भारत और पाकिस्तान जब एक हुआ करते थे. तब के पंजाब में झल्ला नाम का एक मल्लाह था.उसका इकलौता बेटा था छल्ला. छुटपन में ही मां चल बसी. घर पर बस बाप-बेटा रह गए.झल्ला बेटे को कभी अकेला न छोड़ता. नाव खेता तो बेटे को भी साथ ले जाता. एक रोजझल्ला की तबियत ठीक न थी. उसने सवारियों को पार लगाने से मना कर दिया. सवारियों नेजिद की. 'अपनी जगह अपने बेटे को भेज दे. बड़ा हो गया है. नाव चला लेगा.' झल्ला पहलेतो न माना. पर सवारियों ने जिद की तो बेटे को भेजना पड़ गया. कुछ कहते हैं छल्लारूठकर नाव ले गया था. छल्ला की कहानी का दूसरा वर्जन भी मिलता है. जहां छल्लानिशानी वाला है. किसी कहानी में किसी का पति विदेश गया है. किसी का आशिक बिछड़ा हैऔर छल्ला निशानी दे गया है. यहां सुंदरी छल्ला देख-देख गाती है. उधर 'छल्ला'गली-गली रोता फिरता है. पर कहानी तो है झल्ले के छल्ले की. छल्ला जो नाव लेकर गयातो फिर न लौटा, पानी में डूब गया. झल्ला बेटे से बिछड़कर पागल हो गया. तभी तो पागलपनकी बातें करने वालों को झल्ला कह देते हैं लोग. नदी किनारे बेटे को कई दिनों तकखोजता रहा. बेटा न मिला तो उसने गाना शुरू कर दिया. हो जावो नि कोई मोर लियावो, निमेरे नाल गया आज लड़ के. ओ अल्ला करे जे आ जावे सोहना, देवां जां कदमा विच धर के.झल्ला को लगता कि छल्ले की मां रहती. उसे संभालती उसके आंचल की छांव में रहता तोबेटा कभी न मरता. छल्ला की मां को याद कर गाता 'वे गल सुन छल्लेया, कांवां वेमांवां ठंडियां छावां' यही गाते-गाते बाद में झल्ला पाकिस्तान के गुजरात जाकर मरगया. वहीं उसकी समाधि बनी. पंजाब के लोकगीतों और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में येलोकगीत आज भी गाया जाता है. छल्ला और झल्ला मर गए लेकिन झल्ले का गाना और उसकीकहानी अमर हो गई. सालों बीते, वही पाकिस्तान, वहीं हुआ एक नौटंकी थियेटर. पाकिस्तानमें हुआ सो बाद में पाकिस्तान थियेटर कहलाया. उसके मालिक थे फज़ल शाह. फजल शाह नेछल्ला का जो वर्जन लिखा वो आज तक हर कोई गा रहा है. फजल शाह के लिखे गाने पर संगीतदिया उनकी बीवी ने, उन दोनों का गोद लिया एक बेटा था आशिक हुसैन जट्ट. आज से 81 सालपहले उसने वो गाना गाया. तब 1934 में एलपी पर गाना रिलीज किया था HMV ने. कुछ सालबीते. फिर वही पाकिस्तान, वही पंजाब, जिला मंडी बहाउद्दीन. वहां हुए इनायत अली.सत्तर के दशक की शुरुआत थी. लाहौर के रेडियो स्टेशन पर इनायत अली ने छल्ला वालागाना गाया. अपने अंदाज़ में. गाना इतना फेमस हुआ कि इनायत अली खान का नाम ही इनायतअली छल्लेवाला पड़ गया. https://www.youtube.com/watch?v=kzpaKErq_Qw इनायत अली केभाई हुए शौकत अली उन्होंने भी यही गाना गाया. उनकी आवाज में भी ये गाना सुनिएhttps://www.youtube.com/watch?v=TBpD6bxAisE साल 1986 इस बार हिंदुस्तान का पंजाब.हरपाल तिवाना ने एक फिल्म बनाई थी. लौंग दा लश्कारा. राज बब्बर थे, ओम पुरी भी थेफिल्म में. गुरदास मान परदे पर छल्ला गाते नजर आए. पाकिस्तानी आज भी शिकायत करतेहैं कि गुरदास मान ने इनायत अली को क्रेडिट नहीं दिया. समझ-समझ की बात है. कौन कहेइनायत ने भी कहीं से उठाया ही था. https://www.youtube.com/watch?v=Xh7Lwotf-lE1986 में इस फिल्म के रिलीज होने के एक साल पहले पंजाब के ही लुधियाना में सरदारमंजीत सिंह राय के यहाँ एक लड़का हुआ. नाम रखा सिमरनजीत सिंह राय. युवराज सिंह केपापा से क्रिकेट खेलना सीखता था. क्रिकेटर तो न बन पाया. उठ कर मेलबर्न चला गया.2008 की एक रात बिस्तर पर यूं ही पड़े-पड़े यू-ट्यूब पर एक वीडियो अपलोड कर दिया.टाइटल था 'ऑस्ट्रेलियन छल्ला'. झल्ले का छल्ला ऑस्ट्रेलिया पहुंच गया है. टैक्सीचलाता है. उसी की कहानी कह रहा है. वीडियो हिट हो गया. छल्ला ऑस्ट्रेलियन हो चुकाथा. https://www.youtube.com/watch?v=zlcYFoJIuuU सिमरनजीत सिंह राय आजकल बब्बल रायहो चुका है. https://www.youtube.com/watch?v=4mYdfTyHRxw बब्बल के छल्ला के दो सालबाद साल 2010 में इमरान हाशमी की एक फिल्म आई 'क्रुक'. बब्बू मान ने एक गाना गाया.'छल्ला इंडिया' ऑस्ट्रेलिया में काम करने वाले टैक्सी ड्राइवर्स की कहानी फिर सुनाईजा रही थी. सब कुछ वही जो बब्बल राय ने गाया था. अब झल्ले का छल्ला फ़िल्मी हो चुकाथा. https://www.youtube.com/watch?v=7CbQxyftNo4 2012 में यशराज बैनर की फिल्म 'जबतक है जान' में छल्ला फिर नजर आया. यश चोपड़ा की डायरेक्ट की इस आखिरी फिल्म मेंछल्ला बन गिटार बजा रहे थे शाहरुख खान. गाना गाया था रब्बी शेरगिल ने. वहां जो डूबातो झल्ले का छल्ला, लंदन ब्रिज पर नजर आया.https://www.youtube.com/watch?v=jC-H0g6T26g हमने ये स्टोरी फेसबुक पर पोस्ट की.और मशहूर गीतकार वरुण ग्रोवर ने इसमें एक पंख और जोड़ दिया. रब्बी शेरगिल का वोछल्ला, जो प्राइवेट एलबम का हिस्सा था. आप भी सुनिए.https://www.youtube.com/watch?v=aDPowNJ9QoA&feature=youtu.be