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कच्चा तेल 100 डॉलर के पार, एक्सपर्ट ने बता दिया पेट्रोल-डीजल कब महंगा होगा

साल 2022 के बाद ये पहला मौका है जब इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल का दाम 100 डॉलर प्रति बैरल का लेवल पार कर गया है. रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 8 जून 2022 को 123.58 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर पहुंच गई थी.

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petrol diesel price today
भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है (फोटो क्रेडिट: Aaj Tak)
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प्रदीप यादव
9 मार्च 2026 (पब्लिश्ड: 04:26 PM IST)
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क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल का भाव सोमवार 9 मार्च को 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया. शुरुआती कारोबार इंटरनेशनल मार्केट में बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड आयल का भाव करीब 25 परसेंट बढ़कर 115.68 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. इसी तरह डब्ल्यूटीआई (वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट) क्रूड का अप्रैल वायदा भाव भी करीब 27 परसेंट उछलकर 115.19 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. साल 2022 के बाद ये पहला मौका है जब इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल का दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के पार गया है. 

इससे पहले 8 जून 2022 को इंटरनेशनल मार्केट में ब्रेंट क्रूड का दाम 123.58 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर पहुंच गया था. इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल का दाम 100 डॉलर के पार जाने के बाद अब इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि भारत की तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कब और कितना इजाफा करेंगी. हालांकि पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर सरकार की तरफ से बयान आया है. सरकार का कहना है कि हाल-फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की कोई योजना नहीं हैं. 

हाल ही तेल कंपनियों ने घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 60 रुपये बढ़ा दी. इसके बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी के कयास लगाए जा रहे हैं. 9 मार्च 2026 को दिल्ली में पेट्रोल की कीमत फिलहाल 94.77 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत 87.67 रुपये प्रति लीटर है. जानकारों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा तो तेल कंपनियों के पास पेट्रोल-डीजल की कीमतो में बढ़ोतरी के सिवा कोई चारा नहीं होगा.  

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क्या पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ेंगी?

एनर्जी एक्सपर्ट नरेन्द्र तनेजा ने ‘लल्लनटॉप’ से बातचीत में कहा कि अगर पश्चिम एशिया में लड़ाई लंबे समय तक जारी रहती है तो तेल कंपनियों पर पेट्रोल -डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी करने का दबाव देखने को मिल सकता है. हालांकि उनका ये भी कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में अचानक तेजी का पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर तुरंत असर नहीं दिखाई देता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार से तेल खरीदने से लेकर जहाज से भारत आने और फिर इस क्रूड को रिफाइन करके पेट्रोल पंपों में बिक्री के लिए तैयार होने में 27 दिन का समय लगता है.  

तनेजा का कहना है कि भारत की तेल कंपनियों के पास तेल का पर्याप्त भंडार है और काफी कम भाव पर खरीदा गया है. उनका कहना है कि आमतौर पर भारत की तेल कंपनियों के पास 40-50 दिन का तेल का स्टॉक रहता है. उनका कहना है कि अभी तेल कंपनियों के पास जो तेल का स्टॉक है वह 65 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर खरीदा गया है. इसलिए फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं हैं. लेकिन अगर युद्ध लंबा चलता है यानी दो हफ्ते से ज्यादा खिंचता है तो भारत की तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने का दबाव दिख सकता है. 

तनेजा का ये भी कहना है कि इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड के दाम एक डॉलर बढ़ने पर तेल खरीदने वाली कंपनियों को 9000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है. चूंकि तेल कंपनियों की पुरानी तेल खरीद 65 डॉलर प्रति बैरल के भाव के आसपास है और अभी भाव 110-115 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुके हैं. ऐसे में अगर मौजूदा रेट के हिसाब से भारत की तेल कंपनियों के तेल खरीदना पड़ा तो हजारों करोड़ अतिरिक्त चुकाने होंगे. जाहिर तौर पर तेल कंपनियां इस नुकसान की भरपाई का कोई न कोई रास्ता जरूर तलाशेंगी. 

इंडिया टुडे की एक खबर बताती है कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है. अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो तेल कंपनियों को या तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाने या बढ़ी हुई लागत को खुद वहन करने के दबाव का सामना करना पड़ सकता है.

सस्ते तेल से सरकारी तेल कंपनियों ने खूब काटी मलाई  

हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट में विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय तेल कंपनियों खासतौर से इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन वगैरह को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं करनी चाहिए. इन कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय तेल के दाम कम रहने के दौरान ईंधन की बिक्री से मोटा मुनाफा कमाया है. इन तेल कंपनियों ने कच्चा तेल सस्ता (60-65 डॉलर प्रति बैरल) रहने के बाद भी पेट्रोल-डीजल के दामों में कटौती नहीं की.  

इस वजह से इन कंपनियों को खूब लाभ हुआ है. चालू वित्त 2025-2026 के पहले 9 महीनों में तीनों कंपनियों का संयुक्त शुद्ध लाभ 192% बढ़कर 57 हजार 810 करोड़ रुपये रहा है. वित्त वर्ष 2024-25 में इसी दौरान इन सभी तेल कंपनियों का शुद्ध लाभ 19,768 करोड़ रुपये रहा था. 

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तेल कंपनियों का मुनाफा घटेगा 

इस बीच, अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज फर्म यूबीएस ने कम मार्जिन का हवाला देते हुए इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के लिए वित्त वर्ष 2026- 2027 के प्रॉफिट के अनुमान में कटौती की है. मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट में ब्रोकरेज फर्म के हवाले से कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में इंडियन ऑयल कारपोरेशन का मुनाफा 19% घट सकता है. वहीं, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड का प्रॉफिट 15% गिर सकता है और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड के मुनाफे में 46% की कमी आ सकती है. ब्रोकरेज फर्म ने यह भी चेतावनी दी कि अगर ये तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाती हैं तो तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि भी मुनाफे को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है. 

यूबीएस का कहना है कि क्रूड के दाम चढ़ने से भारतीय तेल कंपनियों का लगभग आधा मुनाफा साफ हो सकता है.

तेल कंपनियों के शेयर औंधे मुंह गिरे

9 मार्च को सार्वजनिक क्षेत्र की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) के शेयरों में भारी गिरावट देखी गई. मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि सरकार ने कहा है कि फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की जाएगी और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में इस उछाल के चलते ओएमसी को कम मुनाफे से ही संतोष करना पड़ सकता है. आज शुरुआती कारोबार में भारत पेट्रोलियम के शेयर 7% गिरकर 328.15 रुपये पर आ गए. इंडियन ऑयल के शेयर 2% गिरकर 168.1 रुपये पर आ गए. वहीं, एचपीसीएल का शेयर 6.7% गिरकर 378.1 रुपये प्रति शेयर पर आ गया.

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क्यों उछल रहा कच्चा तेल?

कच्चे तेल में अचानक आई जोरदार तेजी के तीन-चार बड़े कारण हैं. पहली वजह ये है कि ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी युद्ध की वजह से कच्चे तेल की सप्लाई पर असर पड़ा है. ईरान पर हमलों और जवाबी कार्रवाई से तेल उत्पादन और तेल का भंडार करने वाली जगहों को नुकसान पहुंचा है. इससे बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई कम होने की आशंका बढ़ गई है.स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के रास्ते से तेल सप्लाई में बाधा आई है. दुनिया का लगभग 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है. युद्ध के कारण टैंकरों की आवाजाही कम हो गई है और तेल लेकर आने वाले कई जहाजों ने रास्ता बदल दिया है. इसके अलावा पश्चिमी एशिया के तेल उत्पादक देशों की तरफ से उत्पादन में कटौती के बाद कच्चे तेल का भाव उछला है.

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