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पुडुचेरी चुनाव: जहां शराब और पेट्रोल के दाम तय करते हैं किसकी बनेगी सरकार

Puducherry Assembly Elections 2026: पुडुचेरी की राजनीति का वह काला और सफेद सच जिसे कोई नहीं बताता. जानिए कैसे पेट्रोल के दाम और शराब की बोतलें यहां की सत्ता और बजट तय करती हैं.

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20 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 12:37 PM IST)
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पुडुचेरी की राजनीति: शराब का नशा और पेट्रोल की गंध (फोटो- पीटीआई)
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पुडुचेरी…भारत का वो राज्य की जिसकी राजनीति की खुशबू पेट्रोल से आती है और जायका शराब से तय होता है. एक छोटा सा केंद्र शासित प्रदेश. चार अलग-अलग टुकड़ों में बंटा हुआ. लेकिन इसकी सियासत इतनी उलझी हुई है कि दिल्ली के बड़े-बड़े पॉलिटिकल एक्सपर्ट भी यहां आकर चकरा जाते हैं.

पुडुचेरी सिर्फ एक टूरिस्ट डेस्टिनेशन नहीं है. यह एक ऐसा पॉलिटिकल लैब है जहां हर चुनाव में 'टैक्स' की केमिस्ट्री से सत्ता का समीकरण तैयार किया जाता है.

पुडुचेरी की गलियों में जब आप घूमेंगे तो आपको दीवारों पर पोस्टरों से ज्यादा शराब की दुकानों के बोर्ड दिखेंगे. यह कोई इत्तेफाक नहीं है. यह इस राज्य की इकोनॉमी की रीढ़ है. यहां की राजनीति का सबसे बड़ा सच यह है कि यहां सरकारें वादों पर नहीं, बल्कि 'रेट' पर बनती हैं.

अगर पेट्रोल का दाम पड़ोसी राज्य तमिलनाडु से एक रुपया भी ज्यादा हुआ, तो समझिए कि सत्ता पक्ष की कुर्सी डगमगाने लगी. आज के इस मेगा एक्सप्लेनर में हम पुडुचेरी की इसी दिलचस्प और थोड़ी अजीब लगने वाली राजनीति की परतें खोलेंगे.

हम समझेंगे कि कैसे एक छोटा सा इलाका अपनी अलग पहचान के लिए केंद्र और उपराज्यपाल के साथ जंग लड़ता है. हम उस आंकड़े की गहराई में जाएंगे जो कहता है कि यहां के बजट का एक बड़ा हिस्सा जाम छलकने से आता है.

और सबसे जरूरी बात, हम यह जानेंगे कि क्या पुडुचेरी कभी एक पूर्ण राज्य बन पाएगा या फिर यह हमेशा केंद्र और स्थानीय नेताओं के बीच की रस्साकशी का मैदान बना रहेगा.

पुडुचेरी का भूगोल और राजनीति का अजीब मेल

पुडुचेरी कोई एक शहर नहीं है. यह चार अलग-अलग जिलों का समूह है जो भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से कोसों दूर हैं. पुडुचेरी और कराइकल, तमिलनाडु से घिरे हैं. माहे, केरल के पास है और यनम, आंध्र प्रदेश की गोद में बसा है.

अब आप सोचिए, एक मुख्यमंत्री को चार अलग-अलग संस्कृतियों और चार अलग-अलग राज्यों के प्रभाव वाले लोगों को खुश करना पड़ता है. यही वजह है कि यहां की राजनीति बहुत ज्यादा स्थानीय और 'गली-टू-गली' वाली हो जाती है.

यहां विधानसभा की सीटें बहुत छोटी हैं. महज कुछ हजार वोटों से हार-जीत तय हो जाती है. ऐसे में नेता को हर घर के चूल्हे की खबर रखनी पड़ती है. यहां का वोटर बहुत जागरूक है. उसे पता है कि अगर तमिलनाडु में कोई योजना लागू हुई है, तो उसे पुडुचेरी में भी मिलनी चाहिए.

लेकिन पुडुचेरी के पास संसाधन कम हैं. ऐसे में सरकार के पास एक ही रास्ता बचता है, वो है टैक्स में रियायत देकर बाहर से लोगों को आकर्षित करना. पुडुचेरी सांख्यिकी विभाग के आंकड़े बताते हैं कि यही रियायत पुडुचेरी को 'सस्ता' बनाती है. लोग चेन्नई से गाड़ी चलाकर यहां सिर्फ इसलिए आते हैं ताकि पेट्रोल सस्ता मिल सके और शाम को सस्ती शराब का आनंद लिया जा सके.

यह जो 'फ्लोटिंग पॉपुलेशन' है, यही पुडुचेरी की तिजोरी भरती है. लेकिन क्या सिर्फ शराब और पेट्रोल के दम पर कोई राज्य चल सकता है? यह एक बड़ा सवाल है जिस पर वहां के बुद्धिजीवी अक्सर बहस करते हैं. 

शराब और एक्साइज ड्यूटी का गणित

पुडुचेरी के बजट को अगर आप ध्यान से देखेंगे तो चौंक जाएंगे. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्टेट फाइनेंस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की कमाई का करीब 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा सीधे तौर पर एक्साइज ड्यूटी यानी शराब पर लगने वाले टैक्स से आता है. यह आंकड़ा किसी भी सामान्य राज्य के मुकाबले बहुत ज्यादा है. इसकी वजह यह है कि यहां शराब पर टैक्स तमिलनाडु या केरल के मुकाबले काफी कम रखा जाता है. इससे पड़ोसी राज्यों के लोग यहां खिंचे चले आते हैं.

जब भी चुनाव आते हैं, तो कोई भी पार्टी यह हिम्मत नहीं जुटा पाती कि वह शराब बंदी की बात करे या टैक्स बढ़ाने का सुझाव दे. वहां के नेताओं को पता है कि अगर उन्होंने 'रेवेन्यू' के इस सबसे बड़े स्रोत से छेड़छाड़ की, तो राज्य का विकास कार्य ठप हो जाएगा. सरकारी कर्मचारियों को तनख्वाह देना मुश्किल हो जाएगा. इसलिए यहां की राजनीति में शराब एक 'नेसेसरी इविल' यानी जरूरी बुराई बन गई है.

विपक्ष हमेशा आरोप लगाता है कि सरकार युवाओं को नशे की ओर धकेल रही है. लेकिन वही विपक्ष जब सत्ता में आता है, तो वह भी इसी सिस्टम का हिस्सा बन जाता है. यह पुडुचेरी की राजनीति का वह 'बिटवीन द लाइन्स' सच है जिसे सब जानते हैं लेकिन खुलकर कोई नहीं बोलता. यहां का मिडिल क्लास भी इसमें फंसा हुआ है. उन्हें सस्ता ईंधन चाहिए, लेकिन वे समाज पर इसके असर से भी चिंतित रहते हैं.

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पुडुचेरी में शराब की कीमतें तय करती हैं सरकार का भविष्य (फोटो- PTI)

पेट्रोल और डीजल का चुनावी खेल

पुडुचेरी की सड़कों पर आपको तमिलनाडु के नंबर वाली गाड़ियां बहुत दिखेंगी. वजह साफ है. पेट्रोल और डीजल की कीमतों में यहां बड़ा अंतर होता है. पुडुचेरी सरकार जानबूझकर वैट (VAT) को कम रखती है ताकि लोग यहां से तेल भरवाएं. यह सिर्फ सेल्स की बात नहीं है, यह एक बहुत बड़ा पॉलिटिकल टूल है.

अगर केंद्र सरकार तेल के दाम बढ़ाती है, तो पुडुचेरी की राज्य सरकार पर दबाव आता है कि वह अपने हिस्से का टैक्स और कम करे ताकि कीमतों का अंतर बना रहे.

पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण सेल रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह अंतर खत्म हो गया, तो पुडुचेरी का बिजनेस मॉडल फेल हो जाएगा. यहां की हजारों नौकरियां इसी 'प्राइस डिफरेंस' पर टिकी हैं. पेट्रोल पंप मालिकों का एक बहुत मजबूत लॉबी ग्रुप है जो चुनाव में फंडिंग से लेकर वोटिंग तक को प्रभावित करता है.

आम आदमी के लिए यह सीधे तौर पर जेब का मामला है. पुडुचेरी में रहने वाला एक आम नागरिक अपनी स्कूटी में तेल भरवाते समय खुश होता है कि वह चेन्नई वाले से 5-7 रुपये कम दे रहा है. यही छोटी सी खुशी उसे सत्ताधारी दल के करीब ले जाती है.

लेकिन इसका लॉन्ग टर्म असर यह है कि राज्य के पास इंफ्रास्ट्रक्चर और एजुकेशन के लिए फंड की कमी हो जाती है क्योंकि सारा पैसा तो सिर्फ सब्सिडी और टैक्स कटौती में जा रहा है.

एलजी बनाम मुख्यमंत्री: सत्ता का दूसरा केंद्र

पुडुचेरी की राजनीति का सबसे चर्चित हिस्सा है 'राजभवन बनाम सचिवालय'. चूंकि यह एक केंद्र शासित प्रदेश है, इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 239ए के तहत यहां उपराज्यपाल (LG) के पास काफी शक्तियां होती हैं. हमने किरण बेदी के कार्यकाल के दौरान देखा कि कैसे मुख्यमंत्री और एलजी के बीच की जंग ने नेशनल हेडलाइंस बनाई थीं. कई बार तो मुख्यमंत्री को एलजी हाउस के बाहर धरने पर बैठना पड़ा.

यह विवाद सिर्फ ईगो की लड़ाई नहीं है. यह अधिकारों की लड़ाई है. पुडुचेरी की जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है, लेकिन बजट से लेकर छोटी-छोटी नियुक्तियों तक के लिए केंद्र द्वारा नियुक्त एलजी की मंजूरी जरूरी होती है. जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें होती हैं, तो यह तनाव और बढ़ जाता है.

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उपराज्यपाल से पुडुचेरी की तकरार 

इस रस्साकशी का सीधा असर गवर्नेंस पर पड़ता है. कई फाइलें महीनों तक अटकी रहती हैं. जनता के बीच यह संदेश जाता है कि चुनी हुई सरकार कमजोर है. यही वजह है कि 'पूर्ण राज्य का दर्जा' यहां का सबसे पुराना और सबसे इमोशनल चुनावी मुद्दा है. हर चुनाव में पार्टियां वादा करती हैं कि वे पुडुचेरी को दिल्ली जैसा या उससे भी बेहतर दर्जा दिलाएंगी, लेकिन दिल्ली की तरह यहां भी मामला अटका हुआ है.

'डोर-टू-डोर' से आगे 'गली-टू-गली' की सियासत

पुडुचेरी की 30 विधानसभा सीटों में से कई सीटें तो इतनी छोटी हैं कि विधायक हर वोटर को नाम से जानता है. यहां चुनाव प्रचार बहुत ही पर्सनल होता है. आप किसी बड़े मंच से भाषण देकर चुनाव नहीं जीत सकते. आपको गली के मोड़ पर खड़े होकर लोगों की समस्याएं सुननी पड़ती हैं. एक-एक मोहल्ले की अपनी अलग डिमांड होती है. कहीं ड्रेनेज की समस्या है, तो कहीं राशन कार्ड का मुद्दा.

इस माइक्रो-पॉलिटिक्स का फायदा यह है कि नेता जनता के करीब रहता है. लेकिन नुकसान यह है कि बड़े विजन वाली राजनीति गायब हो जाती है. नेता सिर्फ अपने छोटे से इलाके को खुश करने में लगा रहता है. इससे पूरे राज्य का एक जैसा विकास नहीं हो पाता. साथ ही, यहां 'कैश फॉर वोट' के आरोप भी बहुत लगते हैं. चूंकि सीटों का साइज छोटा है, इसलिए थोड़े से पैसे या तोहफे भी परिणाम बदल सकते हैं.

युवा पीढ़ी यानी जेन जेड और मिलेनियल्स इस सिस्टम से थोड़े परेशान हैं. उन्हें सिर्फ सस्ती शराब या पेट्रोल नहीं चाहिए. उन्हें नौकरियां और आईटी पार्क चाहिए. लेकिन जब तक राजनीति 'गली' में फंसी रहेगी, तब तक 'ग्लोबल' विजन लाना मुश्किल होता है. पुडुचेरी में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इसके लिए जिस बड़े निवेश और पॉलिसी की जरूरत है, वह अक्सर राजनीतिक अस्थिरता की भेंट चढ़ जाता है.

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विधानसभा का वो 'चोर दरवाजा' जिससे बदल जाती है सरकार

पुडुचेरी की राजनीति का सबसे पेचीदा हिस्सा है यहां के 'नॉमिनेटेड विधायक'. आमतौर पर राज्यों में राज्यपाल कुछ लोगों को मनोनीत करते हैं, लेकिन उन्हें सरकार गिराने या बनाने वाली वोटिंग में हिस्सा लेने का हक नहीं होता. पुडुचेरी में कहानी अलग है. यहां केंद्र सरकार तीन सदस्यों को सीधे विधानसभा भेज सकती है.

अब यहां का असली खेल समझिए. 30 सीटों वाली छोटी विधानसभा में बहुमत के लिए 16 सीटें चाहिए. अगर किसी मुख्यमंत्री के पास 16 या 17 विधायक हैं, तो वह हमेशा डरा रहता है. क्योंकि केंद्र द्वारा भेजे गए ये 3 मनोनीत सदस्य विपक्षी खेमे को मजबूती दे देते हैं. 2021 में वी. नारायणसामी की सरकार गिरने के पीछे इसी 'नॉमिनेशन पावर' का बड़ा हाथ माना जाता है. 

यह भारत का अकेला ऐसा लोकतंत्र है जहां बिना चुनाव लड़े आए लोग जनता की चुनी हुई सरकार का भविष्य तय कर देते हैं. इसी वजह से यहां सत्ता की चाबी हमेशा आधी राजभवन में और आधी जनता के पास रहती है.

'बाहरी बनाम स्थानीय' की अनकही जंग

पुडुचेरी में एक और मुद्दा है जो गलियों में चर्चा का विषय रहता है, वो है 'लोकल आइडेंटिटी'. चूंकि यह इलाका फ्रांसीसी विरासत को समेटे हुए है और चारों तरफ से बड़े राज्यों से घिरा है, इसलिए यहां के मूल निवासियों में अपनी पहचान को लेकर एक किस्म का डर रहता है. चुनाव के समय यह मुद्दा 'बाहरी बनाम स्थानीय' की शक्ल ले लेता है.

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम रहती है कि शराब के बड़े ठेके, होटल बिजनेस और रियल एस्टेट पर बाहर से आए रसूखदार लोगों का कब्जा होता जा रहा है. जनगणना रिपोर्ट और स्थानीय निकाय चुनाव विश्लेषण के मुताबिक स्थानीय युवाओं को लगता है कि उनकी जमीन और उनके संसाधन 'आउटसाइडर्स' के हाथ में जा रहे हैं. 

विपक्ष अक्सर इस मुद्दे को हवा देता है कि सरकार स्थानीय व्यापारियों के हितों की रक्षा नहीं कर पा रही है. यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक एंगल है जो मिडिल क्लास वोटर को बहुत प्रभावित करता है. यहां का वोटर सिर्फ सस्ता पेट्रोल नहीं चाहता, वह यह भी चाहता है कि पुडुचेरी का कंट्रोल पुडुचेरी वालों के हाथ में ही रहे.

राशन कार्ड और 'मुफ्त चावल' का इमोशनल कार्ड

अगर आपको लगता है कि पुडुचेरी सिर्फ शराब और पेट्रोल पर वोट देता है, तो आप थोड़े गलत हैं. यहां की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा 'थाली' से होकर गुजरता है. पुडुचेरी में राशन कार्ड सिर्फ सरकारी दस्तावेज नहीं है, यह एक 'पॉलिटिकल पावर' है. यहां की सरकारें दशकों से मुफ्त चावल और रियायती दरों पर किराने का सामान देने के वादे पर चुनाव लड़ती आई हैं.

पोनलैट (PONLAIT) और पापस्को (PAPSCO) जैसी सरकारी संस्थाएं यहां के घर-घर से जुड़ी हैं. जब भी केंद्र सरकार या उपराज्यपाल की तरफ से इन 'फ्रीबीज' पर रोक लगाने या इन्हें डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) में बदलने की कोशिश होती है, तो बड़ा राजनीतिक बवाल खड़ा हो जाता है. 

मुख्यमंत्री कहते हैं कि हमें जनता को सामान देना है, जबकि एलजी ऑफिस का तर्क होता है कि सीधा पैसा खाते में भेजो. इस खींचतान में पिसता आम आदमी है. लेकिन चुनाव में जीत उसी की होती है जो यह भरोसा दिला सके कि उसके राज में 'किचन का बजट' नहीं बिगड़ेगा.

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पुडुचेरी में सस्ते राशन की दुकानें (फोटो-PTI)

पुडुचेरी की इकोनॉमी का भविष्य: क्या बदलेगा रास्ता?

विशेषज्ञों का मानना है कि पुडुचेरी को अब अपने 'शराब और पेट्रोल' वाले मॉडल से बाहर निकलना होगा. नीति आयोग की कई रिपोर्ट्स में यह संकेत दिया गया है कि केंद्र शासित प्रदेशों को अपने राजस्व के स्रोत बढ़ाने चाहिए. पुडुचेरी में ब्लू इकोनॉमी (समुद्र आधारित व्यापार) और हाई-एंड टूरिज्म की बहुत गुंजाइश है. अगर यहां फ्रांस की तर्ज पर बीच टूरिज्म को प्रमोट किया जाए, तो यह राज्य देश का सबसे अमीर इलाका बन सकता है.

लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए. टैक्स स्ट्रक्चर में बदलाव करना एक बड़ा जोखिम है. अगर शराब महंगी की गई, तो रेवेन्यू गिर जाएगा. अगर पेट्रोल के दाम पड़ोसी राज्यों के बराबर लाए गए, तो बिजनेस खत्म हो जाएगा. यह एक 'कैच-22' (Paradoxical) वाली स्थिति है. सरकार को बहुत संभलकर कदम उठाने होंगे.

नीति आयोग के एसडीजी इंडिया इंडेक्स रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले समय में डिजिटल इकोनॉमी और सर्विसेज सेक्टर यहां गेम चेंजर हो सकते हैं. चूंकि यहां साक्षरता दर काफी अच्छी है, इसलिए आईटी और एजुकेशन हब बनना मुश्किल नहीं है. बस जरूरत है तो एक ऐसे नेतृत्व की जो सिर्फ अगले चुनाव के 'रेट कार्ड' के बारे में न सोचे, बल्कि अगली पीढ़ी के भविष्य के बारे में सोचे.

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समाधान और आगे की राह

पुडुचेरी एक ऐसा रत्न है जिसकी चमक राजनीति की धूल में थोड़ी फीकी पड़ गई है. इसका समाधान सिर्फ 'पूर्ण राज्य का दर्जा' मिलने में नहीं है, बल्कि एक मजबूत इकोनॉमिक विजन में है. सरकार को चाहिए कि वह धीरे-धीरे अपनी निर्भरता एक्साइज ड्यूटी से कम करे और सर्विस सेक्टर पर ध्यान दे.

आम आदमी के लिए सलाह यही है कि वे चुनाव में सिर्फ तत्कालिक फायदों यानी सस्ते पेट्रोल या शराब को न देखें. उन्हें अपने प्रतिनिधि से लंबे समय के विकास, बेहतर सड़कों और शिक्षा की मांग करनी चाहिए. जब तक जनता अपना पैमाना नहीं बदलेगी, तब तक नेता भी अपना तरीका नहीं बदलेंगे.

पुडुचेरी की राजनीति को शराब के नशे और पेट्रोल की गंध से बाहर निकलकर विकास की ताजी हवा में सांस लेना होगा.

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