प्रीमियम पूरा भरकर भी आधा-अधूरा क्लेम! इंश्योरेंस कंपनियां यहां 'खेल' कर देती हैं
लोग हर साल हजारों-लाखों रुपये का हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम इस उम्मीद में भरते हैं कि बीमारी के समय उनको या उनके परिवार को आर्थिक सहारा मिलेगा. ऐसे मुश्किल वक्त पर इंश्योरेंस कंपनियां पूरा भुगतान न करें तो मुसीबतों का पहाड़ टूट जाता है. लेकिन बीमा कंपनियां अक्सर “नियम और शर्तों” के नाम पर ऐसी कटौती करती हैं कि ग्राहक को पूरा पैसा मिल ही नहीं पाता

पहला केस. बेंगलुरु की एक महिला ने ब्रेस्ट कैंसर के इलाज का क्लेम किया. कंपनी ने 'दिल की बीमारी छिपाने' का आरोप लगाकर क्लेम खारिज कर दिया. जबकि दोनों बीमारियों का कोई संबंध नहीं था. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है कि अदालत ने इसे बीमा कंपनी की तरफ से 'सेवा में कमी' माना और लगभग 5 लाख भुगतान का आदेश दिया.
केस नंबर-2. चंडीगढ़ के एक पॉलिसीधारक ने स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उसकी पत्नी की सर्जरी के 2.25 लाख रुपये के अस्पताल बिल की जगह केवल 69,958 रुपये के हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम को मंजूरी दी गई. बीमा कंपनी ने बाकी रकम (1.55 लाख रुपये) का क्लेम देने से इनकार कर दिया. बाद में पॉलिसीधारक ने कंज्यूमर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इकोनॉमिक टाइम्स की खबर बताती है कि चंडीगढ़ स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने स्टार हेल्थ को ब्याज और मुआवजे सहित पूरी बकाया दावा राशि का भुगतान करने का आदेश दिया. लेकिन ये तो उदाहरण भर हैं.
केस नंबर-3. नोएडा के एक व्यक्ति ने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस हेल्थकेयर से मेडीक्लेम पॉलिसी ली थी लेकिन जब क्लेम किया तो बीमा कंपनी ने क्लेम रिजेक्ट कर दिया. बाद में पॉलिसीहोल्डर ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में दरवाजा खटखटाया . टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया कि आयोग ने पालिसीहोल्डर के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी को 6 परसेंट सालाना ब्याज के साथ 46,210 रुपये चुकाने का आदेश दिया.
लोग हर साल हजारों-लाखों रुपये का हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम इस उम्मीद में भरते हैं कि बीमारी के समय उनको या उनके परिवार को आर्थिक सहारा मिलेगा. ऐसे मुश्किल वक्त पर इंश्योरेंस कंपनियां पूरा भुगतान न करें तो मुसीबतों का पहाड़ टूट जाता है. लेकिन बीमा कंपनियां अक्सर “नियम और शर्तों” के नाम पर ऐसी कटौती करती हैं कि ग्राहक को पूरा पैसा मिल ही नहीं पाता. देशभर में ऐसे कई मामले सुनने को मिलते रहते हैं कि बीमा कंपनी ने क्लेम देने से किनारा कर लिया या आधा अधूरा ही भुगतान किया .
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इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया कि देश की 20 हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां अपने ग्राहकों को आधा- अधूरा ही क्लेम दे रही थीं. इस रिपोर्ट में इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IBAI) की तरफ से जारी आंकड़ों का हवाला दिया गया है. IBAI भारत में लाइसेंस प्राप्त ‘इंश्योरेंस ब्रोकर्स’ के हितों के लिए काम करने वाला संगठन है. इन आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2023 में देश की स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र की 20 निजी कंपनियों ने इंश्योरेंस खरीदने वाले मरीजों को इलाज के लिए पूरा पैसा नहीं दिया है बल्कि इन कंपनियों ने मरीजों द्वारा दावा की गई रकम का 80 परसेंट से भी कम दिया है. बाकी पैसों को इंतजाम खुद बीमा धारकों को या उनके परिजनों को करना पड़ा.
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बीमा कंपनियां कैसे करती हैं ‘खेल’मीडिया रिपोर्ट्स और उपभोक्ता आयोग के फैसले बताते हैं कि कंपनियां कई तरह के टेक्निकल और पॉलिसी क्लॉज के बहाने बनाकर या तो क्लेम रिजेक्ट कर देती हैं या बिल का बड़ा हिस्सा काट देती हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया कि ज्यादातर प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनियां नॉन-मेडिकल खर्चों की आड़ में बड़ा खेल कर रही हैं. नॉन मेडिकल बिल यानी ऐसे बिल जिनका भुगतान बीमा कंपनी नहीं करती हैं.
इंश्योरेंस रेगुलेटरी एवं डेवलपमेंट अथॉरिटी इरडा के पूर्व सदस्य नीलेश साठे एनडीटीवी से बातचीत में कहते हैं कि नॉन मेडिकल एक्सपेंसेस या डिसअलाउड एक्सपेंसेस उदाहरण के लिए सर्जिकल ब्लेड, कॉटन, डिस्पोजेबल रेज़र, ऑपरेशन के दौरान पहना गया, गाउन, हाथ धोने के लिए इस्तेमाल होने वाला लिक्विड या साबुन, पल्स ऑक्सीमीटर, टिश्यु पेपर वगैरह को बीमा कंपनियां अपने बिल में शामिल नहीं करती हैं. अस्पताल ये सभी चीजें बिल में जोड़ देता है, लेकिन बीमा पॉलिसी इन्हें “मेडिकल ट्रीटमेंट का हिस्सा नहीं मानती.
अगर आपका कुल बिल 1 लाख रुपये है और 15-20 हजार नॉन-मेडिकल बिल हैं, तो यह हिस्सा आपको खुद देना पड़ेगा. हालांकि , इन बातों को बीमा कंपनियां अपने ग्राहकों को पॉलिसी बेचते समय दिए गए कांट्रैक्ट में बताती भी हैं, लेकिन ग्राहक इस बारे में ध्यान नहीं देते हैं.
कई मामलों में पुरानी बीमारी का हवाला (प्री-एक्सिस्टिंग डिजीज) देकर क्लेम रोका जाता है. भले ही उसका इलाज से कोई संबंध न हो. सबसे आम तरीका यही है. इन सबके अलावा कई बीमा कंपनियां नॉन-डिस्क्लोजर यानी जानकारी छिपाने का बहाना कंपनियों के लिए आसान हथियार बन चुका है. इसके अलावा कई पॉलिसियों में अस्पताल के कमरे के किराए की सीमा तय होती है. अगर मरीज उस लिमिट से महंगा कमरा चुन लेता है तो सिर्फ कमरे का किराया ही नहीं, बल्कि डॉक्टर फीस, नर्सिंग और सर्जरी जैसे बाकी खर्च भी अनुपात में कम कर दिए जाते हैं.
इस वजह से बड़े बिल पर भी बीमा कंपनी काफी कम भुगतान करती है. आजकल हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम में एक नई चीज देखने को मिल रही है. इसे बीमा कंपनियां को-पे लिमिट कहती हैं. को-पे का मतलब है कि हर क्लेम में एक तय प्रतिशत मरीज को खुद देना होगा, चाहे पॉलिसी कितनी भी बड़ी क्यों न हो.
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