नौजवानों को किसी ने नहीं 'बहकाया', वे बुद्ध भी जानते हैं, 'बुद्धा स्माइलिंग' भी
फिल्म रिव्यू : 'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम'

'चॉकलेट', 'धन धना धन गोल' आैर 'हेट स्टोरी' बनानेवाले निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की 'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' शुरु तो बस्तर से होती है, लेकिन अपनी आत्मा में यह शुद्ध कॉलेज कैम्पस फिल्म है, या शायद होनी चाहिए थी. ऐसी कॉलेज कैम्पस फिल्म जिसे समकालीन राजनैतिक संदर्भों में 'बड़ी' अौर निर्णायक होने की चाहत खा गई. जिसका खुरदुरापन कई जगह आकर्षित करता है, लेकिन जिसकी निष्कर्षों पर पहुंचने की जल्दबाजी उस खुरदुरेपन की, उस रवां खूबसूरती की निर्मम हत्या कर देती है.
हैदराबाद के प्रतिष्ठित बिजनस स्कूल में पढ़ रहे विक्रम पंडित (अरुणोदय सिंह) अौर उनके साथी अपने प्रोफेसर रंजन बटकी (अनुपम खेर) से गहरे प्रभावित हैं. इस यंग, रेस्टलेस सोशल मीडिया चैम्पियन में प्रोफेसर बटकी उम्मीद देखते हैं. उधर एक अौर कहानी बस्तर में घट रही है, जहां फिल्म के अनुसार पिछले तीन हज़ार साल से कुछ नहीं बदला है अौर आज आदिवासी सरकार द्वारा चलाए जा रहे 'सलवा जुडूम' अौर नक्सलवादियों के बीच पिस रहे हैं.
प्रोफेसर रंजन की पत्नी की भूमिका में पल्लवी जोशी बहुत दिनों बाद परदे पर नज़र आई हैं, अौर शायद इस उग्र फिल्म का सबसे सुकून भरा कारक हैं. शीतल बटकी (पल्लवी) अपने पति के साथ मिलकर एक मिट्टी के बर्तन बनाने अौर बेचने वाली संस्था चलाती हैं, जिसे सरकार से बड़ा फंड मिलता रहा है. इस फंड से वे आदिवासियों की मदद करती हैं. फिर एक दिन सरकार को पता चलता है कि उनका दिया पैसा आदिवासियों के पास नहीं, नक्सलियों के पास जा रहा है. अौर मदद रुक जाती है. यह सब होता है साल 2014 में. यहीं विक्रम मदद के लिए उतरता है. लेकिन कहानी फिर सबसे संभावित पलटा खाती है अौर विक्रम खुद अनदेखे, अनचाहे दलदल में फंस जाता है. यहां अन्य किरदार भी अपने असल चेहरों के साथ सामने आते हैं अौर जैसा हमारे माननीय मुख्यमंत्री कहते रहे हैं, पता चलता है कि 'सब मिले हुए हैं'.
'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' फिल्म बेहतर हो सकती थी, गर ये खुद को संदर्भित करने का काम खुद ही शुरु ना कर देती. इसे थोड़ा लापरवाह होने की ज़रूरत थी, या कि फिर अपने लापरवाह किरदारों को थोड़ा अौर इज़्ज़त देने की.
फिल्म के वो हिस्से सबसे बढ़िया हैं जहां किरदार 'बिग पिक्चर' का सिरा छोड़ बेपरवाह कनवर्सेशंस में बह जाते हैं. लेकिन फिल्म में गंभीर टेक्स्ट बनने की इतनी अदम्य इच्छा है कि पूरी फिल्म खुद को 'चैप्टर्स' में बांटकर खुद ही कथासूत्र तोड़ती चलती है. अौर कांटेक्स्ट की फिक्र इतनी कि कहानी को बाकायदे 2000 BC से शुरु कर 2014 तक लाया गया है. बार-बार फिल्म में किरदार 2014 का संदर्भ लेकर आते हैं, अौर मज़ेदार बात ये है कि हर बार इस 2014 को फिल्म में ऊपर से डब कर जोड़ा गया लगता है. लगता है कि जिस साल से 'दुनिया बदली' उसकी खबर रचनाकारों को पहले से थी, बस वे फिल्म में उसका सही उल्लेख करना भूल गए थे.
फिल्म की राजनीति के साथ कई दिक्कतें हैं. इनमें कई उसे लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा से विरासत में मिली हैं, जैसे — 1.
आदिवासियों का 'भोले ग्रामीण इंसानों' के रूप में एकायामी चित्रण,
2.
जहां समस्या समझ ना आए वहां भ्रष्टाचार को सब समस्याअों की जड़ बनाकर खड़ा कर देना,
3.
सशक्त दिखती स्त्री किरदारों को हमेशा 'धोखा खाने वाली' अौर फिर त्याग की मूरत बन जाने वाली भूमिकाअों में रखना,
4.
जिन बहसों का हल इंसानियत भी ना खोज पाई हो, उनका 2 घंटे की फिल्म के अन्त में समाधान कर देना आदि.
लेकिन कई अन्य समस्याएं इस फिल्म ने खुद कमाई हैं. जैसे −
1.
सबसे पहले तो जिन भारत के छात्रों को यह फिल्म समर्पित की गई है, वो इसके सबसे बड़े शिकार हैं. सत्ताईस-अट्ठाइस की उमर की पढ़ी-लिखी नौजवान पीढ़ी को यहां समझदारी में तकरीबन भेड़-बकरियों की तरह ट्रीट किया गया है. कि उनकी अपनी कोई समझ नहीं, अपनी कोई राजनीति नहीं. कि कोई भी उन्हें हांक देता है. कि उन्हें 'बचाया' जाना चाहिए. यही फिल्म की कुल जमा समझदारी बनती है अपने मुख्य किरदारों को लेकर.
शायद फिल्मकार को यह याद दिलाए जाने की जरूरत है कि इस देश में वोटिंग की उम्र 18 है अौर इस देश के लोकतंत्र को इसी 'बहकाई गई' नौजवान पीढ़ी ने बचाया है, हर बार बचाया है. उन्हें 'बचाए जाने' की ज़रूरत नहीं है, दरअसल वे हमें बचाने वाले हैं.
2.
दूसरी समस्या है राजनीति की इकहरी समझ, जिसमें स्वयं एक किस्म की राजनीति को प्रचरित करते हुए (जो अपने आप में ज़रा भी बुरा नहीं) फिल्म चाहती है कि उसे 'गैर-राजनीतिक' माना जाए. क्योंकि 'मिडिल क्लास' को गैर-राजनीतिक कहलाया जाना पसन्द है. फिल्म आपको नायक के 'निरपेक्ष' चरित्र के माध्यम से यह विश्वास दिलाना चाहती है कि पूंजी के बल पर समस्याअों का समाधान खोजना स्वयं में कोई राजनीतिक विचार नहीं. कि उसके नायक को किसी पक्ष का प्रतिनिधि ना समझा जाए.
मुझे परेशानी 'पूंजीवाद' के समर्थन से नहीं, बल्कि इस बात से है कि इसे एक स्थापित राजनैतिक विचारधारा मानने में फिल्म इतनी शर्मिन्दा क्यों है?
राजनीति कोई बुरी चीज़ नहीं, यह नहीं होगी तो लोकतंत्र कैसे होगा? अौर हिन्दुस्तान में हम सब राजनैतिक प्राणी हैं, आज मैं यह गर्व से कहना चाहता हूं.
3.
तीसरी अौर शायद सबसे पहचानी हुई राजनैतिक समस्या है अपने 'दुश्मन' को किसी मैग्निफाइंग ग्लास से बड़ा कर प्रदर्शित करना. जब दुनिया का दादा अमेरीका यह सालों से करता आया है, तो विवेक अग्निहोत्री को ऐसा करने से कौन रोक सकता है. क्लाइमैक्स में जिस किस्म का 'नक्सल नैक्सस' किसी रेवेलेशन की तरह सामने लाने की कोशिश है, 'दुश्मन' को बड़ा बनाकर अपनी लड़ाई के लिए 'जस्टिफिकेशन' हासिल करने की इसी पुरानी कोशिश का हिस्सा है.
मेनस्ट्रीम मीडिया अौर सरकार द्वारा सालों की मेहनत के बाद खड़े किए गए 'नक्सल इन यॉर बैकयार्ड' वाले डर को भुनाने की कोशिश में फिल्म अति पर चली जाती है. लेकिन फिर 'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' एक फिल्म के तौर पर हारती भी यहीं है.
एक फिल्म के तौर पर 'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' वहां हारती है जहां क्लाईमैक्स सीन में पहुंचकर 'बिग रेवेलेशन' होता है. फिल्म 'तुम्हारा बाप, मेरा पति, ये लाइब्रेरियन.. ये नक्सल कहीं भी हो सकते हैं' के साथ राजनैतिक भूमि पर अपनी असल आत्मा निकालकर सामने रखती है, अौर उसे जस्टिफाई करने के लिए ट्रिप्पी शॉट, स्लो-मो, शार्प क्लोज़अप, ब्लर इमेजेज़, रेड लाइटिंग, सेक्स तक सब इस्तेमाल कर डालती है.
पूरे दम से कहानी सुनाने के बाद भी आपको अन्त में कहे निष्कर्षात्मक स्टेटमेंट में असर पैदा करने के लिए ये सब सिनेमाई तमाशे करने पड़ें, तो समझ लीजिए कि आप एक फिल्मकार के तौर पर हार गए. जैसे ही तमाशा शुरु हुआ, स्टोरीटेलिंग की ताकत, सिनेमा माध्यम की ताकत वहीं खत्म हुई.
इससे तो बेहतर होता कि यही सब आप एक भाषण या निबंध में कह लेते.
https://www.youtube.com/watch?v=PUerfLVrthA
