The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Auto
  • What is DPF in diesel cars and how does is work BS6

डीजल गाड़ी खरीदने वाले हैं, तो हाईवे के चक्कर भी लगाते रहना, वरना नुकसान हो जाएगा

Diesel cars DPF use: डीजल इंजन बर्निंग से हानिकारक गैसें बाहर ना निकले, इसके लिए इन कारों में DPF लगाया जाता है. ये फिल्टर ईंधन से जलकर निकलने वाले हानिकारक कणों को बाहर जाने से रोकता है. मगर यह अगर खराब हो गया है, तो इसे बदलवाना ही एक ऑप्शन बचता है.

Advertisement
pic
3 फ़रवरी 2026 (अपडेटेड: 3 फ़रवरी 2026, 10:50 AM IST)
Diesel cars DPF use
डीजल कारों को लंबी यात्राओं पर लेकर जाना बीच-बीच में जरूरी है. (फोटो-Pexels)
Quick AI Highlights
Click here to view more

देश में इस समय इलेक्ट्रिक गाड़ियों की पूछ-परख थोड़ी ज्यादा है मगर पेट्रोल और डीजल कारों की मांग भी कोई कम नहीं हुई हैं. पेट्रोल के साथ डीजल गाड़ियों का अपना फैन बेस है. एक बार एक्सीलरेटर पर पैर रखते ही गाड़ी भगाने वालों को अब भी डीजल गाड़ी अट्रैक्ट करती है. डीजल मतलब ताकत. ठीक बात लेकिन यह सब कुछ सालों तक ठीक था. जो आप अभी यानी 2026 में डीजल गाड़ी लेने का प्लान कर रहे हैं तो जरा थम जाइए या फिर एक्सेलरेटर पर पैर रखे रहिए. दोनों में से एक तो करना पड़ेगा वरना लाखों का खर्च माथे पर आ जाएगा. बताते कैसे. 

दरअसल, सरकार ने 2020 में एमिशन कंट्रोल के लिए BS6 लागू किया गया था. इसमें ऑटो कंपिनयों से कहा गया कि वह अपने डीजल इंजन से निकलने वाले पार्टिकुलेट मैटर (हानिकारक कालिख) को कम करने के लिए एक फिल्टर लगाएं. बढ़िया चीज है मगर यही असल दर्द भी है. 

क्या है डीजल पार्टिकुलेट फिल्टर (DPF)

डीजल पार्टिकुलेट फिल्टर (DPF) वॉल-फ्लो सिरेमिक हनीकॉम्ब स्ट्रक्चर का इस्तेमाल करता है. ये एग्जॉस्ट गैसों में मौजूद हानिकारक कालिख को बाहर जाने से रोकता है. इस फिल्टर की दीवारें अपने माइक्रो पोर्स से साफ गैसों को बाहर निकलने देती हैं, जबकि कालिख को अंदर ही जमा कर लेती है. इस फिल्टर को अक्सर इंजन के करीब फिट किया जाता है. ताकि वह जल्दी ऑपरेटिंग सिस्टम तक पहुंच सके. एक रिपोर्ट की माने तो DPF की मदद से पार्टिकुलेट एमिशन में 85 से 99% तक की कमी लाई जा सकती है.

ये तो हुई बात कि ये काम कैसे करता है. लेकिन यहां एक ब्रेक है.  DPF को डिजाइन किया है लंबी दूरी के लिए. जब एक कार को 60 और 80 km/h की हाई स्पीड पर चलाया जाता है, तो एग्जॉस्ट गैसों का तापमान 250 से 450 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है. लेकिन ये सिचुएशन सिर्फ हाईवे या शहर की चौड़ी सड़कों पर गाड़ी चलाते समय ही क्रिएट हो सकती है. दरअसल, इन कालिख को जलने के लिए एक ऑपरेटिंग टेंपरेचर तक पहुंचना होता है. इसे रिजनरेशन टेम्परेचर कहा जाता है और इस तापमान पर पहुंचने के लिए कार को थोड़ा तेज स्पीड पर ड्राइव किया जाना चाहिए. अगर आप सिर्फ घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक के लिए डीजल कार का इस्तेमाल करते हैं. वो भी 30-40 मिनट के सफर में अधिकतर समय ट्रैफिक में जाता है, तो DPF में क्लोगिंग की समस्या हो सकती है.

अगर ये कालिख एक बार फिल्टर में अच्छे से जमा हो गई, तो इसे किसी प्रोफेशनल के पास जाकर साफ कराना या इन कालिख को जलवाना पड़ता है. ज्यादातर मामलों में इस पूरे फिल्टर को ही रिप्लेस करना एक ऑप्शन बचता है. जिसमें 1 लाख रुपये तक का खर्चा आ सकता है. ऊपर से ये चेंजिंग प्रोसेस इंश्योरेंस या एक्सटेंडेड वारंटी में कवर नहीं होती है. इसलिए ये पैसा भी आपकी जेब से ही जाता है. 

diesel_cars_dpf_use
रिजनरेशन तापमान (फोटो-Pexels)

 

मॉडर्न कारों में कालिख का लेवल पता करने के लिए प्रेशर सेंसर लगे होते हैं. आप इंजन से आने वाली अलग सी आवाज और अलग स्मेल से भी इसे महसूस कर सकते हैं. इसके साथ में जब DPF की लाइट डिजिटल इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर पर दिखना शुरू हो जाए, तो समझ जाइए कि फिल्टर की सफाई का समय आ गया है. और हम बता ही चुके है कि सफाई अगर नहीं हो पाई, आपने थोड़ा लेट किया तो रिप्लेसमेंट ही एक ऑप्शन है. इतना ही नहीं, जब ये फिल्टर क्लॉग हो जाता है, तो फ्यूल की खपत बढ़ जाती है और इंजन का पावर आउटपुट भी कम हो सकता है.

ये भी पढें: टर्बो इंजन और स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड फीचर्स के साथ Renault Duster की वापसी, लेकिन क्या कीमत भी सही है?

ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? डीजल गाड़ी तभी लीजिए जब खूब घूमी-घूमी वाला जुगाड़ हो. घर में खड़ी रखने का कोई तुक नहीं. अब जो कर में ताकत ही चाहिए तो नॉर्मल की जगह Turbo इंजन ले लीजिए. निराशा नहीं होगी. अब जो आपके पास पहले से ऐसी वाली डीजल गाड़ी है तो महीने में एक से दो बार लंबे टूर पर निकल जाइए. आपकी यात्रा सुखद हो. 

वीडियो: संसद में आज: UGC के नए नियमों पर रोक के बाद सदन में क्या हुआ, क्यों भड़के स्पीकर?

Advertisement

Advertisement

()