बानू मुश्ताक ने जवानों को समर्पित किया बुकर प्राइज, बताया कैसे बिना रिसर्च लिखती हैं कहानियां
Banu Mushtaq Interview: बानू मुश्ताक ने कहा है कि उन्हें कहानी लिखने के लिए रिसर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती. उन्होंने इस पुरस्कार को देश और देश के सिपाहियों को डेडिकेट किया है. उन्होंने अपनी कहानियों पर खुलकर बात की है.

कर्नाटक की रहने वाली लेखिका, वकील और एक्टिविस्ट बानू मुश्ताक (Banu Mushtaq) को इस साल का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार (International Booker Prize 2025) मिला है. मूल रूप से कन्नड़ भाषा में लिखी उनकी किताब के अंग्रेजी अनुवाद ‘हार्ट लैंप’ को ये सम्मान दिया गया है. दीपा भास्थी ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया है.
बानू मुश्ताक ने कहा है कि उनको अपनी कहानियों के लिए किसी रिसर्च की जरूरत नहीं है. उन्होंने इस पुरस्कार को देश और देश के सिपाहियों को समर्पित किया है. इंडिया टुडे ग्रुप के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा,
"कहानी में भावनाओं को ज्यादा तरजीह…"उन्होंने अपनी कहानी लिखने की प्रक्रिया के बारे में कहा,
इस किताब में 12 छोटी-छोटी कहानियां हैं. इस किताब की एक कहानी पर चर्चा के दौरान लेखिका से ‘शाहिस्ता महल’ के बारे में पूछा गया. उन्होंने जवाब दिया,
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"कम्फर्ट जोन में हूंं…"इस किताब में लेखिका के जीवन के करीब कोई कहानी है क्या? बानू मुश्ताक इसका जवाब कुछ यूं देती हैं,
इस दौरान उन्होंने इस बात की भी पुष्टि की है कि वो अपनी आत्मकथा भी लिख रही हैं.
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