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सुब्रमण्यन स्वामी Air India-Tata डील के खिलाफ HC पहुंचे, 'टाटा के पक्ष में धांधली' का आरोप

स्वामी की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट 6 जनवरी को सुनाएगा फैसला

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तीनों तस्वीरें पीटीआई से साभार हैं.
घाटे में चल रही सरकारी एयरलाइंस एयर इंडिया को करीब 18 हजार करोड़ रुपये में टाटा संस को बेचने का फैसला विवादों में घिर आया है. केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी के ही नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने केंद्र सरकार पर इस डील में मनमानी और धांधली का आरोप लगाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है. हाई कोर्ट इस पर गुरुवार 6 जनवरी को फैसला सुनाएगा.
इससे पहले सुब्रमण्यन स्वामी की याचिका पर मंगलवार 4 जनवरी को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने इसका विरोध किया. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका को दुर्भावनाग्रस्त बताया और कहा कि यह डील एक नीतिगत फैसला है, जिसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.
दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की बेंच ने सभी पक्षों को 5 जनवरी तक लिखित में अपनी बात रखने का निर्देश दिया और कहा, 'हम अगले दिन आदेश पारित करेंगे.' सुब्रमण्यन के आरोप सुनवाई के दौरान अदालत में व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित सुब्रमण्यन स्वामी ने एयर इंडिया विनिवेश की प्रक्रिया को "मनमाना, असंवैधानिक, अनुचित" बताया. साथ ही इसे "टाटा के पक्ष में धांधली" करार दिया. उन्होंने अदालत से गुजारिश की कि केंद्र सरकार को यह डील रद्द करने का आदेश जारी किया जाए. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक 83 वर्षीय स्वामी ने कह -
''इस प्रक्रिया में टाटा के अलावा बोली लगाने वाली एक मात्र कंपनी स्पाइसजेट थी, जो मद्रास हाई कोर्ट में दिवाला कार्यवाही (Insolvency Proceedings ) का सामना कर रही थी और बोली नहीं लगा सकती थी... इसका मतलब है कि बोली लगाने वाला केवल एक था और यह बोली लगाई ही नहीं जा सकती."
केंद्र सरकार की दलील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि सरकारी एयरलाइंस भारी घाटे में चल रही थी और रोजाना हजारों करोड़ का नुकसान हो रहा था. मेहता ने दलील दी-
''हालांकि स्पाइसजेट दिवाला कार्यवाही का सामना कर रही थी, लेकिन यह कभी भी उस कॉन्सोर्शियम का हिस्सा नहीं रही, जिसने एयर इंडिया के लिए बोली लगाई. बोली की अगुवाई इसके मालिक अजय सिंह ने की थी.''
पिछले साल 8 अक्टूबर को आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने एयर इंडिया एक्सप्रेस लिमिटेड और एयर इंडिया में भारत सरकार की 100 फीसदी हिस्सेदारी की बिक्री के लिए टैलेस प्राइवेट लिमिटेड की उच्चतम बोली (Highest Price Bid) को मंजूरी दी थी.
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एयर इंडिया की सांकेतिक तस्वीर (साभार: आज तक)
एयर एशिया कनेक्शन सुब्रमण्यन स्वामी ने वकील सत्य सभरवाल के जरिए दाखिल याचिका में यह दलील भी दी है कि मैनेजमेंट ट्रांसफर के जरिए 100 फीसदी सरकारी हिस्सेदारी टैलेस प्राइवेट लिमिटेड के हवाले करना राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा के भी खिलाफ है, क्योंकि टाटा बहुत हद तक एयर एशिया का हिस्सा है.
लेकिन मेहता ने इसकी काट करते हुए कहा कि टैलेस प्राइवेट लिमिटेड, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है और इसका एयर एशिया से कोई लेना-देना नहीं है. अगर एयर एशिया ने अतीत में किसी केस का सामना किया हो, तो यहां उसका जिक्र बेमतलब है.
वहीं टाटा की तरफ से अदालत में मौजूद सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने दलील दी कि एयर इंडिया की बोली जीतने वाली कंपनी 100 फीसदी भारतीय है, जिसका 100 फीसदी मालिकाना हक एक भारतीय के पास है. गौरतलब है एयर एशिया में टाटा संस की बड़ी हिस्सेदारी रही है और हाल ही में उसने इसे और बढ़ा लिया है. उधर स्वामी ने एयर इंडिया की विनिवेश प्रक्रिया में शामिल सरकारी एजेंसियों और अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कराने की मांग की है. क्या है एयर इंडिया-टाटा डील? एयर इंडिया, साल 2007-08 में इंडियन एयरलाइंस के साथ विलय के बाद से ही घाटे में चल रही थी. बिकने से ठीक पहले तक उस पर 61 हजार 562 करोड़ रुपये का कर्ज चढ़ चुका था. सरकार इसे बेचने की पहले भी कई कोशिशें कर चुकी थी. लेकिन आखिरकार पिछले साल बात बनी. विनिवेश की लंबी प्रक्रिया और बोली के बाद आखिरकार सरकार ने 25 अक्टूबर 2021 को 18 हजार करोड़ रुपये में एयर इंडिया की बिक्री के लिए टाटा संस के साथ एक समझौता किया. डील में कहा गया था कि टाटा सरकार को 2700 करोड़ रुपये नकद देगी और एयरलाइंस पर बकाया 15 हजार 300 करोड़ रुपये के कर्ज की देनदारी भी स्वीकार करेगी.