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'फैन' पिटती है तो पिटे, हम शाहरुख के साथ खड़े हैं

शाहरुख को अपने 'सेफ़ ज़ोन' से बाहर आने पर सराहा नहीं जाएगा, तो वे कल फिर 'दिलवाले' वाले अंधेरे गड्ढे में गिर जाएंगे.

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फोटो - thelallantop
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मियां मिहिर
27 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 27 अप्रैल 2016, 12:20 PM IST)
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मनीष शर्मा निर्देशित, यशराज बैनर की, शाहरुख खान अभिनीत 'फैन' सौ करोड़ी नहीं होने जा रही है. हां, जहां यशराज अौर शाहरुख दोनों का नाम लिखा हो वहां सौ करोड़ी नहीं होना खबर होता है. अगर ऐसा हुआ तो बीते छ: साल में यह पहली शाहरुख खान फिल्म होगी जिसका डोमेस्टिक कलेक्शन सौ करोड़ के नीचे रहेगा. इससे पहले 'माई नेम इज खान' के साथ ही यह 'प्रसिद्धि' जुड़ी थी.

'फैन' की अोपनिंग बुरी नहीं थी. साल की बेस्ट अोपनिंग मिली 'फैन' को. लेकिन अगले दिनों में उसकी कमाई तेज़ी से गिरी. दूसरे हफ्ते में इसकी कमाई करोड़ों में नहीं, लाखों में सिमट गई है अौर फिल्म अपनी लागत भी नहीं निकाल पाएगी ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हैं. वजहों की तलाश हमें इन गलियों में ले जाती है.


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 फिल्म को बहुत ही खराब वर्ड-अॉफ-माउथ मिल रहा है. शाहरुख के अपने फैन ही उनकी 'फैन' के सबसे बड़े दुश्मन साबित हो रहे हैं. पहले वीकेंड पर सिनेमाहाल से फिल्म देखकर निकलते दर्शक जैसे भरे बैठे हैं. जो भी पहले हफ्ते फिल्म देखकर आया उसने अपने दोस्तों, घरवालों, शुभचिन्तकों को आगे फिल्म देखने से रोका. चाहने वालों की सोशल मीडिया पर खूब भड़ास निकल रही है.

'फैन' की तुलना टेबल फैन अौर सीलिंग फैन से की जा रही है अौर चलते पंखे को देखना फिल्म देखने से ज़्यादा मज़ेदार बताया जा रहा है. मज़ेदार बात यह कि यह वर्ड अॉफ माउथ फिल्म को मिले अोवरअॉल पॉज़िटिव रिव्यूज़ के बिल्कुल उलट रहा.


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गानों अौर प्रेम के बिना शाहरुख खान की फ़िल्म की कल्पना नहीं की जा सकती. लेकिन 'फैन' में ना गाना है अौर ना कोई प्रेम कहानी. फिल्म में स्टार के परिवार के नाम पर प्लास्टिक किरदार हैं. उधर गौरव चन्ना की कहानी में प्रेम का ज़रा सा छौंक लगता ही है कि कहानी किसी अौर गंभीर राह निकल जाती है.

लगता है कि बिना प्रेम के, बिना गीत के शाहरुख खान की फ़िल्म जनता को भाई नहीं.


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 खास कर दूसरे हाफ को लेकर लोगों में विशेष गुस्सा भरा है. पहले हाफ का फीलगुड अौर गौरव के चेहरे में दिखता बीस साल पुराने शाहरुख खान का अक्स अौर उससे जुड़ा नॉस्टेल्जिया इंटरवेल के स्टोरी टर्न के साथ भाप बनकर उड़ जाता है.

फिल्म बहुत ही डार्क नोट पर खत्म होती है. दर्शक की याद्दाश्त कमज़ोर होती है. शॉर्ट टाइम मेमोरी लॉस. सिनेमा हॉल से निकलता दर्शक पहले हाफ के प्यारे किस्सों को भूल चुका है अौर उसका गुस्सा पूरी फिल्म पर निकलता है.


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दूसरे हाफ में रामगोपाल वर्मा अौर अनुराग कश्यप की फिल्मों से भी लम्बे अौर अतार्किक दिखते चेज़ सीन दर्शकों को हज़म नहीं हुए.

सीरियस सिनेमा के प्रेमी जो कुछ दो-चार दर्शक पहुंचे भी होंगे सिनेमा हॉल, वे ये मनमर्जी की भागादौड़ी देखकर अघा गए.


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 'फैन' की सबसे बड़ी चुनौती थी एक ऐसी फिल्म को भारतीय दर्शकों को बेचना जिसमें कोई नायक नहीं है. इस चुनौती को शाहरुख खान अौर यशराज मिलकर भी नहीं जीत पाए. 'फैन' में डबल शाहरुख हैं, लेकिन दोनों शाहरुख एंटी हीरो हैं. गौरव चन्ना अपने जुनून में बुरे से बुरा करते जाते हैं. अौर आर्यन खन्ना के किरदार में वे तमाम बुराइयां पिरो दी गई हैं जो खुद शाहरुख के किरदार के साथ कुछ अफवाहों में अौर कुछ असलियत में जोड़ी गईं.

दोनों हीरो, विलेन हैं यहां. दर्शक किसी के साथ खड़ा नहीं हो पाता.


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 यह भी कहा जा सकता है कि इस बार बॉलीवुड का बादशाह एक बच्चे के हाथों हारा है. दूसरे हफ्ते में चल रही 'जंगल बुक' ने 'फैन' के बहुत दर्शक छीने.

खासकर फैमिली अॉडियंस, जिसने डार्क 'फैन' के बजाए वीकेन्ड पर बच्चों के साथ मोगली की कहानी देखना पसन्द किया.

स्वीकार करना होगा कि हिन्दी सिनेमा के सामने हॉलीवुड की चुनौती लगातार बड़ी होती जा रही है.

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लेकिन क्या फैन के लिए शाहरुख खान की आलोचना जायज़ है? 'फैन' के दूसरे हाफ के चन्द अतार्किक हिस्सों की बुराई से सहमति के बाद भी मेरा मन है कि मैं आज शाहरुख खान की 'फैन' के साथ खड़ा रहूं. अौर इसके पीछे हारनेवाले के साथ खड़ा होने का मेरा स्वाभाव ही अकेली वजह नहीं. चंद बातें अौर हैं


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हमने शाहरुख खान को इस बात के लिए कोसा है कि अब वे अपनी हर फिल्म में 'शाहरुख खान' ही लगते हैं. कि उन्होंने अपना सेफ़ ज़ोन बना लिया है अौर कभी चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं नहीं करते. कि पिछले कुछ सालों से, जबसे वे 'हैप्पी न्यू ईयर' अौर 'दिलवाले' जैसी फिल्मों में बिज़ी हुए हैं, हम उस 'डर' अौर 'कभी हां कभी ना' वाले शाहरुख को ढूंढ रहे हैं.

वो शाहरुख खान जिसने चॉकलेटी हीरो वाले ज़माने में हत्यारा नायक बनना स्वीकार किया. जिसने हीरो के बजाए एंटी-हीरो के किरदार से अपना करियर शुरु किया था. 'फैन' भी असफ़ल ही सही, लेकिन ऐसा ही एक प्रयास है. आज अगर शाहरुख की, अपने महानायक की अपने सेफ़ ज़ोन से बाहर निकलने के लिए तारीफ नहीं करेंगे तो वे कल फिर 'दिलवाले' अौर 'हैप्पी न्यू ईयर' की अंधेरी गर्त में गिर जायेंगे. 


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 यही बात हबीब फैजल की लिखी स्क्रिप्ट के लिए कही जा सकती है. हमें अपने सिनेमा में अगर वैरायटी चाहिए तो हमें इस तरह की प्रयोगशील फिल्मों को आगे बढ़कर स्वीकार करना होगा. बिना गाने के, बिना प्रेम प्रसंग के, बिना पॉज़िटिव हीरो के जिस दिन भारत में सुपरहिट फिल्म बनेगी, हमारा सिनेमा विश्व सिनेमा के कुछ अौर नज़दीक आएगा.

 नहीं, गाने बुरे नहीं हैं, लेकिन सिनेमा में उनकी अनिवार्यता बुरी है. हमें अपने फिल्मकारों को प्रयोगशीलता के लिए कुछ अौर छूट देनी चाहिए, अौर प्रयोग में असफ़ल होने के लिए भी.


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 एक अौर बात, क्या आप फिल्मों को उनके बॉक्स अॉफिस कलेक्शन के लिए याद रखते हैं? मैंने अपने दर्जन भर रैंडम दोस्तों से पूछा कि उनकी फेवरिट शाहरुख खान फ़िल्म कौनसी है. इनमें शाहरुख को पसन्द करने वाले भी थे अौर उनके हेटर भी. सात का जवाब 'स्वदेस' था.

लेकिन क्या आपको मालूम है कि 'स्वदेस' ने बॉक्स अॉफिस पर क्या कमाया था? सिर्फ पन्द्रह करोड़. क्या इससे 'स्वदेस' का सिनेमा के इतिहास में महत्व रत्ती भर की कम होता है? ज़रा भी नहीं. तो फिर यह बॉक्स अॉफिस का कीड़ा हमें क्यूं हो?

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