पहली बार अम्ताप बच्चन को मरते देखा था. अमिताभ बच्चन, अम्ताप बच्चन तब थे, जब सारुक्खान था, अमीर खान था. और हम छोटे थे. इत्ते छोटे कि 'मैं आजाद हूं' में वो बिल्डिंग से कूदे और हमाई कीक निकल गई. अम्ताप बच्चन का मतलब वो आदमी जो सब कर लेता था, सब माने सब. जब वो स्क्रीन पर आते तो लगता सब सही हो जाएगा. भाई सही रास्ते पे आ जाएगा, घूंसे से हिमालय टूटेगा. बहन का बदला लिया जाएगा. मां के आंसू सूखेंगे. फिल्मों का मतलब दूरदर्शन पर शुक्रवार-शनिवार की रात वाली फिल्में होती थीं. और इंतजार सिर्फ गोविंदा या अमिताभ की फिल्मों का होता था.
अब तक अमिताभ बच्चन या तो पुलिस वाले होते थे. या क्रिमिनल या बिजनेसमैन. लेकिन पहली बार इतना गरीब देखा कि सड़क पर पड़ा सेब खाने को बढ़ लिए. जी कलप गया था उस रोज. उम्र इतनी नहीं थी कि फिल्म में बहुत कुछ समझ आता, हम सिर्फ इस चीज का इंतजार करते कि कब वो कूद-कूद के गुंडों को मारें, ऐसा कुछ भी न हो रहा था. फिल्म का अंत आ गया. वो बिल्डिंग से कूद पड़े. वो नीचे गिर रहे थे. हमारी कीक छूट गई. वो बहुत ऊपर से गिर रहे थे. मुझे लगा बीच में रस्सी पकड़ के कहीं अटक रहेंगे या कोई पीछे से आकर बचा लेगा, ऐसा भी कुछ न हुआ. जमीन पर गिरे और मर गए. पापा हंसे. बोले- लो गया तुम्हारा लंबू! हमको पता है, वो भी ऐसा इसलिए कहे क्योंकि उनको भी बुरा लग रहा होगा और वो शो नहीं होने देना चाह रहे थे. फिल्म खतम हुई. मैंने रजाई में मुंह डाला और सो गया. आंसू बह रहे थे. किसी को पता नहीं चला. न बताने का मतलब था. लग रहा था धोखा हुआ है. और हर चीज हो सकती थी, लेकिन अम्ताप बच्चन कैसे मर सकता है. उससे बड़ा दुःख ये था कि अब वो कभी नहीं दिखेगा. हफ्ता बड़ा बोझिल-बोझिल सा बीता.
एक हफ्ते बाद. रविवार की दोपहर वाली फिल्म में 'आज का अर्जुन' आ रही थी.























