'पति को नपुंसक कहना मानहानि नहीं, अगर... ', हाई कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी
Allahabad High Court ने मानहानि के एक मामले में समन जारी करने के आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की. यह मामला एक महिला के खिलाफ था, जिसने अपने पति पर नपुंसक होने का आरोप लगाया था.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पति को ‘नपुंसक’ कहना मानहानि नहीं है, अगर मेडिकल जांच रिपोर्ट में इसकी पुष्टि होती है. कोर्ट ने मानहानि के एक मामले में समन जारी करने के आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की. यह मामला एक महिला के खिलाफ था, जिसने अपने पति पर शारीरिक रूप से अक्षम (अयोग्य) होने का आरोप लगाया था. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यह बयान पति के प्रति बिना किसी दुर्भावना और अच्छी नीयत से दिया गया है.
क्या है मामला?इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला एक पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है. शादी के बाद दोनों के बीच अनबन शुरू हो गई. पत्नी का आरोप था कि उसके पति की मेडिकल स्थिति (शारीरिक अक्षमता) को शादी के समय छुपाया गया था. इसकी वजह से वह शादी की रात संबंध बनाने में लाचार रहा. विवाद बढ़ने पर पत्नी ने पुलिस में एक FIR दर्ज कराई. इस शिकायत में उसने पहली बार आधिकारिक तौर पर यह बात कही कि उसका पति शारीरिक रूप से अक्षम है. इसके साथ ही महिला ने एक अदालत में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12(1)(a) के तहत शादी को रद्द करने और तलाक लेने के लिए याचिका भी दायर की.
पत्नी द्वारा लगाए गए इस आरोप के बाद, पति ने अपनी प्रतिक्रिया दी. पति का दावा था कि उसकी पत्नी ने परिवार के सदस्यों और मकान मालिक के सामने उसे सरेआम नपुंसक कहकर अपमानित किया है. इस बात को अपनी प्रतिष्ठा पर चोट मानते हुए पति ने पत्नी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 और 500 के तहत आपराधिक मानहानि का जवाबी मुकदमा दर्ज करा दिया. पति की इस मानहानि शिकायत पर सुनवाई करते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट (निचली अदालत) ने पत्नी के खिलाफ समन जारी कर दिया, यानी उसे आरोपी के रूप में कोर्ट में पेश होने का आदेश दे दिया.
निचली अदालत के इस समन को चुनौती देने के लिए महिला ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. महिला ने हाई कोर्ट में दलील दी कि उसका मकसद पति को बदनाम करना या दुर्भावना फैलाना नहीं था. अपने दावों को सच साबित करने के लिए उसने पति की ‘पोटेंसी टेस्ट रिपोर्ट’ (मेडिकल जांच रिपोर्ट) भी अदालत के सामने पेश की.
कोर्ट ने क्या कहा?जस्टिस अचल सचदेव ने पत्नी की याचिका पर सुनवाई की. कोर्ट ने 15 मई के अपने आदेश में कहा,
“यह बयान बिना किसी गलत भावना के अच्छी नीयत से दिया गया है और मेडिकल जांच रिपोर्ट से भी उसके बयान की पुष्टि होती है."
कोर्ट ने माना कि पुलिस या अदालत के सामने कानूनी राहत (तलाक या भरण-पोषण) पाने के लिए अपनी बात रखना मानहानि नहीं है. यह IPC की धारा 499 के अपवाद 8 (नेक नीयत से की गई शिकायत) के तहत सुरक्षित है. हाई कोर्ट ने माना कि निचली अदालत ने अपने न्यायिक दिमाग का सही इस्तेमाल किए बिना समन जारी किया था, इसलिए महिला के खिलाफ चल रहे मानहानि के मामले और समन को पूरी तरह से रद्द कर दिया गया.
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हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा मुद्दा तलाक का आधार हो सकता है, लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें होनी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि नपुंसकता या शारीरिक अक्षमता के आधार पर तलाक लेने के लिए पुख्ता सबूतों की जरूरत होती है. केवल एक रात के अनुभव को आधार बनाकर किसी को अक्षम नहीं ठहराया जा सकता. अदालत ने साफ किया कि शारीरिक अक्षमता के आधार पर शादी रद्द करने या तलाक लेने के लिए मेडिकल जांच रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है.
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