आप लोगों को कुर्गों पर हमला करना है. फिर औरतों, बच्चों सबके सामने तलवार रख सबको मुसलमान बनाना है. इसके लिए चाहे उनको बंदी बनाना पड़े या मारना पड़े... दस साल पहले इस जिले के 10-15 हज़ार लोगों को पेड़ पर टांग दिया गया था. तब से ये पेड़ अभी भी इंतजार कर रहे हैं.
-ये मजमून है एक चिट्ठी का, जिसे टीपू सुल्तान ने अपने कमांडर को लिखा था.
योद्धा जो धर्म से ऊपर नहीं उठ पाता था
टीपू को एक बड़ा योद्धा माना जाता है. ये सच है कि अंग्रेजों से लड़ने में टीपू ने बहुत बहादुरी दिखाई थी. पर इसके साथ ही वो मराठा, निज़ाम, ट्रावनकोर के राजा, कुर्ग सबको दबाना चाहता था. इसके लिए उसने क्रूरता करने में कोई कोताही नहीं की. उसके डैडी हैदर अली ने वाड्यार वंश से सत्ता छीन ली थी. हैदर के मरने के बाद 1782 में टीपू मैसूर का शासक बना था. शासक बनने के तुरंत बाद इसने अपने राज्य में सारे विरोधियों को ठिकाने लगा दिया.

1788 में टीपू सुल्तान ने अपना ध्यान केरल की तरफ घुमाया. एक बड़ी सेना भेज दी. मशहूर कालीकट शहर को चकनाचूर कर दिया गया. सैकड़ों मंदिरों और चर्चों को चुन-चुन के गिराया गया. हजारों हिन्दुओं और क्रिश्चियनों को मुसलमान बना दिया गया. जो लोग नहीं माने, उनको क़त्ल कर दिया गया.
ये सारी बातें टीपू के किसी दुश्मन ने नहीं कहीं, बल्कि उसके दरबारी इतिहासकार मीर हुसैन किरमानी ने लिखी हैं.

ट्रावनकोर का घेरा, इस मौके को अंग्रेजों ने नहीं छोड़ा
इसके बाद हजारों लोग वहां से भाग-भागकर ट्रावनकोर चले गए. जाना ही था. ये शहर सत्रहवीं शताब्दी के प्रतापी राजा मार्तंड वर्मा ने बसाया था. मार्तंड ने अपनी सेना को एक फ्रांसीसी अफसर की मदद से बड़ी सही ट्रेनिंग दी थी. वो परंपरा चली आ रही थी. पर टीपू की सेना बहुत बड़ी थी. जमीनी लड़ाई में सेना की संख्या मायने रखती है. तब ट्रावनकोर के राजा ने ईस्ट इंडिया कंपनी से मदद मांगी. वो लोग एक हाथ आगे निकले. 1791 में अंग्रेजों ने निज़ाम, मराठा सबको मिलाकर मैसूर पर चढ़ाई कर दी. टीपू हार गया. उसका आधा राज्य ले लिया गया. उसके दो बेटों को अंग्रेजों ने अपने पास रख लिया. क्योंकि टीपू पर उनको भरोसा नहीं था.
इंडिया के दोस्त दगा दे गए, टीपू ने विदेश में दोस्ती शुरू की
इंडिया में अब टीपू का कोई नहीं रहा था. उसने विदेश में अपने दोस्त खोजने शुरू कर दिए. नेपोलियन को लिखी उसकी चिट्ठियां जगजाहिर हैं. पर नेपोलियन ने कोई मदद नहीं की. टीपू ने ओटोमन साम्राज्य के सुल्तान को भी चिठ्ठी लिखी थी कि सारे मुसलमान मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद करें. समस्या ये थी कि नेपोलियन ने इजिप्ट को कब्जिया लिया था. और ओटोमन सुल्तान की नज़र में नेपोलियन के खिलाफ लड़ना ही जिहाद था. ब्रिटिश उसके लिए दोस्त थे. उसने अंग्रेजों को टीपू वाली बात बता दी.

अब अंग्रेजों ने फिर से सबको जुटाया और 1799 में मैसूर पर चढ़ाई कर दी. इसमें भी नेपोलियन ने टीपू की मदद नहीं की. तीन हफ्ते की बमबारी के बाद किले की दीवारें टूट गईं. टीपू लड़ता रहा. हाथ में तलवार लिए वो श्रीरंगपटनम किले के दरवाजे पर मारा गया. अंग्रेजों ने सत्ता पुराने वाड्यार वंश के राजकुमार को दे दी. इसी लड़ाई के बाद अंग्रेजों का सेनापति 30 साल का कर्नल आर्थर वेलेजली फेमस हो गया. 16 साल बाद इसी वेलेजली ने नेपोलियन को भी वाटरलू में निपटा दिया.
टीपू एक बहादुर की मौत मरा. पर केरल और कुर्ग में उसने हिन्दुओं और क्रिश्चियनों पर जुल्म तो किया ही था. हालांकि 1791 में अपनी हार के बाद टीपू ने कई मंदिरों में बहुत सारा दान-दक्षिणा भी दिया था. पर ये कहना मुश्किल है कि उसका दिल बदल गया था या हार के बाद लोगों को मिलाने के लिए कर रहा हो. ये नहीं साफ़ हो पाता कि वो देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा था. थोड़े शेड्स ऑफ़ ग्रे हैं उसके चरित्र में.

ये अंश लिया गया है संजीव सान्याल की किताब
The Ocean Of Churn से, जो वाइकिंग प्रकाशन से आई है. नई किताब है. बहुत इंटरेस्टिंग है.
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