क्या है आइसोब्यूटेनॉल जिसे सरकार डीजल में मिला सकती है?
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के सचिव वी. उमाशंकर का कहना है कि भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड (BPCL) डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने के लिए रिसर्च कर रही है. अब तक जो रिजल्ट्स मिले हैं वे काफी उत्साहजनक हैं

एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की तर्ज पर अब सरकार डीजल में आइसोब्यूटेनॉल (Isobutanol) मिलाना अनिवार्य कर सकती है. इसे लेकर सरकार जल्दी ही ट्रक-ट्रेलरों के लिए नए नियम जारी कर सकती है.
मिंट की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल ही (29 मई को) में औद्योगिक संगठन सीआईआई शिखर के कार्यक्रम में बोलते हुए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के सचिव वी. उमाशंकर ने कहा कि इस साल के आखिर तक देश के सभी पेट्रोल पंपों पर आइसोब्यूटेनॉल मिला डीजल बिक्री के लिए उपलब्ध हो सकता है. केन्द्र सरकार इस दिशा में गंभीरता से विचार कर रही है.
उन्होंने कहा कि भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड (BPCL) डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने के लिए रिसर्च कर रही है. अब तक जो रिजल्ट्स मिले हैं वे काफी उत्साहजनक हैं. इस बात की पूरी संभावना है कि इस साल के अंत तक डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने का आदेश लागू हो जाएगा. डीजल की खपत पेट्रोल की खपत से करीब करीब दोगुनी है. उन्होंने कहा कि इस वजह से डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने से काफी फायदा होगा.
रिपोर्ट में बताया गया है कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने डीजल के विकल्प के तौर पर 100% तक आइसोब्यूटेनॉल पर चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल इंजनों का अध्ययन करने के लिए ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) को भी नियुक्त किया है.
क्या है आइसोब्यूटेनॉल?आइसोब्यूटेनॉल एक बॉयो फ्यूल है जो फर्मेंटेशन (fermentation) प्रक्रिया द्वारा एथेनॉल से बनाया जाता है. ऐसा बताते हैं कि एथेनॉल के मुकाबले आइसोब्यूटेनॉल मिला तेल ज्यादा माइलेज देता है और गाड़ी के स्पेयर पार्ट्स को भी कम नुकसान पहुंचाता है.
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सरकार आइसोब्यूटेनॉल को मंजूरी क्यों देना चाहती है?शुरुआती परीक्षणों से मिले आंकड़ों से पता चलता है कि आइसोब्यूटेनॉल मिलाने से डीजल वाहनों से होने वाला प्रदूषण काफी हद तक कम हो जाता है. वहीं, गाड़ी के माइलेज या उसके प्रदर्शन में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं होता. वहीं, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के सचिव वी. उमाशंकर ने कहा है कहा कि दिल्ली को फरीदाबाद और नोएडा से जोड़ने वाले मार्गों पर हाल ही में हाइड्रोजन से चलने वाली सार्वजनिक बसें शुरू की गई हैं.
हाइड्रोजन ईंधन भरने के स्टेशन पहले बनाए जा चुके हैं. ये बसें ईंधन भरवाने से पहले 450 किलोमीटर तक का सफर तय कर सकती हैं. इसलिए दिल्ली-मुंबई कॉरिडोर के लिए शायद तीन ईंधन भरने के स्टेशनों की जरूरत पड़ सकती है.
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