आसमान छूते चांदी के दाम अचानक नीचे की तरफ कैसे लुढ़क गए?
ETF का मतलब होता है एक्सचेंज ट्रेडेड फंड. चूंकि ये ETF चांदी के हैं तो इन्हें सिल्वर ETF कहते हैं. ये ऐसे निवेश साधन होते हैं जो सीधे तौर पर चांदी की कीमत से जुड़े होते हैं.
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चांदी के वायदा भाव में तेज गिरावट दर्ज की गई है. मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर 22 जनवरी को चांदी की कीमत 4% टूटकर 3 लाख 5 हजार 753 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई. मिंट की एक खबर के मुताबिक इस गिरावट के बाद चांदी अपने अब तक के ऑल-टाइम हाई से करीब 30 हजार रुपये प्रति किलोग्राम नीचे आ चुकी है.
इसके अलावा सिल्वर ETF तो और भी बुरी तरह से लुढ़क गए. रिपोर्ट के मुताबिक मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर Tata Silver ETF करीब 24% टूटकर 25.56 रुपये पर आ गया. इसी तरह से Edelweiss Silver ETF और Mirae Asset में 22-22% की गिरावट दर्ज की गई. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर Nippon India Silver ETF 20% गिर गया.
सिल्वर ETF क्या होते हैं?ETF का मतलब होता है एक्सचेंज ट्रेडेड फंड. चूंकि ये ETF चांदी के हैं तो इन्हें सिल्वर ETF कहते हैं. ये ऐसे निवेश साधन होते हैं जो सीधे तौर पर चांदी की कीमत से जुड़े होते हैं. इनमें निवेश करने पर निवेशक को चांदी के दाम में होने वाले उतार-चढ़ाव का फायदा या नुकसान मिलता है. लेकिन इसके लिए फिजिकल यानी असली चांदी खरीदने या संभालकर रखने की जरूरत नहीं होती.
जिस तरह से शेयर बाजार में शेयर खरीदे और बेचे जाते हैं, वैसे ही सिल्वर ETF को शेयर बाजार में (NSE या BSE) पर खरीदा-बेचा जा सकता है. सिल्वर ETF का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें निवेश करने पर शुद्धता, इसकी सुरक्षा जैसी परेशानियों से बचा जा सकता है. फिजिकल चांदी की तुलना में इसमें लेन-देन आसान होता है और कम रकम से भी निवेश शुरू किया जा सकता है.
इसके अलावा, निवेशक जब चाहें बाजार खुलने के समय अपनी यूनिट बेच सकते हैं. हालांकि, सिल्वर ETF पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं होते. चांदी की कीमतों में तेज गिरावट आने पर निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है. कई बार सिल्वर ETF अपने नेट एसेट वैल्यू (NAV) से ज्यादा यानी प्रीमियम पर या कम यानी डिस्काउंट पर ट्रेड करते हैं, जिससे कीमतों में अचानक तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है.
सिल्वर ETF उन निवेशकों के लिए बेहतर विकल्प माने जाते हैं जो चांदी में निवेश तो करना चाहते हैं, लेकिन फिजिकल चांदी रखने की झंझट से बचना चाहते हैं. सिल्वर ETF अक्सर अपने नेट एसेट वैल्यू (NAV) के मुकाबले भारी प्रीमियम या डिस्काउंट पर ट्रेड करते हैं. इनमें तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है.
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चांदी की कीमतों में भारी गिरावट क्यों आई है?मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक भू-राजनीतिक तनाव में कमी और अमेरिकी डॉलर में मजबूती के चलते चांदी की सुरक्षित निवेश मांग में कमी आई है. इस वजह से चांदी के दाम औंधे मुंह गिरे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप नए टैरिफ लगाने की धमकियों से पीछे हटते दिखे हैं. ग्रीनलैंड को बलपूर्वक अपने कब्जे में लेने के प्रस्ताव से भी पलट सकते हैं. इससे दुनियाभर में राजनीतिक तनाव कम हुआ.
जानकारों का कहना है कि ट्रंप के यह संकेत देने के बाद कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच कोई टकराव नहीं होगा. जियो पॉलिटिकल टेंशन में कुछ नरमी आई है. ऐसे में कई निवेशक सोना और चांदी को होल्ड करने से बच रहे हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि बड़े पैमाने पर लोगों ने चांदी बेची है. खासतौर पर सिल्वर ETF में भारी बिकवाली देखने को मिली.
हालांकि MCX की तुलना में सिल्वर ETF में ज्यादा गिरावट की बड़ी वजह यह है कि भारतीय बाजार में चांदी बजट से पहले प्रीमियम पर ट्रेड कर रही थी. आगामी आम बजट में चांदी पर आयात शुल्क बढ़ने की अफवाहों और निवेशकों की खरीदारी के चलते चांदी पर प्रीमियम बढ़ा है. यह बात INVasset PMS के बिजनेस हेड हर्षल दसानी ने मिंट से बातचीत में कही. यहां पर प्रीमियम का मतलब है कि किसी बाजार में चांदी की कीमत उसकी वास्तविक या अंतरराष्ट्रीय कीमत से ज्यादा पर ट्रेड कर रही है. आसान भाषा में कहें तो निवेशक चांदी खरीदने के लिए उसकी मूल कीमत से ज्यादा कीमत देने को तैयार हैं.
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हर्षल दसानी के मुताबिक, पिछले दो सत्रों में MCX पर चांदी ने COMEX की तुलना में काफी बेहतर प्रदर्शन किया था, क्योंकि बजट में आयात शुल्क में बदलाव की उम्मीद की जा रही थी. इस वजह से भारत में MCX पर चांदी 107 डॉलर प्रति औंस के बराबर कीमत पर ट्रेड हो रही है. जबकि इंटरनेशनल मार्केट यानी COMEX पर कीमत करीब 94 डॉलर थी. यानी करीब 13 डॉलर का अंतर. इस तरह से देखें तो यह काफी बड़ा प्रीमियम है. जैसे ही यह साफ हुआ कि आयात शुल्क को लेकर कोई तात्कालिक राहत नहीं मिलने वाली है, यह अतिरिक्त प्रीमियम खत्म होने लगा और चांदी के दाम अचानक से नीचे आ गए.
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के कमोडिटी एनालिस्ट मानव मोदी ने मिंट से कहा कि म्यूचुअल फंड के NAV की गणना MCX की कीमतों से काफी अलग तरीके से होती है. उनके अनुसार, “किसी भी घटना या कीमत में बदलाव का असर सबसे पहले फ्यूचर्स प्राइस में दिखता है, जबकि NAV की गणना कुछ देरी से होती है. टाइमिंग के इस अंतर के कारण ETF (जो 3:30 बजे बंद होते हैं) हमेशा तुरंत MCX की चाल के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते.”
मानव मोदी का मानना है कि जैसे-जैसे केंद्रीय बजट नजदीक आता है यह अंतर और बढ़ जाता है. चूंकि ETF की कीमतें इस अंतर के बावजूद तेजी से बढ़ी थीं, इसलिए अब ऊंचे स्तरों पर मुनाफा वसूली देखने को मिल रही है. उन्होंने उम्मीद जताई कि बजट से जुड़ी अनिश्चितता खत्म होते ही दोबारा निवेश शुरू हो सकता है. हालांकि तेज गिरावट के बावजूद, अधिकांश सिल्वर ETF अब भी अपने NAV के मुकाबले प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं.
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