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महिला ने जैसे OTP बताया, उड़ गए 3.73 लाख रुपये, HC ने SBI से कहा- पूरा पैसा वापस दो

केरल हाई कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को निर्देश दिया कि वह एक सेवानिवृत्त कॉलेज प्रिंसिपल के डेबिट कार्ड से किए गए अनधिकृत लेनदेन के बाद उन्हें 3.73 लाख रुपये वापस करे. रिपोर्ट के मुताबिक, जालसाज ने याचिकाकर्ता के बचत बैंक खाते से जैसे ही रकम निकाली, उन्होंने तुरंत शिकायत दर्ज करा दी थी, लेकिन फिर भी कुछ नहीं हुआ.

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साइबर ठगी के मामले में रिफ़ंड पर केरल हाई कोर्ट का अहम फैसला

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  • केरल उच्च न्यायालय ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को एक सेवानिवृत्त कॉलेज प्रिंसिपल के डेबिट कार्ड से हुए 3.73 लाख रुपये की अनधिकृत लेनदेन की राशि वापसी का आदेश दिया।
  • पक्षकार के मुताबिक ग्राहक द्वारा तुरंत शिकायत दर्ज कराने के बावजूद बैंक ने उचित कार्रवाई नहीं की, जबकि जालसाज की पहचान पुलिस द्वारा कर ली गई थी।
  • अदालत ने SBI को चार सप्ताह के भीतर रकम लौटाने का निर्देश दिया है, जिससे शून्य-दायित्व नियम के अनुक्रम में ग्राहक का वित्तीय नुकसान पूरा किया जा सके।

साइबर ठगी के बाद अकाउंट से गया पैसा ज्यादातर मामलों में वापस नहीं आता. इसकी एक बड़ी वजह ठगी की शिकायत समय पर नहीं होना भी है. एक्सपर्ट कहते हैं कि साइबर ठगी में पहला एक घंटा सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि ठग आमतौर पर पैसा एक अकाउंट में नहीं रखते. लेकिन तब क्या हो जब ठगी की शिकायत उसी दिन दर्ज हो गई हो, फिर भी बैंक कोई कार्रवाई ना करे. आप सही समझे. तब कोर्ट काम आता है. ऐसे ही एक मामले में केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को 3.73 लाख रुपये रिफंड करने का आदेश दिया है.

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डेबिट कार्ड से ठगी

केरल उच्च न्यायालय ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को निर्देश दिया कि वह एक सेवानिवृत्त कॉलेज प्रिंसिपल के डेबिट कार्ड से किए गए अनधिकृत लेनदेन के बाद उन्हें 3.73 लाख रुपये वापस करे. लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, 13 जुलाई 2019 को पीड़िता को एक एसएमएस मिला, जिसमें कहा गया था कि उनका डेबिट कार्ड जल्द ही ब्लॉक कर दिया जाएगा. इसके तुरंत बाद एक नंबर से कॉल आया, जो बिल्कुल आधिकारिक लग रहा था. कॉलर पर भरोसा करते हुए उन्होंने कथित 'एसबीआई सिक्योर ऐप' के "रजिस्ट्रेशन" के लिए एक ओटीपी साझा कर दिया, जिसके बाद उनके खाते से 3.73 लाख रुपये काट लिए गए. आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि डेबिट कार्ड को ब्लॉक या अनब्लॉक करने के लिए संबंधित बैंक के ऐप की जरूरत होती है. इस केस में भी बैंक के ऐप का एक्सेस हासिल करने के लिए ओटीपी ली गई. 

जीरो-लायबिलिटी नियम

जालसाज ने याचिकाकर्ता के बैंक खाते से जैसे ही रकम निकाली, उन्होंने तुरंत शिकायत दर्ज करा दी थी. जब बैंक ने आगे कुछ नहीं किया तो उन्होंने कोर्ट का सहारा लिया. केस में अदालत ने पाया कि बैंक ने यह सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया कि निकाली गई रकम वापस खाते में जमा हो जाए. यहां तक ​​कि पुलिस द्वारा जालसाज की पहचान कर लेने के बाद भी बैंक ने आगे कोई कार्रवाई नहीं की.

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अदालत ने माना कि यह मामला भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के 'ज़ीरो-लायबिलिटी' (शून्य-दायित्व) प्रावधान के अंतर्गत आता है. इस प्रावधान के अनुसार, यदि किसी बैंक ग्राहक के पैसे किसी तीसरे पक्ष की गलती (जैसे सुरक्षा में सेंध) के कारण किसी अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन में चले जाते हैं, जिसमें न तो बैंक की गलती है और न ही ग्राहक की तो ग्राहक पर कोई वित्तीय लायबिलिटी नहीं होगी. ऐसे अनधिकृत लेनदेन के बारे में बैंक से सूचना मिलने के तीन वर्किंग डेज़ के भीतर ग्राहक को बैंक को सूचित करना होगा.

उच्च न्यायालय ने SBI को चार सप्ताह के भीतर 3.73 लाख रुपये के नुकसान की भरपाई करने का निर्देश दिया. आदेश में कहा गया है, "दूसरे प्रतिवादी बैंक को निर्देश दिया जाता है कि वह सर्कुलर के प्रावधानों के अनुसार, 3,73,000 रुपये के नुकसान की भरपाई जल्द से जल्द, और हर हाल में चार सप्ताह के भीतर करे.

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ऐसी ठगी होने पर क्या करें?

साइबर अपराधी अक्सर बैंक, ईडी (ED), आरबीआई और पुलिस अधिकारियों का रूप धारण करके ग्राहकों को ओटीपी (OTP), सीवीवी (CVV) और एटीएम पिन जैसी गोपनीय जानकारी साझा करने के लिए बरगलाते हैं. इनके झांसे में मत आइए. किसी के साथ भी ओटीपी शेयर न करें. अनधिकृत लेनदेन की तुरंत रिपोर्ट करें और अपनी शिकायत का रिकॉर्ड रखें.

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