फिल्म: मोहन जोदारो । निर्देशक: आशुतोष गोवारिकर । कलाकार: ऋतिक रोशन, पूजा हेगड़े,कबीर बेदी, अरुणोदय सिंह, सुहासिनी मुलै, मनीष चौधरी, नितिश भारद्वाज, शरद केलकर,नरेंद्र झा, किशोरी शहाणे । अवधि: 2 घंटे 30 मिनटआगे Spoilers/खुलासे हैं, अपने विवेक से ही पढ़ें. स्वदेस (2004) मोहन भार्गव नाम केभारतीय की कहानी थी जो अमेरिका की अंतरिक्ष विज्ञान संस्था नासा में प्रोजेक्टमैनेजर हो गया है लेकिन देस और कावेरी अम्मा जैसे अपने लोगों के चेहरे उसे अपनी ओरखींचते हैं. वह उस ब्रेन ड्रेन का हिस्सा बनकर नहीं रह जाना चाहता जो भारत में बेहदसीमित लोगों को हासिल होने वाले उच्च संस्थानों की शिक्षा लेकर विदेश चले जाते हैंऔर मोटी-मोटी सैलरी लेकर जीवन सफल बनाते हैं. मोहन लौटकर अपने देस की मिट्टी मेंमिल जाना चाहता है. अपने लोगों के लिए कुछ करना चाहता है. उनके अंधविश्वास दूर करनाचाहता है, उनके जीवन में रोशनी लाना चाहता है. इसलिए वह आता है और गांव चरणपुर मेंवहीं के संसाधनों से बिजली बनाता है. उसी तरह लगान (2001) भुवन नाम के साहसीग्रामीण युवक की अंग्रेजों के दोहरे लगान के खिलाफ खड़ी की गई लड़ाई थी. ये नाइंसाफीके खिलाफ खड़े होने के अलावा सम्मान की बात भी थी. जब किसी और धरातल पर ब्रिटिशर्ससे लड़ पाना संभव नहीं था और बल्ले व गेंद के खेल को लेकर भी उन्हें ज़लील किया जारहा था तो उसने ऐसा सहन करने से बग़ावत कर दी. यह वैसा ही विचार था कि इस धरती परपैदा हुए और इस पर खेलने वाले हम सब बच्चे समान हैं, और खेल एक ऐसी चीज़ है कि येनहीं देखती खेलने वाला गोरा है कि काला, सवर्ण है कि दलित, आदमी है कि औरत. यहीभुवन की सोच थी. कि ये खेल तो सबके हैं, फिर इसमें कोई कैसे सत्ता हो सकता है? अबइन्हीं फिल्मों के निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की नई प्रस्तुति मोहन जोदारो सरमन कीकहानी है जो प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के नगर मोहन जोदारो का काल्पनिक पात्र है.वह सत्ता परिवर्तन, न्याय और सुशासन के लिए लड़ता है. ये पात्र ऐसे समय में आया हैजब जिग्नेश मेवानी जैसा असल पात्र इन दिनों इसी प्रकार के बदलाव की कोशिश कानेतृत्व कर रहा है. मुंबई की अभियान मैगजीन में रिपोर्टर की हैसियत से काम करनेवाला यह युवक अभी दलितों के आंदोलन को दिशा दे रहा है. उसकी लड़ाई भी हाशिये पर रखेगए इन लोगों को ऐसी व्यवस्था की ओर ले जाना है जहां उन्हें गायों, बैलों, अन्यपशुओं की चमड़ी निकालने का 'नीचा' काम न करना पड़े और चौराहे पर नंगे बदन ताकतवरों कीज़लालत भरी मार न झेलनी पड़े. एक ऐसी व्यवस्था जहां उन्हें भूमि और अवसरों का समानवितरण मिले. मोहन जोदारो मूल रूप से इस कहानी में वो नगर है जहां लोग खुशी-खुशीरहते थे. सिंधु नदी का तलछट था उसी से सटकर गांव बसते गए. पानी था, प्रकृति थी, तोकिसी और चीज़ की जरूरत न थी. लेकिन फिर वहां एक ऐसा पुरुष पहुंचता है जो अपने साथलोभ, निर्दयता, बल, बदले की भावना लेकर आता है. उसका नाम है महन. कबीर बेदी द्वाराअभिनीत यह पात्र तत्कालीन हड़प्पा सभ्यता का वासी था लेकिन वहां उसके घपले सामने आएतो प्रशासकों ने धक्के मारकर बाहर निकाल दिया. अब वह मोहन जोदारो में आता है. यहांएक ईमानदार, दूरदर्शी और अच्छा प्रमुख (ऋतिक के पात्र सरमन का पिता) नियुक्त है.महन जिन विकारों से इस नगर की बर्बादी की नींव रखता है वो हमें आज 2016 में भीउन्हीं अविश्वसनीय समानताओं के साथ विद्यमान दिखते हैं. वे विकार हैं साम्राज्यवाद,हथियारों की दौड़, युद्ध की मानसिकता, लोभ, बांधों का निर्माण, प्रकृति से छेड़छाड़,जनता के सेवक से मालिक बन बैठना और असमानता में वृद्धि. इसके बेपनाह उदाहरण भारत सेलेकर विश्व भर में मौजूद हैं.हम सेना और युद्ध को लेकर जब काव्यात्मक होने लगते हैं तो हमें महन की कहानी जाननीचाहिए. वह मोहन जोदारो के प्रशासकों को कहता है कि नदी जिस घाटी से होकर आती हैउसके तल में सोन (सोना) निकलता है. वहां बांध बनाकर नदी का रुख मोड़ना चाहिए ताकि जबतल पर से जल हट जाएगा तो ज्यादा सोन निकाला जा सकेगा और उसे दूसरे नगरों को बेचकरताकतवर बना जा सकेगा. अब यहां तत्कालीन प्रमुख की चिंता देखें. वह कहता है कि बांधगैर-जरूरी है, इससे नदी के किनारे बसे गांव के गांव प्यासे रह जाएंगे, बर्बाद होजाएंगे. वे जिएंगे कैसे? लेकिन महन बाकी दरबार के लोगों को डर और लोभ दिखाकर अपनेपक्ष में ज्यादा वोट कर लेता है. फिर वो उस प्रमुख को मरवा देता है. अब उसका असलइरादा देखें, उसने बांध बनाया जिससे नदी किनारे बसे गांव पानी न होने पर आकर मोहनजोदारो में ही बसने लगे. इससे उसका साम्राज्य और ताकत बढ़ गई. और सोन ज्यादा सेज्यादा निकालकर व बेचकर वो लोगों के लिए समृद्धि नहीं बल्कि सुमेर राज्य केव्यापारियों से हथियार खरीद रहा था. ताकि एक दिन हड़प्पा पर चढ़ाई कर सके. प्रतिशोधले सके. उसे लोगों की सेवा कतई नहीं करनी थी. फिल्म के आखिर में जब महन अपने उतनेही बुरे बेटे मूंजा (अरुणोदय सिंह) को कहता है कि वो अपनी प्रिय चानी (पूजा हेगड़े)को मार दे और जब वो कहता है कि वह उससे प्रेम करता है तो महन समझाता है कि प्रेमव्रेम कुछ नहीं होता है. सत्ता जरूरी है. ताकि भोग भोग सको. एक बार सत्ता बनी रहीतो जिस भी लड़की पर नजर डालोगे वो तुम्हारी होगी. इस महन के नगर में, पड़ोस के आमरीका रहने वाला नौजवान सरमन (ऋतिक रोशन) पहली बार व्यापार करने आता है और धीरे-धीरेउसकी बुरी सत्ता का अंत करता है. इस कहानी में कई सारे पहलू हैं लेकिन जो याद रहेगावह ये कि जब सरमन के हाथ में लोगों का नेतृत्व आता है तो वो क्या करता है? उसकेप्रशासन में पूर्व-शासक के मुकाबले क्या फर्क होता है? सबसे पहले तो सिंहासन ही तोड़दिया जाता है. वो जनता के बीच खड़ा रहने वाला ही बना रहता है. वह कहता है अब मोहनजोदारो के लोग ही शासन करेंगे. उसके बाद जब एक विनाशकारी आपदा इस पूरी नगर सभ्यताको नष्ट करने को होती है तो अद्वितीय तत्परता से वह एक कुशल प्रशासक की तरह नेतृत्वकरता है और लोगों की ऐसे जान बचा लेता है कि यकीन नहीं होता है. सरमन ही वो नायकबनता है जो गंगा नाम की एक नदी के किनारे फिर से ये सभ्यता स्थापित करता है. इसफिल्म में लगान जितने अनुपम संवाद और गीत नहीं हैं. इसमें स्वदेस वाली मनोरंजकसरलता, भीनी भीनी मिठास और सम्मोहक आकर्षण नहीं है. इसके पात्रों के अभिनय में वोअभिनव व्यावहारिकता और अमरता नहीं है जो उन दोनों फिल्मों में आमिर-शाहरुख व अनेकअन्य अभिनेताओं में थी. इसमें क्रिकेट, बिजली या नासा जैसे रोचक संदर्भ भी नहीं हैंजिनके कारण दर्शक बिना खास प्रयास के कहानी से आकृष्ट हो जाता है. ये कहानी ऐसीसिंधु घाटी सभ्यता की है जिसे कभी किसी ने नहीं देखा. जिसके लोगों की सही भाषा, सहीकपड़े, रंग, कद-काठी, भाव कोई सही-सही नहीं जानता. ये एक बहुत बड़ी कठिनाई है जोनिर्देशक आशुतोष के लिए दुष्कर चुनौती साबित हुई होगी. पर इसमें वो ठीक ठाक काम करजाते हैं. कॉस्ट्यूम, मोहन जोदारो की बनावट, शिल्प, लोगों की बोली में प्रयोग (जैसेये बहुत सही फैसला रहा कि फिल्म के पात्र जानवर को जिनावर, सपना को सपीना, राक्षसको राकस, कृपा को किरपा, चांदनी को चानी कहते हैं). चूंकि मोहन जोदारो का असलीउच्चारण मुअनजो दड़ो यानी मौत का टीबा है और ये सिंधी भाषा से आया है तो हमें दिखायाजाता है कि फिल्म के शुरुआती सीन में एक बुजुर्ग कुछ देर इसी भाषा में बात करता है.रस्मी तौर पर यह करने के बाद सिर्फ हिंदी चलती है. लेकिन फिर भी फिल्म देखने लायकहै. ए. आर. रहमान पूरे एल्बम के साथ प्रतिबद्ध नहीं रह पाते लेकिन फिल्म की पहचानवाली एक-दो धुनें बनाने में वे सफल रहते हैं जिन्हें बीस साल बाद भी सुनेंगे तोपहचान कर लेंगे कि कौन सी फिल्म की है.लगान और स्वदेस के साथ जिस बात के लिए ये फिल्म समान मंच पर खड़ी होती है वो है इसकासंदेश. उस लिहाज से फिल्म जितना अपने अंत के करीब बढ़ती है उतनी ही हमें अच्छी लगनेलगती है. अंतिम दृश्य और एंड क्रेडिट्स तक हम इसकी तमाम कमजोरियां भूल चुके होतेहैं. मन में कामना रह जाती है कि यदि मोहन जोदारो भाग-2 बनती है तो इससे बहुत अनुपमकहानी देखने को मिल सकती है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ो:फिल्म रिव्यू: जो जीता यहां है रुस्तम वही!