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चिप्स, बिस्कुट और इंस्टेंट नूडल्स पर लाल निशान, पैकेट देखकर खाना खरीदने का तरीका बदल जाएगा?

FSSAI Red Warning Labels: पैकेज्ड फूड पर प्रस्तावित लाल चेतावनी लेबल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बहस जारी है. आखिर FSSAI का प्रस्ताव क्या है? हाई शुगर, हाई साल्ट और हाई फैट की सीमा क्या होगी? लाल निशान से ग्राहक और कंपनियों पर क्या असर पड़ सकता है और स्कूलों के खाने तक इसका प्रभाव क्यों पहुंच सकता है?

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खाना खरीदने का तरीका बदलने वाला है! (Courtesy: AI)

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  • भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने सुप्रीम कोर्ट में प्रस्ताव रखा है कि पैकेज्ड फूड के सामने लाल रंग के षट्भुज में हाई फैट, हाई शुगर और हाई सॉल्ट की चेतावनी दी जाए।
  • भारत में वर्तमान में पैकेज्ड फूड की पोषण जानकारी पैकेट के पीछे पोषण तालिका में दी जाती है, जिसे खरीदारी के समय समझना उपभोक्ताओं के लिए कठिन होता है।
  • यदि यह प्रस्ताव अंतिम नियम बनता है, तो उत्पादकों को लाल चेतावनी से बचने के लिए फॉर्मूला बदलने या पैकेजिंग में बदलाव करने की संभावना होगी, जिसका असर उपभोक्ता खरीदारी व्यवहार पर पड़ सकता है।

अगर आप किराने की दुकान पर चिप्स, बिस्कुट, इंस्टेंट नूडल्स या कोई पैकेज्ड ड्रिंक खरीदते हैं, तो आने वाले समय में पैकेट के सामने एक ऐसा निशान नजर आ सकता है, जो खरीदारी का फैसला कुछ सेकंड में बदल दे. लाल रंग का एक षट्भुज यानी हेक्सागन, जिसके अंदर लिखा होगा कि उस खाद्य पदार्थ में चीनी, नमक या वसा (फैट) की मात्रा ज्यादा है.

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फिलहाल ये व्यवस्था लागू नहीं हुई है. मामला सुप्रीम कोर्ट में है और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई (FSSAI) ने कोर्ट के सामने इसके लिए नया प्रस्ताव रखा है. सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई हो रही है. इसी बीच खाद्य कंपनियों ने प्रस्तावित लाल रंग पर आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि भारत में लाल रंग को गैर शाकाहारी खाद्य पदार्थों की पहचान से जोड़ा जाता है और इससे उपभोक्ता कंफ्यूज हो सकते हैं.

अभी पैकेट पर क्या दिखता है?

अभी भारत में पैकेज्ड फूड के लेबल पर पोषण (न्यूट्रिशन) से जुड़ी जानकारी मुख्य रूप से पोषण तालिका के जरिए दी जाती है. इसमें एनर्जी, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कुल शुगर, एक्ट्रा एडेड शुगर, कुल फैट, सैचुरेटेड फैट, ट्रांस फैट और सोडियम जैसी जानकारियां दी जाती हैं. FSSAI की वेबसाइट पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स लेबलिंग एंड डिस्प्ले रेगुलेशन, 2020 और उसके संशोधन उपलब्ध हैं.

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समस्या ये है कि ये जानकारी पैकेट के पीछे या साइड में मौजूद पोषण तालिका में होती है. आम ग्राहक के लिए खरीदारी के समय अलग-अलग संख्याओं को देखकर ये समझना आसान नहीं होता कि कोई उत्पाद वास्तव में नमक, चीनी या वसा के मामले में कितना ज्यादा है.

यहीं से फ्रंट ऑफ पैक यानी पैकेट के सामने चेतावनी देने का विचार आता है.

लाल Hexagon में क्या लिखा होगा?

‘इकोनॉमिक टाइम्स’ के मुताबिक FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रस्ताव रखा है कि पैकेज्ड फूड के सामने की तरफ लाल रंग के षट्भुज (Hexagon) में चेतावनी दी जाए. इसमें हाई फैट, हाई शुगर और हाई सॉल्ट जैसी घोषणाएं हो सकती हैं. प्रस्तावित निशान पैकेट के ऊपरी बाएं हिस्से में रखा जाना है और इसके अक्षरों का आकार पीछे दी गई पोषण तालिका के अक्षरों से कम से कम एक प्वाइंट बड़ा रखने का प्रस्ताव है.

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शुरुआती प्रस्ताव में चेतावनी उन उत्पादों के लिए थी जिनमें दो या उससे ज्यादा संबंधित पोषक तत्व निर्धारित सीमा से ऊपर हों. लेकिन सितंबर में सुप्रीम कोर्ट के सवालों के बाद एफएसएसएआई ने एक चरण में ही ऐसे उत्पादों को शामिल करने की बात कही है, जो इनमें से किसी एक पोषक तत्व की निर्धारित सीमा से ऊपर हों.

यानी अगर अंतिम नियम इसी प्रस्ताव के मुताबिक बना, तो सिर्फ चीनी ज्यादा होने पर भी किसी उत्पाद पर चेतावनी लग सकती है. सिर्फ नमक या सिर्फ फैट की मात्रा ज्यादा होने पर भी ऐसा हो सकता है.

आखिर ज्यादा की सीमा कितनी है?

यहीं इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. प्रस्तावित सीमा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और राष्ट्रीय पोषण संस्थान यानी आईसीएमआर-एनआईएन (ICMR-NIN) की 2024 की भारतीयों के लिए आहार संबंधी गाइडलाइन से जोड़ी गई है. एफएसएसएआई के प्रस्ताव में ठोस खाद्य पदार्थों के लिए 100 ग्राम और तरल खाद्य पदार्थों के लिए 100 मिलीलीटर के आधार पर सीमा रखी गई है.

प्रपोज्ड स्कूल फूड नियमों में भी यही आधार दिखाई देता है. इनके मुताबिक 100 ग्राम ठोस खाद्य पदार्थ में 4.2 ग्राम से ज्यादा एक्ट्रा फैट, 3 ग्राम से ज्यादा एक्ट्रा शुगर या 0.625 ग्राम यानी 625 मिलीग्राम से ज्यादा नमक को संबंधित कैटेगरी में ज्यादा माना गया है. तरल खाद्य पदार्थों के लिए ये सीमाएं-  1.5 ग्राम एक्ट्रा फैट, 2 ग्राम एक्ट्रा शुगर और 0.175 ग्राम यानी 175 मिलीग्राम नमक प्रति 100 मिलीलीटर हैं.

ध्यान देने वाली बात ये है कि ये प्रस्तावित मानक हैं. इन्हें अंतिम लागू नियम मान लेना अभी सही नहीं होगा.

क्या इससे चिप्स और बिस्कुट की रेसिपी बदल जाएगी?

जरूरी नहीं कि हर कंपनी तुरंत रेसिपी बदल दे. पहला रास्ता पैकेजिंग बदलना होगा. लेकिन अगर लाल चेतावनी ग्राहक के खरीदारी व्यवहार को प्रभावित करती है, तो कंपनियों के सामने दूसरा रास्ता भी होगा, यानी उत्पाद की संरचना बदलना.

चिली इसका एक दिलचस्प उदाहरण है. वहां फ्रंट ऑफ पैक पर ALTO EN यानी ज्यादा मात्रा की चेतावनी वाले निशान लगाए गए. चिली के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक इन चेतावनी निशानों का इस्तेमाल सोडियम, संतृप्त वसा और शर्करा जैसे पोषक तत्वों की निर्धारित सीमा पार करने पर किया जाता है.

चिली पर हुई एक समीक्षा में कुछ उत्पादों की संरचना में बदलाव भी दर्ज किया गया. अध्ययन में बताए गए आंकड़ों के मुताबिक, चेतावनी व्यवस्था के बाद जिन पैकेज्ड उत्पादों को ज्यादा चीनी वाला माना गया, उनका अनुपात 80 प्रतिशत से घटकर 60 प्रतिशत और ज्यादा सोडियम वाले उत्पादों का अनुपात 74 प्रतिशत से घटकर 27 प्रतिशत हुआ. हालांकि शोधकर्ताओं ने ये भी स्पष्ट किया कि उपलब्ध शुरुआती आंकड़ों से मोटापे जैसे व्यापक स्वास्थ्य परिणामों पर सीधा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.

क्या ग्राहक सच में कम खरीदेंगे?

सिर्फ पैकेट पर लाल निशान लगा देने से हर व्यक्ति की आदत बदल जाएगी, ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी. लेकिन इंटरनेशनल रिसर्च में ये जरूर दिखा है कि सामने दिए गए चेतावनी निशान खरीदारी के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं.

चीली के शुरुआती अनुभवों की समीक्षा में उपभोक्ताओं के बीच चेतावनी लेबल की समझ और स्वीकार्यता दर्ज हुई, हालांकि हर श्रेणी के भोजन में खरीदारी बदलने का असर एक जैसा नहीं था. खास तौर पर मीठे पेय पदार्थों में खरीदारी की मंशा में बदलाव का प्रमाण मिला.

मीठे पेय पदार्थों पर चेतावनी लेबल को लेकर 23 अध्ययनों की एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा विश्लेषण में भी पाया गया कि चेतावनी लेबल वाले प्रयोगों में बिना लेबल वाले विकल्पों की तुलना में मीठे पेय चुनने की संभावना कम थी.

यानी लाल निशान कोई जादुई बटन नहीं है, लेकिन खरीदारी के समय मिलने वाली जानकारी को ज्यादा सीधा और दिखाई देने वाला जरूर बना सकता है.

बच्चों के खाने पर क्यों पड़ेगा असर?

इस कहानी का सबसे बड़ा हिस्सा सिर्फ सुपरमार्केट की शेल्फ नहीं, स्कूल की कैंटीन भी है.

एफएसएसएआई ने अगस्त 2026 में स्कूलों में बच्चों के सुरक्षित और संतुलित भोजन से जुड़े नियमों में संशोधन का मसौदा जारी किया. इसमें पहली बार हाई एडेड फैट, हाई एडेड शुगर और हाई सोडियम वाले खाद्य पदार्थों की परिभाषाओं को स्पष्ट करने का प्रस्ताव है. इस मसौदे पर टिप्पणियां देने की अंतिम तारीख 9 अक्टूबर 2026 है.

इसका मतलब ये है कि पैकेज्ड फूड की लेबलिंग और बच्चों के स्कूल फूड को लेकर सरकार की नीति एक ही दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है. स्कूलों में क्या बिकेगा, बच्चों को किस तरह के खाद्य पदार्थ उपलब्ध होंगे और कंपनियां बच्चों को किस तरह के उत्पाद बेच पाएंगी, इन सवालों पर भी इसका असर पड़ सकता है.

फिर लाल रंग को लेकर इतना विवाद क्यों?

यही वो सवाल है जिसने इस मामले को सिर्फ पोषण नीति से निकालकर कोर्ट की बहस बना दिया है.

भारत में पैकेज्ड गैर शाकाहारी खाद्य पदार्थों की पहचान के लिए मौजूदा व्यवस्था में भूरे रंग का भरा हुआ त्रिकोण और चौकोर बॉर्डर इस्तेमाल होता है, जबकि शाकाहारी खाद्य पदार्थ के लिए हरे रंग का चिह्न होता है. प्रस्तावित पोषण चेतावनी में लाल षट्भुज इस्तेमाल होना है.

खाद्य उद्योग की दलील है कि लाल रंग उपभोक्ता को गैर शाकाहारी पहचान से जुड़ा हुआ लग सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी 10 सितंबर की सुनवाई में लाल रंग को लेकर सवाल उठाया था. अब कोर्ट को डिजाइन, रंग, पोषक तत्वों की सीमा और लागू करने की समयसीमा समेत कई पहलुओं पर विचार करना है.

क्या भारत चिली और मैक्सिको की राह पर है?

दिशा जरूर मिलती-जुलती है, लेकिन दोनों देशों के नियमों को भारत का प्रस्ताव समझना सही नहीं होगा.

चिली में सामने की तरफ ALTO EN चेतावनी निशान इस्तेमाल होते हैं. मेक्सिको में भी पैकेज्ड खाद्य पदार्थों और गैर अल्कोहलिक पेय के लिए सामने की तरफ चेतावनी वाले अष्टकोण यानी ऑक्टागन इस्तेमाल किए जाते हैं. वहां कैलोरी, शर्करा, संतृप्त वसा, ट्रांस वसा और सोडियम जैसे पोषक तत्वों की अधिक मात्रा के बारे में चेतावनी दी जाती है.

भारत का प्रस्ताव अपने पोषण मानक, चिह्न और लागू करने की प्रक्रिया के साथ अलग मॉडल है. इसलिए अभी ये कहना जल्दबाजी होगी कि भारत बिल्कुल चिली या मेक्सिको वाला सिस्टम अपना रहा है.

ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को लगाई फटकार, पूछा- ‘फूड पैकेट पर लेबल लगाने में देरी क्यों हो रही?’

असली बदलाव पैकेट पर नहीं, खरीदारी की आदत में होगा

अगर एफएसएसएआई का प्रस्ताव अंतिम नियम बनता है, तो इसका असर सिर्फ पैकेट के डिजाइन तक सीमित नहीं रहेगा. कंपनियों को तय करना होगा कि लाल चेतावनी स्वीकार करके उत्पाद बेचना है या नमक, चीनी और वसा की मात्रा घटाकर उस चेतावनी से बचने की कोशिश करनी है.

उधर ग्राहक के सामने भी एक नया सवाल होगा. अभी हम अक्सर पैकेट के सामने ब्रांड, स्वाद, कीमत और विज्ञापन देखते हैं. आगे उसी जगह एक लाल निशान ये भी बता सकता है कि उत्पाद में कौन सा पोषक तत्व तय सीमा से ज्यादा है.

लेकिन फिलहाल सबसे जरूरी बात यही है कि ये प्रस्ताव है, अंतिम लागू नियम नहीं. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके बाद एफएसएसएआई की नियामकीय प्रक्रिया तय करेगी कि लाल निशान का अंतिम रूप क्या होगा, किस सीमा पर लगेगा और बाजार में कब दिखाई देगा. एफएसएसएआई ने अदालत को बताया है कि अंतिम नियम बनाने की प्रक्रिया में मसौदा प्रकाशित करना, हितधारकों से टिप्पणियां लेना और फिर अंतिम अधिसूचना जारी करना शामिल होगा. कंपनियों को अंतिम अधिसूचना के बाद एक साल तक का अनुपालन समय देने का प्रस्ताव भी रखा गया है.

यानी अभी चिप्स का पैकेट उठाते समय लाल निशान ढूंढने की जरूरत नहीं है. लेकिन अगर प्रस्ताव नियम बन गया, तो आने वाले समय में पैकेट के सामने की तरफ लगी एक छोटी सी लाल आकृति आपकी खरीदारी के फैसले में पहले से कहीं बड़ी भूमिका निभा सकती है.

वीडियो: पैकेज्ड फूड पर Health Warning Label में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

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