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आर्या सीज़न 3 : इस शहर में चूहे स्कंक जितने मोटे और भद्दे हो गए हैं (सीरीज़ रिव्यू)

दुनिया भर में ख़ूब प्रशंसा पाने वाली एक डच क्राइम ड्रामा सीरीज़ पर आधारित है director-creator Ram Madhvani की series AARYA जिसका season 3 - Antim Vaar हाल ही में Disney Plus Hotstar पर उतरा है. Sushmita Sen, Sikander Kher, Vikas Kumar के लीड रोल्स वाली ये सीरीज़ कैसी है, पढ़ें इस विस्तृत Review में.

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Aarya season 3 review by Gajendra Singh Bhati
सीज़न 3 के एक महत्वपूर्ण दृश्य में आर्या और दौलत (सुष्मिता सेन, सिकंदर खेर). इन दोनों का ट्रैक सीरीज़ की सबसे ग्रिपिंग घटनाओं, पलों का निर्माण कर सकने की संभावना लिए हैं लेकिन तीनों सीज़न में कभी इसका सच्चा दोहन नहीं हुआ. पहले दौलत को दूर भेजना और फिर आखिर में वापस लाना समझ नहीं आता, जिससे हालिया सीज़न को कोई लाभ नहीं हुआ.
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18 फ़रवरी 2024 (Updated: 18 फ़रवरी 2024, 18:02 IST)
Updated: 18 फ़रवरी 2024 18:02 IST
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 रेटिंग - 
आर्या (सीज़न 1-3) - 3 स्टार्स
सीज़न 3 अंतिम वार - 1.5 स्टार्स

***

डच टीवी शो पेनोज़ा / ब्लैक विडो का यह एक वफ़ादार भारतीय एडेप्टेशन है. क्रिएटर राम माधवानी इसे राजस्थान में सेट करते हैं. दिखाया जाता है कि राठौड़ों और शेखावतों जैसी रॉयल्टीज़ ड्रग्स के धंधे में है. रशियन्स का तांता यहां लगा रहता है. यहीं रहता है आर्या सरीन का किरदार. वह एक हाउसवाइफ है. इसे प्ले किया है सुष्मिता सेन ने. तीन बच्चे हैं. एक फार्मा कंपनी है - आर्यासत्व, जिसे पति चलाता है. तेज सरीन (चंद्रचूड़ सिंह). बड़ा प्यारा, सुसभ्य, मीठा इंसान. उन्हीं संतरिया रंग वाले मोतीचूर के मीठे लड्डूयों जितना मीठा, जिन्हें वो हाई ट्राइग्लिसराइड्स होने के बावजूद चखने के प्रयास करता रहता है. फिर मीठी आवाज़ में, पत्नी के लिए एक गीत गाता है. रवि टंडन की 1976 में आई फ़िल्म बालिका वधू का गीत. बोल होते हैं - "बड़े अच्छे लगते हैं.. ये धरती, ये नदिया, ये रैना.. और तुम." इन्हीं सब अच्छी चीजों को बचाए रखने की कोशिश कर रहा है. आर्या उसकी परेशानियों, आसपास की साज़िशों, खतरों से बेपरवाह है. लेकिन फिर एक क्षण में, वह क्षण आता है, जिसका सामना करने को कोई जीव कभी तैयार नहीं होता. मृत्यु. आर्या का जीवन सिर के बल खड़ा हो जाता है. सब बदल जाता है. बड़ी अच्छी लगने वाली तमाम चीज़ों को बचाने की जिम्मेदारी अब आर्या पर आ जाती है. द गॉडफादर के माइकल कॉरलियोन की तरह, वो रेडी नहीं होती लेकिन उसे क्राइम की दुनिया का हिस्सा बनना पड़ता है. आगे जो होता है ये हम शुरू के तीन सीज़न्स में देखते हैं.    

"आर्या" इस लिहाज से देखने लायक सीरीज़ है कि इसने अपनी मूल सीरीज को भारतीय कलेवर में अडेप्ट किया है. इसका पहला सीज़न बेस्ट है. दूसरा ठीक ठाक. सीज़न 3 का भाग दो (अंतिम वार) खासा निराशाजनक है. एचबीओ की सीरीज़ "सक्सेशन" में अरबपति मीडिया कारोबारी लोगन रॉय कहता है - "इस शहर में चूहे, स्कंक जितने मोटे और भद्दे हो गए हैं. अब तो वे भागने-दौड़ने की ज़हमत भी नहीं करते." आर्या सीज़न 3 की राइटिंग, डायरेक्शन, एक्शन और एडिटिंग इन चूहों जैसी होती जा रही है. डायरेक्शन में हल्कापन आया है. राइटिंग ने कुछ भी नया करना छोड़ दिया है और वह बस गोल गोल घेरों में घूमती है. एक्शन, 70 या 80 के दशक की उन्हीं फ़िल्मों के एक्शन जैसा बचकाना हो चला है, जिनके मनमोहक गानों की खु़शबू सीरीज़ में छिड़की हुई है. "अंतिम वार" के इरीटेटिंग होने की एक वजह डिज़्नी प्लस हॉटस्टार की वो कमर्शियल स्ट्रेटजी भी है, जिसमें वो अपनी ओरिजिनल सीरीज़ को दो पार्ट में बांटता जा रहा है. इस स्ट्रैटजी ने हाल में कई सीरीज़ का विनाश किया है. पहले "नाइट मैनेजर", फिर "द फ्रीलांसर" और अब "आर्या" का सीज़न 3. दो हिस्सों में तोड़ने से इन औसत से ज़रा बेहतर सीरीज़ का टेंपो और सरप्राइज़ सब टूटा. जब तक दूसरा पार्ट आता, दर्शक पहले से डिसकनेक्ट हो चुका होता. सीज़न 3 के पहले चार एपिसोड तुलनात्मक रूप से रोचक थे. लेकिन बाकी के चार जो अब आए हैं वे प्रताड़ना जैसे हैं.

"आर्या" की राइटिंग सीज़न 1 में क्या हुआ करती थी ये कुछ सीन्स में देखें. जैसे एक वह सीन - जिसमें तेज आर्या के लिए 2 करोड़ रुपये कैश छोड़कर गया है. शहर में किसी निम्नवर्गीय मुहल्ले में रहने वाली फ़ातिमा के यहां. आर्या दौलत के साथ उसके यहां जाती है. फ़ातिमा कहती है - "माफ कीजिएगा घर थोड़ा बिखरा हुआ है. दरअसल मुन्नी का पेटदर्द है. रातभर रोती रही. सो ही नहीं पाई." जब सीन ख़त्म होता है और आर्या जा रही होती है तो मुड़कर फ़ातिमा से कहती है - "घर में अजवायन है? उसकी एक पोटली बनाकर इसके पेट पर सिकाई कर देना. कॉलिक पेन है, चला जाएगा". न सिर्फ फ़ातिमा यह सुनकर दंग होती है, बल्कि दर्शक भी देखता है कि आर्या के व्यक्तित्व में कुछ असाधारण अवश्य है.  

एक सीन में आर्या की बेटी आरू पिता को याद करते हुए उनका वीडियो देखती है, जिसमें तेज, यानी चंद्रचूड़, गाना आ रहे हैं - "अकेले अकेले कहां जा रहे हो, हमें साथ ले लो जहां जा रहे हो". अगले ही सीन में आरू आधी रात को चुपके से घर से निकल जाती है. पृष्ठ में "ऐन ईवनिंग इ पैरिस" (1967) से रफी की आवाज़ में यही गीत गूंज रहा है. आरू सिगरेट पीते हुए अंधेरे में आगे बढ़ रही है. पीछे पीछे किसी खतरे का आभास है. और हसरत जयपुरी पूछ रहे हैं - "अकेले अकेले कहां जा रहे हो". अनुपम.

सीज़न 1 में राइटिंग गुंथाई भरी थी. पारंपरिक रूप से अच्छी क्राइम ड्रामाज़ यूं ही लिखी जाती है. उनमें परतों में परतें होती हैं. आपके सबसे करीब जो होते हैं, उनके राज़ उघड़ते हैं. दर्शक की नैतिकता और भरोसे का कंपास हिल जाया करता है. कि इस इंसान ने ख़ून करवाया था क्या! पहले सीज़न के अंत में अपने पिता की भयानक हकीकत जानने के बाद भी आर्या उनसे गले मिलती है. यानी वह पक्की और डिप्लोमैटिक हुई है. उसका अपने मन पर संयम गजब का हो गया है. लेकिन सीज़न 3 तक जाते जाते वह कमजोर होती जाती है. उसका तेज दिमाग सपाट होता जाता है. किसी भी सिचुएशन का उसके पास कोई चतुर उपाय नहीं होता है. बच्चे भी उस पर हावी हैं, रशियन भी, नलिनी साहिबा भी, एसीपी ख़ान भी.
 
पहले सीज़न में आर्या की पक्की दोस्त और भाई संग्राम की प्रेग्नेंट पार्टनर हिना (सुगंधा गर्ग, उत्कृष्ट) का शमशान में एक दाह संस्कार के दौरान शराब पीकर, हंगामा करना कमाल का तनाव निर्मित करता सीन है. आपको एंटरटेन करते हुए असहज करता है. अब सीज़न 3 के अंत में आएं. आर्या के तीनों बच्चे मां को घेरकर जैसे कचोटते हैं, भद्दी गालियां देते हैं, ज़लील करते हैं और प्रत्युत्तर में आर्या उनके आगे गिड़गिड़ाती ही रहती है. यह मनोरंजन देने वाले ढंग से असहज नहीं करता, यह इरीटेट करता है. सीरीज से जो दिल आपका लगा होता है वह उचटने लगता है. इतनी बद्तमीजी तो उन स्केंडिनेवियन सीरीज़ के बच्चे भी नहीं करते, जहां से बच्चों वाले ऐसे किरदार भारतीय कहानियों में आ रहे हैं.
 
एसीपी ख़ान का किरदार सीज़न 1 में सबसे ज्यादा जमता है. वह लोकल ड्रग्स माफिया को ख़त्म करना चाहता है, जिसमें उसे आर्या की मदद चाहिए. इस रोल में विकास कुमार (नेटफ्लिक्स की सीरीज़ “काला पानी” में कमाल का काम) की कास्टिंग कारगर रहती है. दर्शक पर उनके कुछ नए चेहरे और काबिल एक्टिंग का संयोजन वर्क करता है. हिसाब से तो दर्शक को ख़ान के साथ खड़े होना चाहिए क्योंकि वह अच्छाई का प्रतिनिधि है लेकिन दर्शक आर्या के साथ खड़ा होता है. जब जब वह आर्या को घेरता है, दर्शक उसे कोसता है, उससे चिढ़ता है. अजय के साथ उसका लव ट्रैक, इस किरदार को और रिचनेस और मीनिंग प्रदान करता है. लेकिन सीज़न 3 में ख़ान का पात्र न्यूनतम सफल होता है. क्योंकि उसके पास करने को कुछ नया नहीं होता. कोई नया विचार, कोई नया आइडिया, नई हताशाएं, व्यक्तित्व का कोई नया डायमेंशन नहीं. वह गोल गोल घूम रहा होता है.

दौलत (सिकंदर खेर) के पात्र के साथ भी यही होता है. पहले सीज़न में वह रहस्य भरा, फुर्तीला, ताकतवर, सर्वसक्षम, ग्रे होता है. जब जब दौलत फ्रेम में आता है, सीरीज़ में जान आ जाती है. कि जहां दौलत आ गया वहां आर्या का कोई बाल बांका नहीं कर सकता.

बाल की बात आई है तो एक छोटी टिप्पणी इस पर भी - हर बढ़ते सीज़न के साथ आर्या के हेयर, लुक्स और स्टाइल पर ज्यादा ध्यान दिया गया है, और किरदार की मनःस्थिति की सत्यता पर बिलकुल कम. भयंकर तनाव हो तब भी, भागदौड़ी हो तब भी. पुलिस की पूछताछ में जाना हो तब भी, रशियन माफिया से मिलना हो तब भी, पुलिस के साथ शूटआउट करने जा रही होती है तब भी, शमशान में जाती है तब भी, वहां हेयर एंड स्टाइल ही आगे रहता है और किरदार जिन हालातों से गुजर रहा है उस लिहाज से बदलते हेयर एंड गेटअप पर ध्यान कम.

इस संदर्भ में आप "ग्रिसेल्डा" देखें. यह मिनी सीरीज़ उस कोलंबियन ड्रग लॉर्ड महिला की कहानी है, जिससे पाब्लो एस्कोबार भी डरता था. ग्रिसेल्डा (सोफिया वरगारा) भी स्टाइलिश है, लेकिन वह महज कॉस्मेटिक नहीं लगती. उसे देख आपको लगेगा she means business. कई गुत्थम गुत्था करने वाले सीन हैं जिनमें वह पिटती है और पीटती है. उसके लुक्स true to the scenes लगते हैं. अंतर्निहित अंतर सिर्फ एक है कि वह ड्रग्स का धंधा पैसों के लिए करती है, उसकी कोई खास मजबूरी नहीं है, और आर्या के लिए ये मजबूरी है.
 
ख़ैर, बात हम दौलत की कर रहे थे. सीज़न 3 में उसे काफी वक्त तक एक्शन से बाहर रखा जाता है. अंत में आता है, तब क्षणिक एक्साइटमेंट होती है. लेकिन आकर वह कुछ करता नहीं है. उसकी पूर्वाभास (pre-empt) करने की शक्ति चली सी गई है. गन निकालता है तब तक तो दुश्मन घेर लेते हैं. उसकी अधिकतर चुप रहने वाली व्यक्तित्व विशेषता के अलावा कोई दूसरा गुण नहीं दिखता.
  
क्लाइमैक्स से पहले वह आर्या से कहता है - "अपने पंजे बाहर निकालो". यह संवाद यहां आते आते अपना मीनिंग खोल देता है. क्योंकि वह हर सीज़न में ऐसा कहता है. ये दोहराव एपिसोड्स के टाइटल में भी दिखता है.  
सीज़न 3 का एपिसोड 8 होता है - पंजे निकालने का वक्त आ गया है.
सीज़न 1 का एपिसोड 4 था - अपने पंजे बाहर निकालो.
सीज़न 2 का एपिसोड 7 था - फिर से पंजे बाहर निकालो.

सीरीज़ में कई रूपक और बिंब दिखते हैं. कुछ भीतर तक खरे बैठते हैं, कुछ सिर्फ सजावटी लगते हैं. जैसे सीज़न 1 के अंत में जेल से छूटे भाई संग्राम को वह अपने खेत लाती है, जहां अफीम के सफेद फूलों की फसल खड़ी है. उसे संग्राम का सच पता चल गया है. लेकिन वह उसे नहीं बताती. इशारों में बोलती है कि "देखने में तो सब फूल ही लगते हैं, लेकिन वक्त आने पर अफीम बन जाते हैं." मज़े की बात ये है कि यह बात उसने संग्राम के लिए कही है लेकिन लागू ख़ुद उस पर भी होती है.

सीज़न 2 के अंत में होली का सीन चल रहा होता है. आर्या और उसके अपराधी साथी होली खेल रहे होते हैं और गीत बजता है - "दिगंबर खेले मसाने में होरी, भूत पिशाच बटोरी". यानी दिगंबर शंकर की होली, जो वे मसाण में खेलते हैं. मृत्यु की होली. यहां इशारा आर्या के लिए होता है, जो रंगों की ही नहीं मौत की होली भी खेलने लगी है.

यह सीरीज़ श्रीमद्भगवतगीता के संदर्भों से भरी है. एक ऑब्चुअरी के लिए वीर अपनी मां आर्या को गीता का एक श्लोक सुनाता है - "न जायते म्रियते वा कदाचि". कि आत्मा का न जन्म होता है न मृत्यु होती है.

बेटी आरू घर पर हुई मौत से डील नहीं कर पाती. तो वह कर्म, फल, जीवन, मृत्यु, आत्मा इन सब पर गीता के श्लोकों से कुछ पोएट्री लिखती है. यह सीज़न 1 में तो चल जाता है लेकिन सीज़न 3 अंतिम वार की ओपनिंग फिर ऐसी ही पोएट्री से होती है, और यहां आते आते ये तंग करने लगती है. क्योंकि सीरीज़ इस पोएट्री को एक फॉर्मुला बना लेती है. उसे लगता है कि ये कहीं भी छिड़कर देना प्रभावोत्पादक है, जबकि होता उलटा है. दूसरा, ये पोएट्री दोयम दर्जे की लिखावट भरी होती है.  

एक सीन में आरू के प्रिय को गोली मार दी जाती है, और वह उसकी तरफ भागती है. पृष्ठ में शिवतांडवस्त्रोत बजता है. शिव के क्रोध को कम करने के लिए रावण द्वारा की गई स्तुति शिवतांडवस्त्रोत थी. यहां औचित्य सिद्ध नहीं होता?

सीज़न 3 के अंत में एक सीन है. आर्या घायल है. बेहोश है. उसके बच्चों की जान खतरे में है. ऊंचाई से एक शॉट उभरता है, एक मंदिर और उसकी झंडी दिखती है. कोई मंत्र बजता है. फिर कुछ होता है कि आर्या उठती है और एक गार्ड के हाथ से तलवार छीनकर उसे मार देती है. फिर दो तलवार लेकर कॉम्बैट मोड में आ जाती है. ये मोड कहां गायब था तीन सीज़न से. वह दो तलवारों से नलिनी (ईला अरुण) के बेटे के साथ तलवार बाज़ी करती है. एकदम अग्रेसिव होकर. शेरनी की तरह उसे पोर्टे किया जाता है. यह फ़िज़िकल पर्सनैलिटी ट्रेट अबसे पहले गायब था. यह अगर डिवाइन इंटरवेंशन था तो इस जॉनर में कभी देखा याद नहीं आता.   

इस कहानी का सबसे मूल प्रश्न यह है कि आर्या बुरी है कि अच्छी? अच्छी वह नहीं है, और अगर बुरी है तो दर्शक उसे सपोर्ट क्यों करता है? इसका जवाब आर्या एक सीन में देती है, जब वह ख़ान से कहती है, "कभी कभी बात, ग़लत या सही की नहीं, ग़लत और कम ग़लत की होती है." ऐसा नहीं है कि सीरीज़ का अपराध पक्ष ही यह सोचता है. कानून पक्ष भी यह सोचता है. जब कुछ अरसे बाद ख़ान आर्या को जाने देता है और वह पूछती है, "मैंने शेखावत को मरवाया फिर भी आप मुझे जाने दे रहे हैं," तो वह कहता है - "कभी कभी चॉयस सही या गलत की नहीं, गलत और कम गलत की होती है. अगर आपको अरेस्ट करता तो सिर्फ एक केस सॉल्व करता. आपको रिहा कर रहा हूं तो एक पूरे क्राइम सिंडिकेट को बर्बाद कर रहा हूं. सौदा फायदे का है." ज़ाहिर है दुनिया की अधिकतर क्राइम ड्रामा, पोलिटिकल ड्रामा, या गैंगस्टर ड्रामा में, सब मुल्कों की विदेश नीति में भी, द ग्रेटर गुड ही अच्छा-बुरा, नैतिक-अनैतिक को डिफाइन करता है. परम सत्य, परम नैतिक नहीं. तमिळ फ़िल्म "विक्रम वेधा" (2017) में गैंगस्टर वेधा का किरदार भी कहता है - "कहानी में एक अच्छा और एक बुरा हो तो चुनना आसान होता है. लेकिन जब दोनों ही बुरे हों, तो सज़ा किसे मिलेगी." हमारी कहानियों में यह दुविधा उस परमकथा से आती है जिसका नाम "बेताल पचीसी" है. उसकी सारी कहानियों का मूल यही है कि क्या सही है क्या गलत, क्या न्याय है क्या अन्याय है, क्या नैतिक है, क्या अनैतिक है, यह तय करना पाना लगभग नामुमकिन सा हो जाता है, अगर आप सत्य के सारे पक्ष देखें तो.  

बात यहीं तक.

अस्तु!

Series: Aarya Season 1-3 । Creator: Ram Madhvani । Directors: Ram Madhvani, Sandeep Modi, Vinod Rawat, Kapil Sharma, Shraddha Pasi Jairath । Cast: Sushmita Sen, Chandrachur Singh, Namit Das, Ila Arun, Akash Khurana, Jayant Kripalani, Sikandar Kher, Ankur Bhatia, Vikas Kumar, Sugandha Garg, Dilnaz Irani, Maya Sarao, Sohaila Kapur, Vishwajeet Pradhan, Geetanjali Kulkarni, Charu Shankar, Tariq Vasudeva, Virti Vaghani । Episodes: 25 । OTT Platform: Disney Plus Hotstar 

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