'रातभर निर्वस्त्र कर घर से बाहर खड़ा रखा', पत्नी की आत्महत्या के दोषी पति को HC ने बेल क्यों दे दी?
शिलिमकर और उसकी पत्नी की शादी साल 2004 में हुई थी. शादी के बाद वो दो लड़कियों के पेरेंट बने. लेकिन शिलिमकर ने अपनी पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया. हारकर उसने आत्महत्या कर ली.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक आरोपी को अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में जमानत दे दी है (Bombay High Court grants bail to Pune man). ये आदेश तब दिया गया है जब आरोपी को मामले में पहले 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी. शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर आरोपी की पत्नी ने शादी के 8 साल खुदकुशी कर ली थी.
बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस आरएन लड्ढा की पुणे बेंच 32 वर्षीय कृषि और रेत ठेकेदार संतोष सुधाकर शिलिमकर द्वारा सजा के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी. शिलिमकर को IPC की धारा 306 और 498 ए के तहत आत्महत्या और क्रूरता के लिए उकसाने के आरोपों में दोषी ठहराया गया था.
इंडिया टुडे से जुड़ी विद्या की रिपोर्ट के मुताबिक शिलिमकर और उसकी पत्नी की शादी साल 2004 में हुई थी. शादी के बाद वो दो लड़कियों के पेरेंट बने. लेकिन शिलिमकर ने अपनी पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया. खासकर जब दूसरी बच्ची में कुछ मेडिकल कंडीशन विकसित हुईं और उसे बार-बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.
पत्नी और बेटी को बिना कपड़ों के खड़ा रखापुलिस के अनुसार 16 जुलाई 2012 को शिलिमकर सूअर का मांस लाया था. उसने अपनी पत्नी को अपने दोस्तों के लिए खाना बनाने का निर्देश दिया, और इसी बात को लेकर कपल के बीच झगड़ा हो गया. शिलिमकर पर आरोप है कि उसने अपनी पत्नी और छोटी बेटी को पूरी रात नग्न हालत में घर के बाहर खड़ा रखा. इसकी जानकारी उसकी पत्नी ने अपने परिवार को फोन कर दी. शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर शिलिमकर की पत्नी ने घर के पास ही अपनी जान दे दी.
अगस्त 2024 में पुणे की सेशन कोर्ट में मामले की सुनवाई हुई. शिलिमकर को अदालत ने 10 साल कैद की सजा सुनाई. उस पर अपनी पत्नी को परेशान करने का आरोप लगाया गया, जिसके कारण शादी के आठ साल बाद 2012 में पत्नी ने सुसाइड कर लिया. रिपोर्ट के मुताबिक ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर शिलिमकर को दोषी ठहराया और कारावास की सजा सुनाई.
वकील ने क्या तर्क दिए?मामले की सुनवाई जब आगे बढ़ी तो शिलिमकर के वकील सत्यव्रत जोशी ने तर्क दिया कि मामले में उत्पीड़न या मृतक को आत्महत्या के लिए मजबूर करने के इरादे का प्रत्यक्ष सबूत नहीं है. जोशी ने साक्ष्यों में विसंगतियों पर भी प्रकाश डाला और कुछ को अफवाह बताया. साथ ही सुसाइड नोट जैसे साक्ष्यों के ना होने पर भी सवाल उठाया. ये भी कहा गया कि मुकदमे के लंबित रहने के दौरान शिलिमकर जमानत पर थे, इसलिए उन्हें अपील के लंबित रहने के दौरान भी जमानत दी जानी चाहिए.
हालांकि, एडिशनल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर मनीषा तिडके ने आरोपों की गंभीरता पर जोर देते हुए उसकी जमानत याचिका का विरोध किया. दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद, जस्टिस लड्ढा ने कहा कि अपील पर जल्द सुनवाई होने की संभावना नहीं है. उन्होंने इसी तरह के मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का हवाला दिया. जो अपील लंबित होने पर निश्चित अवधि की सजा के लिए सजा को निलंबित करने के प्रति उदार दृष्टिकोण की वकालत करते हैं.
इसके अलावा ये भी पाया गया कि आरोपों और सबूतों ने अपील की प्रक्रिया के दौरान कारावास की कोई असाधारण स्थिति पेश नहीं की. इन तर्कों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने शिलिमकर की सजा को निलंबित कर दिया और जमानत शर्तों के साथ 25 हजार रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दे दी.
वीडियो: बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला 'रुम बुक करने का मतलबये नहीं कि...'

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