फिल्म रिव्यू- बंदर
बॉबी देओल की नई फिल्म 'बंदर' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.

फिल्म- बंदर
डायरेक्टर- अनुराग कश्यप
एक्टर्स- बॉबी देओल, सपना पब्बी, इंद्रजीत सुकुमारन, सान्या मल्होत्रा, राज बी. शेट्टी, सबा आज़ाद, जितेंद्र जोशी
रेटिंग- 4 स्टार्स
जेल में बंद समर एक रोज़ होश ही खो बैठता है. जेल के टॉयलेट में चप्पल से कॉकरोच मारे जा रहा है. शिकायत करता है. ‘इन्हें कितना भी मारो ये ख़त्म नहीं होते.’ जंतर-मंतर में 6 जून के प्रोटेस्ट के एक दिन पहले रिलीज हुई ‘बंदर’ का ये दृश्य है. कोई और मौक़ा होता तो फ़िल्म की पीआर टीम या सटायर पार्टी अपने हितों के लिए सुविधानुसार इस्तेमाल कर लेती.
2018 का साल है. समर मेहरा के जीवन में कई साल छोटी गर्लफ्रेंड ख़ुशी (सबा आज़ाद) है. एक दिन उस पर गायत्री नाम की महिला के रेप का आरोप लगता है. समर का कहना है कि ये कंसेट से हुआ सिर्फ एक बार का सेक्स था. साथ ही वो महिला उसके घर पर थोड़ा बहुत इंटीरियर का काम कर रही थी. इससे ज़्यादा वो अपने बचाव में न कुछ कह पाता, न साबित कर पाता है. वो टीवी की दुनिया का फुंका हुआ कारतूस है. गा भी बढ़िया लेता था. सितारे गर्दिश में थे तो गाने का ये टैलेंट, ऊंघते श्रोताओं के बीच शादी में गाते हुए काम आता. फ़िल्म असल जीवन की कहानियों से प्रेरित बताई गई. प्रोड्यूसर निखिल द्विवेदी को कहानी का विचार किसी अनछपी किताब से आया था. असली केस का अंदाज़ा लगता भी है और नहीं भी. क्योंकि एक जैसी कई कहानियां एक साथ चलती लगती हैं. फ़िल्म का मूल विचार और कोशिश न्याय व्यवस्था में झूठे आरोपों के शिकार अंडर ट्रायल कैदियों की दुर्दशा दिखाना था. साथ ही जेंडर के परे सिर्फ़ ‘न्याय मिल पा रहा है या नहीं’ पर ध्यान दिलाना था, ये काम फ़िल्म आराम से कर लेती है. शेष चीजें बोनस हैं.
फ्रांज काफ्का की ही ‘द ट्रायल’ में एक सुबह दो अजीब से एजेंट आकर जोसेफ के. को गिरफ्तार कर लेते हैं. जोसेफ को समझ भी नहीं आता कि उसका अपराध क्या है. अंत तक वो ख़ुद पर लगा आरोप तक नहीं जान पाता. दो पुलिसवाले समीर के घर पर आकर उसे उठा ले जाते हैं. सरकारी अप्रोच, भाषाई मजबूरी ऐसी कि समर को कारण तक नहीं पता चलता. ऐसी ही अब्सर्डिटी के साथ ‘बंदर’ फ़िल्म स्पीड पकड़ती है. समर की गिरफ्तारी के बाद आता है पुलिस थाने का वो सीन जो ट्रेलर में भी दिखता है. फ़िल्म के प्रमोशन में बारंबार इस 17 मिनट तक लगातार शूट हुए सीन की चर्चा हुई है. फ़िल्म देखकर समझ भी आता है कि क्यों हुई है? ठीक हुई है. जीतेन्द्र जोशी पर्दे पर सबको खा गए हैं. उनके सामने बॉबी देओल की हताशा भरपूर ट्रांसलेट हुई है. जो ये तसल्ली दिला जाती है कि एक्टिंग के संदर्भ में आपको बॉबी देओल की चिंता नहीं करनी है. वो लॉर्ड बॉबी के किसी भी मीमीकृत संस्करण या सिर में ग्लास लेकर नाचने से आगे बढ़ चुके हैं. लोगों का कमबैक होता है, बॉबी देओल का कमबैक के बाद कमबैक हुआ जा रहा है. इस बार बैकग्राउड में सोल्जर-सोल्जर बजाने की ज़रूरत भी नहीं है.
ये कहानी बॉबी देओल से एक्टिंग करा लेने के बारे में कतई नहीं है. बॉबी का काम इतने औचक तरीके से शुरू होता और चलता जाता है, मानो वो सेट पर आने के पहले भी ऐसा ही जीवन जी रहे थे. ईएमआई देने के स्ट्रगल, जाते हुए स्टारडम, आते हुए बुढ़ापे, लगातार पीठ और दांत दर्द के बीच समर मेहरा की लंपटई नहीं जाती और इसे वो भावुक पलों में स्वीकारता भी है. जवान लड़कियों की तस्वीर ज़ूम कर-कर निहारता, टिश्यू पेपर के डिब्बे खाली करते समर से कुछ दृश्यों में घिन भी आती है. वैसी ही जैसी ‘द व्हेल’ में ब्रेंडन फ़्रेज़र को ऐसे ही काम करते देख आती है. लेकिन जल्द ही आप उसे स्वीकार कर लेते हैं.
फ़िल्म छोटे-छोटे कई हिस्सों में चौंकाती या बात कहती जाती है. समर का जीवन नर्क़ होने के पहले ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ कहा जाना. एक जज का इतना पूर्वाग्रही होना कि व्हाट्सऐप पर बॉलीवुड के बारे में पढ़े 50 भड़काऊ मैसेज एक साथ याद आ जाएं. नोटबंदी की परेशानियों का ज़िक्र. ‘बच्चन साब बोला है, नो मींस नो’ जैसे डायलॉग, निर्भया केस के दोषियों को जेल में मल खिलाकर स्वागत करने की बात, गायत्री के किरदार का समर के घर से निगेटिव एनर्जी हटाने के कोशिशों और कई क़िस्म के छोटे अनुष्ठान एक चर्चित फ़िल्मी प्रकरण सा आभास देते हैं. ये तमाम चीजें बार-बार खींचकर असली दुनिया में ले जाता है और याद दिलाता रहता है कि फ़िल्म के साथ अनुराग कश्यप का नाम नत्थी है.
पर फ़िल्म में जिस मौके पर बनाने वालों ने सबकुछ झोंक दिया है, वो हैं जेल वाले दृश्य। कहानी जब जेल के अंदर पहुंचती है सबकुछ बदल जाता है. जेल के अंदर के नियम कायदे, बंटी हुई हांडियां, नाना प्रकार के किरदार. एक कोने में इंस्टाग्राम पर हिंदी बोलने वाला वायरल नाइजीरियन आगू स्टेनली बैठा दिखता है. कहीं पर झींकते हुए ‘सब याद रखा जाएगा’ वाले आमिर अज़ीज़, छिपकली सूंघते राज बी. शेट्टी हों या एक झक में जाकर रोता बूढ़ा, सब ध्यान भी खींचते हैं, असहज भी करते हैं. गर्दन पर तौलिया रखे पुलिसकर्मी बने संजय गांधी अलग ध्यान खींचते हैं. थिएटर में काम करने वाले सैकड़ों कलाकारों को अंडरट्रायल कैदियों के रोल दिए गए. इन सबके बीच इंद्रजीत सुकुमारन और सुकांत गोयल का काम अलग ही नज़र आता है. फ़िल्म में दो ही मौके हैं, जो थोड़ी राहत देते हैं. समर की बहन बनीं सान्या मल्होत्रा की भागदौड़ के कुछ दृश्य और पिंजरा वाला गाना.
जेल है तो जेल के नियम भी हैं. जो कैदियों को न्यूनतम इंसान बना रहे होते हैं. एक जगह समर से पिता का नाम पूछा जाता है. वो सरनेम के साथ उनका फ़ौज का पद बताता है. गालियों के साथ उसे ज़मीन पर लाया जाता है. सोसायटी में उसकी या परिवार की जो भी पहचान रही हो, वहां से वो गिरकर कहां पहुंचा है, ये बताया जाता है. अब उसके स्ट्रगल अलग हैं. क्लॉस्ट्रोफोबिया होना, पीठ का दर्द, दांत का दर्द जैसी समस्याएं कोई सुन भी नहीं रहा होता. एक चप्पल तक के लिए संघर्ष होता है. फ़िल्म का अंत कैसे होता है? क्या समर ने अपराध किया था? क्या लड़की ने झूठे केस में फंसाया? फ़िल्म किसका पक्ष ले रही है? क्या जैसा दिखाया गया, केस उससे उलट था? ऐसे सारे सवालों का विराम फ़िल्म के अंत में मिलता है. जिस बारे में बात करना, फ़िल्म देखने का मज़ा ख़राब करेगा. और ऐसा किसी स्पॉइलर के कारण नहीं, फ़िल्म के साथ चल रही दर्शक जर्नी के कारण होगा.
फ़िल्म में कॉकरोचों का भरा-पूरा वर्णन है. न्यूक्लियर हमले में बच जाने का भी. बॉबी देओल ने एक बातचीत में दी लल्लनटॉप को बताया भी था कि फ़िल्म के दौरान उन्हें बहुत से कॉकरोच हाथ से भी उठाने पड़े थे. एक आरोप के बाद इंसान के तिलचट्टे जित्ते रह जाने की कहानी है बंदर. जो काफ़्का की मेटामॉर्फ़सिस की कई बार याद दिला जाती है. फ़िल्म एक बुरे सपने जैसी है. जो ख़त्म होने का नाम नहीं लेता, और ये बात फ़िल्म की तारीफ़ में कही जा रही है.
वीडियो: 'बंदर' में बॉबी देओल का दिखा ऐसा रूप, जो किसी फिल्म में नहीं देखा!

