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अग्नि 5 से उड़े चीन-पाक के होश, अरबों का एयर डिफेंस भी भारतीय मिसाइल के आगे पूरी तरह फेल

Agni 5 Missile vs China-Pakistan: भारत की अग्नि 5 मिसाइल की MIRV तकनीक ने चीन और पाकिस्तान के Air Defense Systems की कमियों को उजागर कर दिया है. जानिए क्यों दोनों पड़ोसी देश Agni 5 की नई मारक क्षमता के सामने लाचार हैं.

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21 मई 2026 (पब्लिश्ड: 12:33 PM IST)
Agni 5 MIRV
अग्नि 5 के आगे क्यों लाचार है चीन-पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम (फोटो- ANI)
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आजकल चाय की टपरी से लेकर यूट्यूब के कमेंट सेक्शन तक और गूगल ट्रेंड्स से लेकर पाकिस्तानी मीडिया के डिबेट्स तक, बस एक ही नाम गूंज रहा है. वो नाम है अग्नि 5. भारत ने जब से 'मिशन दिव्यास्त्र' (Mission Divyastra) के तहत अपनी सबसे खतरनाक मिसाइल अग्नि 5 (Agni-5) का सफल परीक्षण किया है, तब से बीजिंग (Beijing) से लेकर इस्लामाबाद (Islamabad) तक के सैन्य मुख्यालयों में नक्शे दोबारा खंगाले जा रहे हैं. रक्षा विशेषज्ञ कंप्यूटर स्क्रीन पर सिम्युलेशन रन कर रहे हैं और दोनों देशों के जनरल बंद कमरों में लंबी बैठकें कर रहे हैं. 

ऐसा इसलिए है क्योंकि इस बार मामला सिर्फ एक नई मिसाइल का नहीं है. इस बार मामला उस तकनीक का है जिसे मिलिट्री की भाषा में एमआईआरवी (MIRV) यानी ‘मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल’ (Multiple Independently Targetable Re-entry Vehicle) कहा जाता है. आसान भाषा में कहें तो एक ऐसी मिसाइल जो अंतरिक्ष में जाने के बाद एक नहीं, दो नहीं, बल्कि कई परमाणु बम (Nuclear Bomb) अलग-अलग शहरों पर एक साथ गिरा सकती है.

अब सवाल यह उठता है कि क्या हमारे दोनों प्यारे पड़ोसियों के पास इस कयामत की बिजली को रोकने का कोई तरीका है. क्या चीन का अरबों डॉलर का एयर डिफेंस नेटवर्क इस भारतीय मिसाइल को हवा में छू भी सकता है. और पाकिस्तान, जो हर बात पर परमाणु बटन दबाने की धमकी देता है, वो अग्नि 5 के सामने कितना लाचार और बेबस है. 

जब देशप्रेम की भावना रखने वाले युवा और नई पीढ़ी के टेक-सैवी लोग रक्षा मामलों को देखते हैं, तो वे केवल खोखले दावों को नहीं, बल्कि उसके पीछे के असली विज्ञान और सामरिक समीकरण को समझना चाहते हैं. इस महा-विश्लेषण में हम रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence), डीआरडीओ (DRDO) और अंतरराष्ट्रीय डिफेंस पोर्टल्स के आंकड़ों के सहारे बिल्कुल आसान भाषा में समझेंगे कि इस नई ताकत के बाद एशिया का पावर बैलेंस कैसे बदल गया है.

इस पूरे मामले की गहराई में जाने से पहले हमें यह समझना होगा कि अग्नि 5 की टाइमिंग इतनी महत्वपूर्ण क्यों है. इस समय पूरी दुनिया में युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं और ऐसे में भारत ने अपनी सबसे बड़ी प्रतिरोधक क्षमता का प्रदर्शन किया है. हम इस लेख में चीन के अभेद्य माने जाने वाले एचक्यू 19 सिस्टम (HQ 19 System) की हकीकत खोलेंगे, पाकिस्तान के खोखले दावों का एक्सरे करेंगे.

साथ ही रक्षा विशेषज्ञों की जुबानी यह जानेंगे कि भारतीय वैज्ञानिकों ने कैसे दुनिया के सबसे मुश्किल चक्रव्यूह को भेदने का रास्ता खोज निकाला है. इसके साथ ही हम इसके आर्थिक, सामाजिक और भविष्य के रणनीतिक असर पर भी बात करेंगे ताकि आपको इस विषय पर इंटरनेट पर कुछ और खोजने की जरूरत ही ना पड़े.

Agni 5
Agni 5 मिसाइल (फोटो- PTI)

क्या है ‘मिशन दिव्यास्त्र’ और क्यों कांप रहे हैं चीन-पाकिस्तान

मार्च 2024 में जब डीआरडीओ ने मिशन दिव्यास्त्र की सफलता की घोषणा की, तो दुनिया के चुनिंदा देशों के क्लब में खलबली मच गई. अब तक केवल अमेरिका, रूस, चीन और फ्रांस के पास ही एमआईआरवी तकनीक थी. ब्रिटेन भी इसे अमेरिका के सहयोग से इस्तेमाल करता है. अब भारत इस संप्रभु क्लब का छठा आधिकारिक सदस्य बन गया है. लेकिन यह तकनीक इतनी खास क्यों है. 

सामान्य मिसाइलें अपने साथ एक ही परमाणु हथियार यानी वॉरहेड ले जाती हैं. अगर दुश्मन का एयर डिफेंस सिस्टम उस मिसाइल को रास्ते में ही मार गिराए, तो पूरा मिशन फेल हो जाता है. लेकिन अग्नि 5 इस पुराने नियम को नहीं मानती.

अग्नि 5 एक इंटरकॉन्टिनेंटल या कहें कि बेहद लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है जिसकी मारक क्षमता 5,000 से 8,000 किलोमीटर तक आंकी गई है. जब यह मिसाइल भारत की धरती से लॉन्च होती है, तो यह पारंपरिक मिसाइलों की तरह सीधे दुश्मन की तरफ नहीं जाती. यह सीधे अंतरिक्ष में चली जाती है. धरती के वायुमंडल से बाहर निकलने के बाद इसका मुख्य हिस्सा अलग हो जाता है जिसे बस या री-एंट्री व्हीकल कहते हैं. 

इस बस के अंदर कई छोटे-छोटे परमाणु वॉरहेड लगे होते हैं. अंतरिक्ष की नीरवता में यह बस कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के जरिए अलग-अलग दिशाओं में मुड़ती है और एक-एक करके परमाणु बमों को उनके तय ठिकानों की तरफ ड्रॉप कर देती है.

डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) की आधिकारिक जानकारियों के अनुसार, ये वॉरहेड एक दूसरे से सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित ठिकानों को एक साथ निशाना बना सकते हैं. उदाहरण के लिए, एक ही अग्नि 5 मिसाइल को लॉन्च करके बीजिंग, शंघाई और गुआंगझू जैसे बड़े शहरों को एक ही समय में टारगेट किया जा सकता है. 

सबसे खतरनाक बात यह है कि ये वॉरहेड अंतरिक्ष से वापस धरती की तरफ आते समय किसी सीधे रास्ते पर नहीं चलते. इनकी रफ्तार और इनका कोण लगातार बदलता रहता है जिससे दुश्मन के रडार के कंप्यूटर यह समझ ही नहीं पाते कि मिसाइल किस सेकंड में कहां होगी.

चीन का सुरक्षा कवच: कितना मजबूत है ड्रैगन का HQ 19

अब बात करते हैं हमारे पहले पड़ोसी यानी चीन की. चीन कोई कमजोर देश नहीं है, उसके पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा बजट है और उसने पिछले दो दशकों में अपनी धरती को एक अभेद्य किले में बदलने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया है. चीन के बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) नेटवर्क का सबसे चमकीला सितारा है HQ 19 एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम. इसे चीनी सेना का ब्रह्मास्त्र माना जाता है और इसकी तुलना अक्सर अमेरिका के मशहूर थाड (THAAD) सिस्टम से की जाती है.

एचक्यू 19 का मुख्य काम उन मिसाइलों को रोकना है जो अंतरिक्ष से बेहद तेज रफ्तार से आ रही हों. चीनी सेना का दावा है कि यह सिस्टम वायुमंडल की ऊपरी सीमा पर यानी एक्सो-एटमॉस्फेरिक जोन में ही दुश्मन की मिसाइल को ट्रैक करके उससे टकरा जाता है और उसे नष्ट कर देता है. 

इसके साथ चीन ने एक बेहद शक्तिशाली अर्ली वॉर्निंग रडार नेटवर्क भी तैयार किया है जिसे 610ए रडार कहा जाता है. इस रडार की रेंज लगभग 4,000 किलोमीटर है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर भारत के भीतर कहीं से भी कोई बड़ी मिसाइल लॉन्च होती है, तो यह रडार कुछ ही सेकंड में उसे पकड़ लेगा और चीनी कमांड सेंटर को अलर्ट भेज देगा.

HQ19
चीन का HQ 19 एयर डिफेंस सिस्टम (फोटो- साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट)

इसके अलावा चीन ने रूस से दुनिया का सबसे बेहतरीन माना जाने वाला एस 400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी खरीदा है. चीन ने इसे भारत से लगती सीमाओं और अपने प्रमुख शहरों के चारों तरफ तैनात कर रखा है. एस 400 का काम टर्मिनल फेज में सुरक्षा देना है यानी जब दुश्मन की मिसाइल चीनी धरती पर गिरने ही वाली हो, तब यह उसे आखिरी समय में मार गिराने की कोशिश करता है. चीन ने पिछले सालों में कई बार मिड-कोर्स इंटरसेप्शन के सफल टेस्ट भी किए हैं जिसका मतलब है कि वह अंतरिक्ष में तैरती मिसाइल को निशाना बनाने की कला सीख रहा है.

असली परीक्षा: क्या चीन का सिस्टम अग्नि 5 को रोक पाएगा

तकनीकी कागजों पर तो चीन का डिफेंस सिस्टम बेहद आधुनिक नजर आता है, लेकिन जब सामना अग्नि 5 के एमआईआरवी सिस्टम से होगा, तो गणित पूरी तरह बदल जाएगा. सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि एमआईआरवी के सामने दुनिया का कोई भी एयर डिफेंस सिस्टम शत-प्रतिशत सुरक्षित होने की गारंटी नहीं दे सकता. आइए इसके पीछे के वैज्ञानिक और रणनीतिक कारण को आसान भाषा में समझते हैं.

जब अग्नि 5 का मुख्य हिस्सा अंतरिक्ष से वापस चीनी वायुमंडल में प्रवेश करेगा, तो वह केवल असली परमाणु वॉरहेड नहीं गिराएगा. उसके साथ बड़ी संख्या में डेकॉएज यानी नकली डमी वॉरहेड और चेफ (धातु के छोटे टुकड़े जो रडार को अंधा कर देते हैं) भी छोड़े जाएंगे. ये डमी वॉरहेड दिखने में और रडार की स्क्रीन पर बिल्कुल असली परमाणु बम जैसे ही नजर आते हैं. अब चीन के एचक्यू 19 रडार के सामने सबसे बड़ा संकट यह होगा कि वह असली और नकली में फर्क कैसे करे. स्क्रीन पर जहां पहले एक मिसाइल दिख रही थी, वहां अब अचानक 20 या 30 टारगेट दिखने लगेंगे.

अग्नि-5: अंतरिक्ष में एमआईआरवी (MIRV) के काम करने का तरीका

1. लॉन्च फेज (Launch Phase)
2. अंतरिक्ष में प्रवेश
3. एमआईआरवी 'बस' का अलग होना
⬇ (अंतरिक्ष से धरती की ओर)
असली वॉरहेड 1
टारगेट: बीजिंग की तरफ
असली वॉरहेड 2
टारगेट: शंघाई की तरफ
नकली डमी वॉरहेड्स
काम: रडार को भटकाना

(नोट: ग्राफिक्स में बताए गए टारगेट काल्पनिक हैं और सिर्फ समझाने के लिहाज से दिखाए गए हैं. भारत की नीति किसी भी देश पर पहले हमला करने की नहीं है.)

यदि चीन को अपनी सुरक्षा पूरी तरह पक्की करनी है, तो उसे स्क्रीन पर दिखने वाले हर एक डॉट पर अपनी इंटरसेप्टर मिसाइल दागनी होगी. मिलिट्री डॉक्ट्रिन के अनुसार, एक आने वाले वॉरहेड को नष्ट करने के लिए कम से कम दो इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ती हैं. अगर भारत ने केवल तीन अग्नि 5 मिसाइलें दागीं और हर मिसाइल से 4 असली वॉरहेड और 10 नकली वॉरहेड निकले, तो चीन को हवा में 40 से ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाना होगा. इसके लिए चीन को 80 से ज्यादा एचक्यू 19 मिसाइलें एक साथ फायर करनी होंगी. इसे रक्षा विज्ञान में 'सैचुरेशन अटैक' कहते हैं यानी दुश्मन के सिस्टम को इतने टारगेट दे दो कि उसका कंप्यूटर और मिसाइल बैंक ओवरलोड होकर क्रैश हो जाए.

अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक ‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (SIPRI) की रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन का मिसाइल डिफेंस सिस्टम अभी भी पूरी तरह से विकसित हो रहा है और वह एक साथ इतने बड़े सैचुरेशन अटैक को रोकने के लिए पर्याप्त संख्या में तैनात नहीं है. इसलिए चीन के पास तकनीक जरूर है, लेकिन अग्नि 5 की मारक क्षमता के सामने उसकी ढाल में कई बड़े छेद हैं.

पाकिस्तान की बेबसी: जहां एयर डिफेंस सिर्फ एक ख्वाब है

अब जरा रुख करते हैं हमारे दूसरे पड़ोसी देश पाकिस्तान की तरफ. अगर चीन के पास अग्नि 5 को रोकने के लिए एक टूटी-फूटी ढाल है भी, तो पाकिस्तान के पास इस स्तर की बैलिस्टिक मिसाइल को छूने तक का कोई हथियार मौजूद नहीं है. पाकिस्तानी मीडिया में भले ही कितनी भी बड़ी-बड़ी बातें की जाएं, लेकिन असल सैन्य हकीकत यह है कि पाकिस्तान का एयर डिफेंस नेटवर्क अग्नि 5 के सामने पूरी तरह लाचार है.

पाकिस्तान के पास फिलहाल सबसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के नाम पर चीन से खरीदा हुआ एचक्यू 9पी (HQ-9P) सिस्टम है. पाकिस्तान इसे बड़े गर्व से अपनी रक्षा का मुख्य पिलर बताता है. लेकिन यहां एक बहुत बड़ा तकनीकी पेंच है. HQ 9P मुख्य रूप से चौथी और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों, ड्रोन्स और बहुत कम दूरी की शॉट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है. इसकी अधिकतम रेंज लगभग 100 से 150 किलोमीटर है और यह केवल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले खतरों से निपट सकता है.

HQ 9P
HQ 9P एयर डिफेंस सिस्टम (फोटो- पाकिस्तान आर्मी एक्स हैंडल)

जब अग्नि 5 अंतरिक्ष से पाकिस्तान की तरफ आएगी, तो उसकी रफ्तार मैक 24 यानी ध्वनि की गति से 24 गुना तेज होगी. किलोमीटर में समझें तो यह रफ्तार लगभग 29,000 किलोमीटर प्रति घंटा बैठती है. इतनी भयानक रफ्तार से आ रहे लोहे और आग के गोले को ट्रैक करना और फिर उसे हवा में मार गिराना एचक्यू 9पी के सॉफ्टवेयर और रॉकेट मोटर के बस की बात ही नहीं है. पाकिस्तान के पास चीन की मदद से बने कुछ अर्ली वॉर्निंग रडार जरूर हैं जो यह बता सकते हैं कि मौत भारत की तरफ से आ रही है, लेकिन उनके पास उस मौत को हवा में रोकने का कोई जरिया नहीं है.

क्या कहते हैं अंतरराष्ट्रीय सैन्य रणनीतिकार

इस सामरिक बदलाव पर दुनिया के बड़े रक्षा विशेषज्ञ भी अपनी पैनी नजर रखे हुए हैं. वाशिंगटन स्थित एक प्रमुख वैश्विक सुरक्षा थिंक टैंक के वरिष्ठ विश्लेषक डॉक्टर थॉमस मिलर का मानना है कि भारत का एमआईआरवी परीक्षण सीधे तौर पर चीन के मिसाइल डिफेंस को न्यूट्रलाइज करने के लिए किया गया है. फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के एक कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ मिलर ने कहा,

भारत ने कभी भी अपनी परमाणु नीति में पहले इस्तेमाल (नो फर्स्ट यूज) की बात से पीछे हटने का संकेत नहीं दिया है. इसका मतलब है कि भारत इन मिसाइलों का इस्तेमाल तभी करेगा जब उस पर हमला होगा. लेकिन अगर चीन को यह लगता था कि वह भारत के पहले हमले के बाद बचे-खुचे हथियारों को अपने एचक्यू 19 सिस्टम से रोक लेगा, तो अब वह भ्रम टूट गया है. भारत की अग्नि 5 एमआईआरवी यह सुनिश्चित करती है कि यदि भारत पर हमला हुआ, तो भारत का जवाबी हमला इतना भयानक होगा कि चीन का कोई भी डिफेंस सिस्टम उसे बचा नहीं पाएगा. यह एशिया में शांति बनाए रखने के लिए एक मजबूत प्रतिरोधक (डिटेरेंस) का काम करेगा.

यह बयान साफ करता है कि भारत की नीति आक्रामक नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा को पूरी तरह पक्की करने की है ताकि कोई भी देश भारत की तरफ आंख उठाने की हिम्मत ना करे.

पाकिस्तान का नया पैंतरा: अबाबील और ऑफेंसिव डिटेरेंस

जब पाकिस्तान को यह समझ आ गया कि वह भारत की अग्नि मिसाइलों को रोक नहीं सकता, तो उसने एक अलग सैन्य रणनीति अपनाई. इसे डिफेंस की भाषा में 'ऑफेंसिव डिटेरेंस' कहते हैं यानी अगर हम तुम्हारी मिसाइल को रोक नहीं सकते, तो हम भी वैसी ही मिसाइल बनाएंगे ताकि तुम भी हमसे डरो. इसी सोच के तहत पाकिस्तान ने अपनी 'अबाबील' (Ababeel) मिसाइल का विकास शुरू किया. पाकिस्तान का दावा है कि अबाबील एक एमआईआरवी सक्षम मिसाइल है जो भारत के अंदर कई ठिकानों को निशाना बना सकती है.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषक पाकिस्तान के इस दावे को शक की नजर से देखते हैं. एमआईआरवी तकनीक के लिए केवल मिसाइल बनाना काफी नहीं होता. इसके लिए परमाणु वॉरहेड्स को बेहद छोटा और हल्का बनाना पड़ता है जिसे 'मिनिएचराइजेशन' कहते हैं. 

इसके साथ ही हर वॉरहेड के अंदर अपना खुद का गाइडेंस सिस्टम होना चाहिए ताकि वह अंतरिक्ष में अलग होने के बाद अपने रास्ते को खुद चुन सके. पाकिस्तान के पास वर्तमान में जो तकनीक और आर्थिक संसाधन हैं, उसे देखते हुए यह बेहद मुश्किल लगता है कि उसने इस स्तर की सटीकता हासिल कर ली है. इसके अलावा, पाकिस्तान का पूरा ध्यान केवल भारत पर केंद्रित है, जबकि भारत की अग्नि 5 पूरे एशिया और उससे परे तक की सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाई गई है.

तलवार बनाम ढाल का असली गणित

सैन्य इतिहास का एक पुराना और अकाट्य नियम है कि तलवार हमेशा ढाल से एक कदम आगे रहती है. जब भी कोई नया डिफेंस सिस्टम बनता है, वैज्ञानिक उससे भी तेज और चालाक मिसाइल बना लेते हैं. अग्नि 5 और हमारे पड़ोसियों के बीच का मुकाबला भी कुछ ऐसा ही है जिसे इस टेबल के जरिए आसानी से समझा जा सकता है:

तकनीकी विशेषता भारत की अग्नि 5 (MIRV) चीन का सुरक्षा तंत्र (HQ-19) पाकिस्तान का सुरक्षा तंत्र (HQ-9P)
अधिकतम रफ्तार मैक 24 तक (लगभग 29,000 किमी/घंटा) मैक 15 तक की मिसाइल को रोकने का दावा केवल मैक 4-5 तक की गति के लिए उपयुक्त
वॉरहेड की संख्या मल्टीपल (एक साथ कई असली और नकली डमी) डमी वॉरहेड्स के कारण रडार भ्रमित हो जाता है एक साथ कई लक्ष्यों को संभालने में असमर्थ
इंटरसेप्शन फेज मिड-कोर्स और टर्मिनल दोनों में खतरनाक केवल मिड-कोर्स में आंशिक सफलता की उम्मीद केवल बेहद कम ऊंचाई पर सीमित प्रयास
सफलता की संभावना बेहद उच्च (90% से ज्यादा भेदने की क्षमता) सीमित (40-50% से ज्यादा गारंटी नहीं) नगण्य (शून्य के बराबर क्षमता)

नोट: 1 मैक=1234.8 किमी/घंटा

इस तुलना से साफ है कि भारत की अग्नि 5 एक ऐसी अचूक तलवार बन चुकी है जिसके सामने चीन की ढाल कमजोर पड़ रही है और पाकिस्तान के पास तो कोई ढाल है ही नहीं.

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों की पैनी नजर

भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन और सामरिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ डी के पांडे का कहना है कि हमें इस सफलता को केवल सैन्य नजरिए से नहीं, बल्कि देश के गौरव और आत्मनिर्भरता के रूप में देखना चाहिए. डॉ पांडे कहते हैं,

मिशन दिव्यास्त्र की सफलता डीआरडीओ के वैज्ञानिकों की दशकों की तपस्या का परिणाम है. चीन हमेशा से हमें एलएसी पर और पाकिस्तान एलओसी पर डराने की कोशिश करता रहा है. चीन ने तिब्बत के पठार पर जो बड़े-बड़े रडार लगाए थे, वे हमारी साधारण मिसाइलों को ट्रैक कर सकते थे. लेकिन एमआईआरवी तकनीक ने उनके पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को एक झटके में पुराना और अप्रभावी बना दिया है. अब चीनी रणनीतिकारों को पता है कि अगर उन्होंने कोई दुस्साहस किया, तो उसकी कीमत उनके आर्थिक केंद्रों को चुकानी पड़ेगी. यह मिसाइल भारत के मिडिल क्लास को यह भरोसा देती है कि देश की सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित हाथों में हैं.

पैसे का खेल और पाबंदियों का डर

एक मिसाइल को बनाने और टेस्ट करने के पीछे सिर्फ सेना का दिमाग नहीं होता, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की ताकत भी होती है. जब भारत ने परमाणु परीक्षण किए थे, तब दुनिया ने हम पर कई तरह की पाबंदियां लगाई थीं. लेकिन आज का भारत अलग है. आज भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जल्द ही तीसरी बनने की राह पर है. यही वजह है कि अग्नि 5 के परीक्षण के बाद दुनिया के किसी बड़े देश ने भारत पर प्रतिबंध लगाने की बात तो दूर, कड़े शब्दों में निंदा तक नहीं की.

इसके विपरीत हमारे दोनों पड़ोसियों की आर्थिक स्थिति को देखिए. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान इस समय कर्ज के जाल में फंसा हुआ है. वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से मिलने वाले पैसों पर अपनी अर्थव्यवस्था चला रहा है. ऐसी स्थिति में एक नया और महंगा मिसाइल डिफेंस सिस्टम खड़ा करना पाकिस्तान के लिए आर्थिक रूप से नामुमकिन है. 

एयर डिफेंस सिस्टम बेहद महंगे होते हैं. रूस के एस 400 की एक ही रेजिमेंट की कीमत अरबों डॉलर होती है. पाकिस्तान अगर रोटी और बिजली के संकट से जूझेगा या अरबों डॉलर की मिसाइलें खरीदेगा, यह उसके सामने सबसे बड़ा सामाजिक और राजनीतिक संकट है.

दूसरी तरफ चीन है, जिसकी अर्थव्यवस्था बड़ी तो है लेकिन पिछले कुछ समय से वह भी मंदी और रियल एस्टेट संकट से जूझ रही है. चीन ने अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) में बहुत सारा पैसा फंसा दिया है जो अब वापस नहीं आ रहा है. भारत की अग्नि 5 का मुकाबला करने के लिए चीन को अपने पूरे मिसाइल डिफेंस नेटवर्क को अपग्रेड करना होगा जिसमें फिर से अरबों-खरबों डॉलर का खर्च आएगा. भारत ने बहुत ही कम लागत में एक ऐसी तकनीक विकसित कर ली है जिसने चीन को एक नए और महंगे हथियारों की होड़ (Arms Race) में धकेल दिया है.

आम आदमी और मिडिल क्लास पर इसका क्या असर होता है

अक्सर लोग सोचते हैं कि इन बड़ी-बड़ी मिसाइलों, रडार और परमाणु बमों से एक आम मिडिल क्लास भारतीय या देश के युवाओं का क्या लेना-देना है. हमारा बजट तो घर के राशन, बच्चों की स्कूल फीस और पेट्रोल-डीजल के दामों से तय होता है. लेकिन यह सोच पूरी तरह सही नहीं है. किसी भी देश की आर्थिक तरक्की तभी हो सकती है जब उसकी सीमाएं सुरक्षित हों और देश के भीतर शांति का माहौल हो.

जब कोई विदेशी कंपनी भारत में अरबों डॉलर का निवेश करने का फैसला करती है, तो वह सबसे पहले यह देखती है कि क्या यह देश सुरक्षित है. अगर किसी देश पर हमेशा युद्ध का खतरा मंडराता रहे, तो वहां विदेशी निवेश आना बंद हो जाता है, शेयर बाजार क्रैश हो जाता है और नौकरियां खत्म होने लगती हैं. 

अग्नि 5 जैसी मिसाइलें भारत को वो स्थिरता और सुरक्षा देती हैं जो हमारी आर्थिक ग्रोथ के लिए जरूरी है. यह देश के युवाओं को एक सुरक्षित भविष्य का भरोसा देती है कि वे बिना किसी बाहरी डर के अपने स्टार्टअप्स शुरू कर सकते हैं और कॉर्पोरेट जगत में नई ऊंचाइयों को छू सकते हैं.

इसके साथ ही, यह पूरी तरह से 'मेड इन इंडिया' प्रोजेक्ट है. इसमें इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट्स, सॉफ्टवेयर और गाइडेंस सिस्टम का एक बड़ा हिस्सा भारत के भीतर ही हमारी अपनी कंपनियों और एमएसएमई (MSMEs) द्वारा तैयार किया गया है. इससे देश के भीतर ही हाई-टेक इंजीनियरिंग और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में हजारों नई नौकरियों के अवसर पैदा हो रहे हैं जो हमारे देश के युवाओं के लिए बेहद गर्व की बात है.

आत्मनिर्भर भारत का नया चेहरा

भारत सरकार की मौजूदा नीति पूरी तरह से डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने की है. रक्षा मंत्रालय ने पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों सैन्य उपकरणों के आयात पर रोक लगा दी है और उन्हें भारत में ही बनाने को अनिवार्य कर दिया है. अग्नि 5 इस सरकारी नीति का सबसे बड़ा और सफल पोस्टर बॉय है.

नीति आयोग और रक्षा विशेषज्ञों की बैठकों में यह बात बार-बार उठती रही है कि भारत कब तक अपनी सुरक्षा के लिए रूस, फ्रांस या अमेरिका से आने वाले हथियारों पर निर्भर रहेगा. युद्ध के समय अगर इन देशों ने स्पेयर पार्ट्स देने से मना कर दिया, तो देश संकट में पड़ सकता है. अग्नि 5 के सफल परीक्षण ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वह दुनिया की सबसे जटिल और एडवांस मिलिट्री टेक्नोलॉजी खुद अपने दम पर बना सकता है. 

यह सफलता नीतिगत स्तर पर भारत को वैश्विक मंचों पर एक मजबूत आवाज देती है. अब जब भारत के प्रधानमंत्री या राजनयिक दुनिया के बड़े देशों के साथ टेबल पर बैठते हैं, तो वे एक शक्तिशाली और आत्मनिर्भर राष्ट्र के प्रतिनिधि के रूप में बात करते हैं.

आगे क्या-क्या बदल सकता है

अग्नि 5 का यह परीक्षण कोई आखिरी कदम नहीं है. यह तो बस एक नई शुरुआत है. आने वाले समय में दक्षिण एशिया का सामरिक परिदृश्य और तेजी से बदलने वाला है. डीआरडीओ के वैज्ञानिक अब इस मिसाइल की सटीकता को और बेहतर करने और इसकी रेंज को और ज्यादा फ्लेक्सिबल बनाने पर काम कर रहे हैं.

भविष्य में हम देख सकते हैं कि भारत अपनी इस तकनीक को और छोटा करके पनडुब्बियों से छोड़े जाने वाली मिसाइलों (SLBMs) में भी इस्तेमाल करना शुरू कर दे. अगर ऐसा होता है, तो भारत की परमाणु तिकड़ी (न्यूक्लियर ट्रायड - जमीन, हवा और पानी से परमाणु हमला करने की क्षमता) इतनी मजबूत हो जाएगी कि दुनिया का कोई भी देश भारत पर किसी भी तरह का दबाव बनाने की सोच भी नहीं पाएगा. 

वहीं दूसरी तरफ, चीन इस भारतीय चुनौती से निपटने के लिए अंतरिक्ष आधारित लेजर हथियारों और नए प्रकार के हाइपरसोनिक इंटरसेप्टर पर अपना रिसर्च तेज कर सकता है. लेकिन फिलहाल के लिए, अगले एक दशक तक भारत ने अपनी सुरक्षा को पूरी तरह से अभेद्य बना लिया है.

खबर कॉमेंट बॉक्स में: समुद्र में बनेगी पाकिस्तान-चीन के मिसाइलों की कब्रगाह, भारत बना रहा खतरनाक मिसाइल शील्ड

शांति का रास्ता ताकत से होकर गुजरता है

इस पूरे विश्लेषण का सार यही है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सैन्य मामलों में शांति की बातें तभी सुनी जाती हैं जब आपके हाथों में एक मजबूत डंडा हो. भारत एक शांतिप्रिय देश है जिसने कभी किसी देश पर पहले हमला नहीं किया. हमारी संस्कृति 'वसुधैव कुटुंबकम' की बात करती है. लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब हम कमजोर पड़े हैं, हमारे पड़ोसियों ने हमारी पीठ में छुरा घोंपने का काम किया है. चाहे वो 1962 का युद्ध हो या कारगिल की घुसपैठ.

अग्नि 5 का एमआईआरवी संस्करण किसी देश को डराने या युद्ध शुरू करने के लिए नहीं है. यह इस बात की गारंटी है कि भारत के लोग चैन की नींद सो सकें और देश की आर्थिक प्रगति बिना किसी रुकावट के चलती रहे. चीन का एडवांस एचक्यू 19 सिस्टम इस भारतीय मिसाइल के चक्रव्यूह के सामने घुटने टेकने पर मजबूर है और पाकिस्तान के पास तो इसके सामने खड़े होने की भी हैसियत नहीं है. हमारे वैज्ञानिकों ने देश को एक ऐसा सुरक्षा कवच दे दिया है जो आने वाली कई पीढ़ियों तक भारत की संप्रभुता की रक्षा करेगा. युवाओं और पूरे देश को आज डीआरडीओ के उन गुमनाम वैज्ञानिकों को सलाम करना चाहिए जिन्होंने बंद कमरों और प्रयोगशालाओं में दिन-रात एक करके भारत की इस 'दिव्यास्त्र' को हकीकत में बदला है.

वीडियो: दुश्मन के अंडरग्राउंड ठिकानों को खत्म करेगी अग्नि-5, बंकर-बस्टर मिसाइल पर भारत की तैयारी

सामान्य प्रश्न

क्या अग्नि 5 एक इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) है?

आधिकारिक तौर पर भारत इसे एक इंटरमीडिएट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM) कहता है जिसकी मारक क्षमता 5,000 किलोमीटर से ज्यादा है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी असली क्षमता 8,000 किलोमीटर तक हो सकती है जो इसे आईसीबीएम की श्रेणी में ला खड़ा करती है.

क्या चीन का S-400 सिस्टम अग्नि 5 को रोक सकता है?

रूस का एस 400 सिस्टम बहुत बेहतरीन है, लेकिन यह मुख्य रूप से विमानों और कम दूरी की मिसाइलों के लिए है. जब अग्नि 5 अंतरिक्ष से मैक 24 की रफ्तार से कई नकली डमी वॉरहेड्स के साथ आती है, तो एस 400 का रडार भ्रमित हो जाता है और उसके लिए इसे रोकना लगभग असंभव हो जाता है

पाकिस्तान की अबाबील मिसाइल भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती है?

पाकिस्तान का दावा है कि अबाबील के पास एमआईआरवी तकनीक है. लेकिन आर्थिक कंगाली और तकनीकी सीमाओं के कारण पाकिस्तान अभी तक इसके सटीक और पूरी तरह से विश्वसनीय होने का सबूत नहीं दे पाया है. भारत का एयर डिफेंस सिस्टम (जैसे एस 400 और स्वदेशी प्रद्युम्न/अश्विन सिस्टम) पाकिस्तान के खतरों से निपटने के लिए लगातार तैयार हो रहा है.

मिशन दिव्यास्त्र का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य भारत की 'नो फर्स्ट यूज' पॉलिसी के तहत अपने दुश्मनों को यह कड़ा संदेश देना है कि अगर भारत पर कोई हमला होता है, तो भारत के पास दुश्मन के किसी भी एयर डिफेंस को चीरते हुए उसके बड़े शहरों को तबाह करने की जवाबी क्षमता मौजूद है.

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