गाड़ी में तेल कम होने की लाइट जली फिर भी रिजर्व पर ड्राइविंग चालू है? बड़ा नुकसान हो सकता है
Fuel Indicator sign: फ्यूल टैंक में ईंधन कम होते ही फ्यूल इंडिकेटर का साइन इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर पर दिखने लगता है. लेकिन कई लोग इस लाइट को इग्नोर कर देते हैं. कार सुकून से चलाते रहते हैं. क्योंकि अभी-अभी तो गाड़ी रिजर्व में लगी है. उसके टैंक में ठीक-ठाक फ्यूल होगा ही. चलो, अभी आराम से कार चला लेते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि इससे नुकसान भी उठाना पड़ सकता है.

चलिए आज आपको फ्यूल भरना बताते हैं. क्यों बताते हैं? क्योंकि आप भी वो ही करते होंगे, जो हम करते हैं. यानी फ्यूल इंडिकेटर को नजरअंदाज. फ्यूल टैंक में ईंधन कम होते ही फ्यूल इंडिकेटर का साइन इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर पर दिखने लगता है. लेकिन कई लोग इस लाइट को इग्नोर कर देते हैं. कार सुकून से चलाते रहते हैं. क्योंकि अभी-अभी तो गाड़ी रिजर्व में लगी है. उसके टैंक में ठीक-ठाक फ्यूल होगा ही. चलो, अभी आराम से कार चला लेते हैं. थोड़ा किलोमीटर और कवर कर लेते हैं. फिर पेट्रोल पंप पर रुक जाएंगे.
अगर आप भी ऐसा ही करते हैं, तो थामा-थामा. रिजर्व में गाड़ी आने का मतलब है कि नजदीकी पेट्रोल पंप देखते ही फ्यूल भरवा लेना है. ईंधन की टंकी को जीरो तक लाने का कोई मतलब नहीं है. क्योंकि इस आदत से पहले गाड़ी को नुकसान होगा और बाद में जेब की सफाई. बताते हैं क्यों.
फ्यूल इंडिकेटर में दिखने वाला फ्यूल पंप या गैस कैन आइकन आमतौर पर येलो या ऑरेंज कलर में जलता है. इसके दिखने का मतलब है कि गाड़ी के टैंक में फ्यूल अब रिजर्व लेवल पर पहुंच गया है. यह जानकारी फ्यूल टैंक में लगे फ्लोट बेस्ड फ्यूल लेवल सेंसर से मिलती है. फ्लोट ईंधन का लेवल बताता है. यह टैंक में फ्यूल के ऊपर-नीचे तैरता रहता है और जैसे-जैसे फ्यूल कम होने लगता है, वैसे-वैसे यह भी नीचे आने लगता है.
इससे हमें संकेत मिलता है कि गाड़ी रिजर्व में लग चुकी है. हालांकि, रिजर्व में भी टैंक के अंदर कम से कम 5-7 लीटर फ्यूल बचा होता है. यही वजह है कि कई लोग यह सिंबल पहली नजर में इग्नोर कर देते हैं. लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि कार को हमेशा रिजर्व पर ‘यूं ही चला-चला मैं’ गाते हुए चलाया जाए. इसकी भी वजह है.
1- फ्यूल टैंक के अंदर लगा फ्यूल पंप. यह कूलिंग और लुब्रिकेशन के लिए फ्यूल का इस्तेमाल करता है. ईंधन के लेवल कम होने से कूलिंग घट जाती है, जिससे पंप ओवरहीट कर सकता है. नतीजा? पंप खराब हो जाएगा.
2- फ्यूल टैंक के नीचे समय के साथ मिट्टी और जंग के कण जमा हो सकते हैं. जब टैंक लगभग खाली हो जाता है, तो फ्यूल पंप नीचे से यही ईंधन खींचता है. यानी जहां ये कण होते हैं. जिससे फ्यूल फिल्टर जल्दी जाम हो सकता है. यूं, तो फिल्टर का काम गंदगी को रोकना है. लेकिन बार-बार ऐसा करने से वह चोक हो सकता है. फिल्टर या पंप कमजोर हुआ, तो ईंधन तक सही मात्रा में फ्यूल नहीं पहुंचेगा.

इसी हैबिट के रिपीटेशन से इंजन की परफॉर्मेंस, माइलेज और फ्यूल सिस्टम की लाइफ पर भी असर पड़ सकता है. फ्यूल पंप या फिल्टर ठीक कराने में 15-20 हजार रुपये का खर्च आ सकता है. लेकिन इंजन से जुड़ी दिक्कत? बहुत महंगा सौदा है. इस आदत से सिर्फ जेब ही खाली नहीं होती, बल्कि गाड़ी की उम्र भी घटती है. अगर आप अक्सर रिजर्व पर गाड़ी चलाते हैं, तो जान लीजिए कि इससे कार के कंपोनेंट्स डैमेज हो सकते हैं. गाड़ी अचानक बीच सड़क पर बंद पड़ सकती है और फिर टोइंग का खर्चा, तो अलग है ही.
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रिजर्व पर गाड़ी ना चलाने के लिए आप कुछ चीजें कर सकते हैं. माने कि एडवांस में फ्यूल भरवाते रहें. इससे आप इस चिंता से मुक्त रहेंगे कि टंकी खाली होने वाली है. रिस्क लेने से अच्छा है, थोड़ा एडवांस होना.
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