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रजिस्ट्रेशन नहीं तो भी मान्य है हिंदू विवाह, इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश

Allahabad High Court ने कहा कि राज्यों के पास विवाहों के रजिस्ट्रेशन से संबंधित नियम बनाने के अधिकार हैं. लेकिन इनका उद्देश्य सुविधा के अनुसार विवाह का साक्ष्य प्रस्तुत करना है.

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30 अगस्त 2025 (पब्लिश्ड: 03:35 PM IST)
Allahabad High Court
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है. (फाइल फोटो: एजेंसी/इंडिया टुडे)
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इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने कहा है कि कोई हिंदू विवाह सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं हो सकता, क्योंकि उसका रजिस्ट्रेशन नहीं कराया गया है. उन्होंने कहा कि तलाक की अर्जी में फैमिली कोर्ट की ओर से मैरिज रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट दायर करने के लिए जोर नहीं दिया जा सकता.

कोर्ट ने आगे कहा कि राज्यों के पास विवाहों के रजिस्ट्रेशन से संबंधित नियम बनाने के अधिकार हैं. लेकिन इनका उद्देश्य सुविधा के अनुसार विवाह का साक्ष्य प्रस्तुत करना है. और इसका उल्लंघन करने से भी हिंदू विवाह की मान्यता पर कोई असर नहीं पड़ता.

क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता सुनील दुबे और उनकी पत्नी ने 23 अक्टूबर 2024 को आपसी सहमति से तलाक के लिए याचिका दायर की थी. लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कार्यवाही के दौरान फैमिली कोर्ट ने उन्हें मैरिज रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट दाखिल करने का निर्देश दिया. उनकी शादी 2010 में हुई थी. दंपति ने इसका रजिस्ट्रेशन नहीं कराया था. इसलिए सुनील दुबे ने आवेदन देकर प्रमाणपत्र दाखिल करने में छूट मांगी. इस आवेदन को उनकी पत्नी का भी समर्थन था. उन्होंने तर्क दिया कि 1955 के अधिनियम के तहत विवाह का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है.

हिंदू विवाह और तलाक नियम 1956 के नियम 3(ए) का हवाला देते हुए, फैमिली कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत प्रत्येक कार्यवाही के साथ विवाह प्रमाण पत्र लगाया जाना चाहिए. इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

ये भी पढ़ें: 'हिंदुओं में पवित्र माने जाने वाले विवाह खतरे में...', HC ने बहुत कुछ कह दिया

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता का विवाह जून 2010 में हुआ था, इसलिए उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियम, 2017 के प्रावधान इस पर लागू नहीं होंगे. जस्टिस मनीष कुमार निगम की पीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया. उन्होंने आगे कहा,

जब हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के प्रावधानों के अनुसार हिंदू विवाह संपन्न होता है, तो राज्य सरकारों को ऐसे विवाह के पंजीकरण के लिए नियम बनाने का अधिकार है. ऐसे नियमों में हिंदू विवाह रजिस्टर रखने का प्रावधान हो सकता है, जिसमें पक्षकार अपने विवाह का विवरण दर्ज करा सकते हैं. पंजीकरण का उद्देश्य केवल विवाह का सुविधाजनक साक्ष्य प्रस्तुत करना है.

हाई कोर्ट ने इस मामले में फैमिली कोर्ट की ओर से प्रमाण पत्र दाखिल करने के निर्देश को 'पूरी तरह से अनुचित' बताया.

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: SC के फैसले के खिलाफ क्यों हो गए इलाहाबाद HC के जज?

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