The Lallantop

मार्क टुली: नेहरू के बाद का भारत दर्ज करने वाला अंग्रेज, जो 'दिल से हिंदुस्तानी' था

Mark Tully भारत में जन्मे थे और एक पादरी बनना चाहते थे. England जाकर उन्होंने पादरी बनने की कोशिश भी की, लेकिन फिर भारत वापस आ गए. BBC ने 1964 में उन्हें नई दिल्ली में संवाददाता बनाकर भेजा.

Advertisement
post-main-image
मार्क टुले भारत में जन्में एक जाने-माने ब्रिटिश पत्रकार थे. (India Today/Chandradeep Kumar)

आजाद भारत के इतिहास के बड़े हिस्से को अगर किसी एक विदेशी पत्रकार ने सबसे लंबे वक्त तक और सबसे करीब से दर्ज किया तो वो नाम संभवत मार्क टुली है. एक ऐसा अंग्रेज, जो भारत में जन्मा. इसने भारत को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि जिया. नेहरू के बाद के भारत यानी इमरजेंसी, पंजाब संकट, अयोध्या, दंगे, चुनाव, धर्म, सत्ता, गांव आदि को दुनिया ने जिस आवाज में समझा, वो आवाज थी मार्क टुली की.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement

ऐसे जाने-माने पत्रकार मार्क टुली का रविवार 25 जनवरी 2026 को 90 साल की उम्र में दिल्ली में निधन हो गया. टुली लंबे समय से बीमार चल रहे थे और साकेत के मैक्स अस्पताल में भर्ती थे. यहीं उन्होंने अंतिम सांस ली. भारत में निष्पक्ष पत्रकारिता के समर्थक टुली ने अपने पीछे एक गहरा खालीपन छोड़ दिया है.

2001 में नाइटहुड के लिए चुने जाने के बाद BBC को दिए एक इंटरव्यू में टुली ने इंग्लैंड को "एक बहुत ही उदास जगह... अंधेरी और नीरस, भारत के चमकीले आसमान के बिना" याद किया था. 24 अक्टूबर 2025 को टुली के 90वें जन्मदिन पर उनके बेटे सैम टुली ने लिंक्डइन पर एक पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने अपने पिता की पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबी सेवा को दिल से श्रद्धांजलि देते हुए लिखा था,

Advertisement

मुझे लगता है कि मेरे पिता की उपलब्धियां UK-भारत संबंधों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं क्योंकि दोनों देशों के साथ उनका गहरा संबंध और प्यार है. हालांकि वे भारत में रहते हैं, लेकिन उनके UK से भी मजबूत संबंध हैं. 'दिल है हिंदुस्तानी, मगर थोड़ा अंग्रेजी भी!'

परिवार, दोस्ती और प्रोफेशन से इतर उन्हें गर्म बीयर, काउंटी क्रिकेट, आरामदायक पब और एंग्लिकन पूजा-पाठ पसंद था. उन्हें बिरयानी जितनी ही खुशी बेकन और अंडे से भी मिलती थी. पुडिंग के बिना तो उनका कोई भी खाना पूरा नहीं होता था, खासकर अगर उस पर कस्टर्ड हो.

Mark Tulley
सैम टुली का पोस्ट. (LinkedIN)

 

Advertisement

मार्क टुली का सफरनामा

मार्क टुली का जन्म 1935 में अविभाजित बंगाल के कोलकाता के पास टॉलीगंज इलाके में हुआ था. उनके माता-पिता ब्रिटिश थे. दौर ब्रिटिश राज का था, जो अकड़ से भरपूर था. भारतीयों से दूरी, स्थानीय समाज से कटाव, यही माहौल था. टुली के बचपन में उन्हें स्थानीय लोगों से घुलने-मिलने की इजाजत नहीं थी. लेकिन शायद किस्मत को यही दूरी तोड़नी थी. अपने जीवन के पहले दस साल उन्होंने भारत में बिताए. 

दार्जिलिंग के एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई की. फिर आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया. उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज में थियोलॉजी पढ़ी. मन में ख्याल आया कि पादरी बनना चाहिए. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी सोच के साथ उन्होंने लिंकन थियोलॉजिकल कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा. 2020 में UNESCO Courier को दिए इंटरव्यू में उन्होंने खुद माना था,

मुझे लगा था कि शायद मैं पादरी बन सकता हूं, लेकिन मैं थोड़ा बागी किस्म का था. सेमिनरी का अनुशासन मुझे पसंद नहीं आया. साथ ही, मैं बीयर पीने में अच्छा था.

BBC ने तो उनकी जवानी को और भी बेबाकी से बयान किया था. BBC ने अपने आर्टिकल में लिखा,

वे (मार्क टुली) महिलाओं के पीछे जाते थे और खूब शराब पीते थे. अपने 21वें जन्मदिन पर उन्होंने पब के काउंटर पर 21 शिलिंग रखे और 21 पिंट बीयर खरीदी, जिन्हें उन्होंने खुद ही पी लिया.

पादरी बनने की राह यहीं खत्म हो गई. अब पत्रकार बनने का सफर शुरू करना था. 1964 में BBC ने मार्क टुली को नई दिल्ली का संवाददाता बनाकर भारत भेजा. यही वो साल था, जब भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ. यह अगले 30 सालों तक इंग्लिश ब्रॉडकास्टर के साथ उनके जुड़ाव की शुरुआत थी.

Mark Tully
बच्चों के साथ मार्क टुली. (linkedin.com/in/sam-tully-7978056)

1969 में भारत सरकार ने BBC पर प्रतिबंध लगा दिया. वजह थी 'फैंटम इंडिया' नाम की एक फ्रेंच डॉक्यूमेंट्री, जिस पर भारत की बुराई करने का आरोप था. टुली को लंदन वापस भेज दिया गया लेकिन किस्मत में दोबारा जन्मस्थली पर आना लिखा था. 1971 में वो फिर दिल्ली लौटे और 1972 में BBC ने उन्हें ब्यूरो चीफ बना दिया. भारत में उनकी पत्रकारिता करियर का यह अहम पड़ाव था. मार्क टुली की पत्रकारिता का मतलब सिर्फ खबर सुनाना नहीं था. उन्होंने इतिहास को चलते-फिरते देखा. 

साल 1971 का बांग्लादेश युद्ध, 1975 से 1977 की इमरजेंसी, 1979 में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की फांसी, ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद हुए सिख विरोधी दंगे, 1991 में राजीव गांधी की हत्या और 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसी घटनाएं टुली की रिपोर्टिंग में दर्ज हैं.

1992 में अयोध्या संकट के दौरान उन्हें गुस्साई भीड़ से धमकियां भी मिलीं. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, भीड़ में से कुछ लोगों को BBC पर शक था और उन्होंने 'मार्क टुली मुर्दाबाद' के नारे लगाते हुए उन्हें धमकी दी. उन्हें कई घंटों तक एक कमरे में बंद रखा गया, जिसके बाद एक स्थानीय अधिकारी और एक हिंदू पुजारी उनकी मदद के लिए आए. वो ऐसे रिपोर्टर नहीं थे, जो स्टूडियो में बैठकर हालात का अंदाजा लगाएं. वो मौके पर खड़े रहते थे, कभी-कभी खतरे के बिल्कुल सामने.

mark tully sam tully
बेटे सैम टुली (बाएं) के साथ मार्क टुली (दाएं). (linkedin.com/in/sam-tully-7978056)

मार्क टुली को सबसे अलग बनाता था भारत के साथ उनका रिश्ता. उन्होंने फर्राटेदार हिंदी सीखी. ट्रेनों में सफर किया. गांवों में वक्त बिताया. किसान, साधु, नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, हर किसी से खुलकर बात की. वे भारत को अपना घर कहते थे. दिल्ली में रहते हुए भी उनकी समझ गांव की मिट्टी से लेकर सत्ता के गलियारों तक जुड़ी हुई थी. टुली ने पहली किताब 'अमृतसर: मिसेज गांधीज लास्ट बैटल' 1985 में आई. ऑपरेशन ब्लू स्टार और पंजाब संकट पर बेस्ड इस किताब को उन्होंने पत्रकार सतीश जैकब के साथ मिलकर लिखा था.

1988 में उनकी चर्चित किताब ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ आई. इस किताब की भूमिका में उन्होंने लिखा था कि पश्चिमी सोच ने भारतीय जीवन को तोड़-मरोड़कर पेश किया है और भारत की समस्याओं के जवाब भारत के अंदर ही तलाशने होंगे. 2002 में आई ‘इंडिया इन स्लो मोशन’, जिसे उन्होंने गिलियन राइट के साथ लिखा, भारतीय समाज की गहराई में उतरती है. हिंदू उग्रवाद, बाल मजदूरी, सूफी रहस्यवाद, खेती का संकट, कश्मीर और भ्रष्टाचार, सब कुछ इसमें है. कुल मिलाकर उन्होंने 10 किताबें लिखीं और हर किताब के केंद्र में भारत रहा.

एक समय वो भी आया, जब BBC को मार्क टुली का बागी रुख देखना पड़ा. 1994 में उन्होंने BBC के अंदरूनी हालात पर खुलकर बोला. इंडिया टुडे के इनपुट के मुताबिक, बर्मिंघम में रेडियो एकेडमी में एक लेक्चर में टुली ने कहा था कि जॉन बर्ट के तहत BBC में "स्टाफ के बीच सच में डर का माहौल है."

उस वक्त टुली की टिप्पणी पर BBC हेड जॉन बर्ट ने तंज कसते हुए कहा था कि "कुछ पुराने सैनिक अपनी बंदूकें लेकर हम पर निशाना साध रहे हैं." इसके बाद मार्क टुली ने BBC से इस्तीफा दे दिया. हालांकि वो BBC रेडियो 4 पर आध्यात्मिक कार्यक्रम 'समथिंग अंडरस्टूड' 2019 तक करते रहे.

मार्क टुली को 1992 में पद्मश्री, 2002 में न्यू ईयर ऑनर्स में नाइटहुड और 2005 में पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया. उन्होंने भारत और ब्रिटिश राज से लेकर भारतीय रेलवे तक जैसे विषयों पर कई डॉक्यूमेंट्री पर भी काम किया.

वीडियो: अमेरिका से आए समन को अडानी तक क्यों नहीं पहुंचा रही भारत सरकार?

Advertisement