भारती एंटरप्राइजेज के चेयरमैन सुनील भारती मित्तल और IKEA ग्रुप के CEO जुवेंसियो माएज्टू हेरेरा शामिल हुए. इस दौरान इस पर भी चर्चा हुई कि क्या भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बन सकता है?
गीता गोपीनाथ ने की तारीफगीता गोपीनाथ ने सबसे पहले अर्थव्यवस्था में अब तक हुए बदलावों की तारीफ की. उन्होंने कहा,
“डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास बहुत प्रभावशाली रहा है. गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) को सरल किया गया है, जो कि बेहद मददगार साबित हुआ है.”
कली पुरी ने उनसे पूछा कि इस गति को बनाए रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए? इस पर गीता गोपीनाथ ने जवाब दिया,
“इस रफ्तार को बनाए रखने और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाते हुए 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए बहुत कुछ करना होगा. यही असली चुनौती है.”
उन्होंने ये भी कहा कि आज भारत मजबूत नींव पर खड़ा है. न सिर्फ ग्रोथ रेट अच्छी है, बल्कि इन्फ्लेशन भी सिंगल डिजिट में है. ये भारत के लिए बहुत अच्छी स्थिति है. श्रम (लेबर) पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) और विकास में श्रम की हिस्सेदारी में बड़ा अंतर है. वो बोलीं,
“भारत की ग्रोथ में सिर्फ 30% हिस्सा ही श्रम से आया है.”
नए लेबर लॉज का उन्होंने स्वागत किया, लेकिन जोर देकर कहा कि ग्लोबल सप्लाई चेन में शामिल होने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर सोचने की जरूरत है. उन्होंने मानव पूंजी (ह्यूमन कैपिटल) सुधारने की तत्काल जरूरत पर भी जोर दिया. गीता ने कहा,
भारत की प्रदूषण की समस्या“नौकरियों के सृजन और श्रमिकों की स्किल्स में गहरी असमानता है. स्केलिंग करना बेहद जरूरी है.”
कली पुरी ने पूछा कि जमीन और श्रम के अलावा भारत को और क्या रोक रहा है? इस पर गीता गोपीनाथ ने कहा,
"प्रदूषण भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है. ये टैरिफ के किसी भी प्रभाव से कहीं ज्यादा गंभीर है."
वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि हर साल भारत में प्रदूषण के कारण लगभग 1.7 मिलियन (17 लाख) लोगों की जान जा रही है. उन्होंने कहा कि ये न सिर्फ आर्थिक विकास में बाधा है, बल्कि दुनिया के इन्वेस्टर्स के लिए भी बड़ा डर पैदा करता है.
गीता गोपीनाथ ने कहा,
"अगर आपको वहां रहना हो और पर्यावरण ऐसा हो जो आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छा न लगे, तो ये आपको पीछे खींचता है."
उन्होंने प्रदूषण से युद्ध स्तर पर निपटने की बात कही. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के टैरिफ और लगातार मिल रही धमकियों से पैदा हो रही वैश्विक अनिश्चितता पर बात करते हुए गीता गोपीनाथ ने कहा कि दुनिया एक संरचनात्मक मोड़ पार कर चुकी है. वो बोलीं,
भारती मित्तल क्या बोले?"हम पिछले 80 सालों के ग्लोबल इकोनॉमिक ऑर्डर से हमेशा के लिए दूर हो चुके हैं. हम वापस नहीं लौट सकते."
कली पुरी ने भारती एंटरप्राइजेज के चेयरमैन सुनील भारती मित्तल से पूछा कि अब भारत की ग्रोथ को सचमुच टर्बोचार्ज करने के लिए और क्या चाहिए? इस पर मित्तल काफी आशावादी थे. उन्होंने कहा,
“भारत अभी भी बहुत अच्छी स्थिति में है. हम नंबर-3 की पोजीशन तक जरूर पहुंचेंगे. अगर मैं इसे स्पिरिचुअल तरीके से कहूं, तो ये पहले से तय है.”
फिर भी उन्होंने स्केल पर जोर दिया, और कहा,
“हम नंबर-3 तो बन जाएंगे, लेकिन हमें 25 से 30 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचना होगा.”
इंडस्ट्री के लिए उन्होंने कहा कि बेसिक चीजें तो जगह पर हैं. मित्तल बोले,
“मेरी कम्युनिटी यानी बिजनेस कम्युनिटी को एक एनेबलिंग एनवायरनमेंट चाहिए, कमिटेड गवर्नमेंट चाहिए, स्टेबिलिटी चाहिए. ये सब आज उपलब्ध है.”
उनकी सबसे बड़ी चिंता ग्लोबल माहौल के बारे में थी. उन्होंने कहा,
“हमें डिरेल करने वाली एकमात्र चीज दुनिया की मौजूदा कॉम्पिटिटिव इंटेंसिटी हो सकती है. ट्रेड डील्स बहुत अहम होंगी.”
मित्तल ने ये भी बताया कि भारत कितना बदल चुका है. वो बोले,
“मैंने देखा है—DGTD, CCIE के बाहर सैकड़ों किताबें, हैंडबुक, मैनुअल, सैकड़ों डिपार्टमेंट्स से एक लाइसेंस के लिए लाइन लगाना. वो सब अब खत्म हो गया.”
उन्होंने सरकार से अपील की कि भारतीय कंपनियों पर ज्यादा भरोसा करे. उन्होंने कहा कि हम पर भरोसा रखो. हम सही काम करेंगे. ज्यादा कंप्लायंट रहेंगे. मित्तल ने ये भी बताया कि भारत कंज्यूमर्स का महाद्वीप है. हम हर देश के लिए एक मार्केट हैं. और अब हम दुनिया के लिए प्रोडक्शन भी कर रहे हैं.
IKEA के ग्लोबल चीफ भारत पर क्या बोले?कली पुरी ने IKEA के ग्लोबल चीफ से पूछा कि आज CEO की नजर में भारत को कैसे देखा जा रहा है. इंगका ग्रुप (IKEA) के CEO और प्रेसिडेंट जुवेंसियो माएज़तु हेरेरा ने कहा,
“मैं भारत के प्रति भावनात्मक रूप से पक्षपाती हूं.”
उन्होंने भारत में अपने छह साल बिताने को याद किया और कहा,
“भारत एक बड़ा बाजार है. यहां युवा आबादी है. ये एक लोकतंत्र भी है. भारत के पास कृषि से सीधे सबसे विकसित AI तक छलांग लगाने की संभावना है, वो भी किसी भी अन्य देश के मुकाबले तेजी से.”
उन्होंने निवेशकों के साथ भारत के जुड़ाव की तारीफ की. वो बोले,
“जब कोई रुकावट आती है, तो आप दरवाजा खटखटाते हैं, और आपको सुना जाता है.”
हेरेरा ने ये भी कहा कि ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के साथ बेहतर तालमेल बिठाने से भारत और तेजी से बढ़ सकता है. फर्नीचर प्रोडक्शन का जिक्र करते हुए बोले,
“क्या हम ये मान सकते हैं कि भारत इससे ज्यादा हकदार है? बिल्कुल.”
भारत में आने वाले CEO के लिए उनकी सलाह भी साफ थी. उन्होेंने कहा,
टैरिफ के मुद्दे पर बात“शॉर्ट-टर्म मुनाफे के लिए भारत मत आओ. भारत को आपकी जरूरत नहीं है. भारतीय स्टेकहोल्डर्स से जुड़ो. समय दो. भारत को अंदर से समझने की कोशिश करो.”
कली पुरी ने जब पूछा कि अमेरिका के टैरिफ के बावजूद भारत अपनी रफ्तार कैसे बरकरार रखेगा? इस पर अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत डटा हुआ है. वो बोले,
“हम बहुत लचीली अर्थव्यवस्था हैं. टैरिफ के बावजूद हमारे एक्सपोर्ट बढ़े हैं.”
उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट अब तीसरा सबसे बड़ा एक्सपोर्ट कैटेगरी बन चुका है. भारत नई-नई जगहों पर विस्तार कर रहा है और संतुलित ट्रेड एग्रीमेंट साइन कर रहा है. उन्होंने ये भी कहा कि दुनिया अब भारत को बहुत भरोसेमंद वैल्यू चेन पार्टनर के तौर पर देखती है.
अश्विनी वैष्णव ने आगे कहा,
“पिछले दस सालों में 1,600 कानूनों को हटा दिया गया है. 35,000 अनुपालनों (कंप्लायंस) को खत्म किया गया है.”
उन्होंने बताया कि कई पुराने कानून उस दौर के थे, जब सरकारें अंदरमुखी (इनवर्ड लुकिंग) सोच वाली थीं. अब उन कानूनों को नए सिरे से लिखा जा रहा है. इन सुधारों का असर साफ दिख रहा है. उदाहरण देते हुए वैष्णव ने कहा कि पहले टेलीकॉम टावर की अनुमति लेने में 270 दिन लगते थे. अब सिर्फ 7 दिन में मिल जाती है.
भारत की मौजूदा स्थिति और भविष्य का लक्ष्यवर्तमान में भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. IMF और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत 2025-26 में भी सबसे तेज बढ़ने वाली प्रमुख इकोनॉमी था. 2030 तक भारत का नॉमिनल GDP लगभग 7.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीदी है. जिससे ये जर्मनी को ओवरटेक कर तीसरा स्थान हासिल कर लेगा.
कुछ रिपोर्ट्स (जैसे SBI रिसर्च) तो और तेज अनुमान लगा रही हैं. इनके मुताबिक 2028 तक ही भारत तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बन सकता है. 2025 में देश की प्रति व्यक्ति आय में 2,600 डॉलर से ज्यादा थी. और 2030 तक 5,000 डॉलर के करीब पहुंचने की उम्मीद. इससे भारत अपर मिडिल इनकम देश बन जाएगा.
भारत की ग्रोथ के मुख्य ड्राइवरजनसांख्यिकी लाभ (Demographic Dividend): भारत की वर्किंग एज पॉपुलेशन (15-64 साल) 2024 में 98 करोड़ से बढ़कर 2033 तक 107 करोड़ हो जाएगी. यs आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 70% होगी. युवा और कामकाजी लोग ज्यादा कंज्यूमर गुड्स, सर्विसेज और इन्वेस्टमेंट बढ़ाएंगे.
कंज्यूमर स्पेंडिंग में उछाल: प्राइवेट कंजम्पशन पहले से ही 2.1 ट्रिलियन डॉलर का है. 2013 में ये सिर्फ 1 ट्रिलियन था.
अमीर घरों की संख्या दोगुनी हो रही है: 2033 तक देश में 9 करोड़ अमीर परिवार होने की उम्मीद है.
डिस्क्रेशनरी स्पेंडिंग (कार, एसी, फैशन, ट्रैवल, इलेक्ट्रॉनिक्स) बढ़ रही है. कार ओनरशिप अभी बहुत कम है (57 प्रति 1000 लोग). एसी पेनेट्रेशन सिर्फ 8% है. इन सेक्टर्स में ग्रोथ का बहुत स्कोप है.
इकोनॉमी का फॉर्मलाइजेशन और डिजिटल रेवोल्यूशन- GST, जन धन, आधार, UPI जैसी स्कीम्स ने ट्रांसपेरेंसी, टैक्स कलेक्शन और क्रेडिट एक्सेस बढ़ाया है.
- UPI पर हर महीने 2000 करोड़ से ज्यादा ट्रांजेक्शन हो रहे हैं.
- ONDC, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन जैसी पहलें छोटे शहरों और गांवों तक पहुंच रही हैं.
- बैंक अकाउंट पेनिट्रेशन 2011 से दोगुना से ज्यादा हुआ है.
- लोग अब आसानी से लोन लेकर लाइफस्टाइल अपग्रेड कर रहे हैं.
- हाउसहोल्ड सेविंग्स 650 बिलियन डॉलर से 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर पार करने की उम्मीद. म्यूचुअल फंड में निवेश 5 गुना बढ़ सकता है.
- इंफ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी और इनकम बढ़ने से ग्रामीण कंजम्पशन तेजी से बढ़ रहा है.
- सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ग्लोबल ट्रेंड्स को छोटे शहरों तक पहुंचा रहे हैं.
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