चुनाव आयोग के रजिस्ट्रेशन फॉर्म 'Form 6' पर तगड़ा बवाल खड़ा हो गया है. ECI ने इसमें पिछले SIR की डिटेल पूछने वाला कॉलम जोड़ा था. इस बदलाव पर दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की आपत्ति और मतभेद सामने आने से चुनाव आयोग की मुसीबतें बढ़ गई हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों के ऐतराज जताने के बावजूद Form 6 में पिछले SIR की डिटेल पूछने वाला कॉलम जोड़ दिया गया था.
नए वोटर्स वाले फॉर्म 6 का 'झमेला' समझ लीजिए, जिस पर चुनाव आयोग घिर गया है
ECI form 6 controversy: SIR प्रक्रिया पर दो चुनाव आयुक्तों के सहमति न जताने के बाद फॉर्म 6 पर बहस शुरू हो गई है. उन्होंने नया वोटर जोड़ने के फॉर्म 6 में बदलाव को 'अनाधिकृत और गैरकानूनी' बताया.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताया गया कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने नया वोटर जोड़ने के फॉर्म-6 में बदलाव को 'अनाधिकृत और गैरकानूनी' बताया. 16 मई को विवेक जोशी ने मांग की थी कि सरकार की मंजूरी के बिना नए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए. 19 मई को सुखबीर सिंह संधू ने भी विवेक जोशी की बात पर सहमति जताई थी. लेकिन फॉर्म-6 से जुड़ा विवाद क्या है, क्यों फॉर्म 6 को लेकर आपत्तियां जताई गईं, ये समझ लेते हैं.
क्या है फॉर्म-6 से जुड़ा विवाद?इंडिया टुडे से जुड़े संजय शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध फॉर्म 6 में SIR से जुड़ा एक नया डिक्लेरेशन पार्ट शामिल किया गया है. इस नए बदलाव के तहत, खासकर पहली बार वोट डालने वाले आवेदकों से तीन सवाल सवाल पूछे गए हैं. इनमें से एक ऑप्शन चुनना है.
पहला सवाल- क्या 2000 के दशक की शुरुआत में हुए SIR के दौरान मतदाता सूची में उनका खुद का नाम था?
दूसरा सवाल- क्या उस पुरानी लिस्ट में उनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम शामिल था?
तीसरी सवाल- क्या उस लिस्ट में न तो उनका नाम था और न ही उनके परिजनों का?
हालांकि, इस सवाल को 'गैर-अनिवार्य' (Non-Mandatory) दिखाया गया. लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इसका उत्तर दिए बिना फॉर्म सबमिट ही नहीं होता है.
चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने क्या कहा था?एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म 6 में पिछले SIR से जुड़ा डिक्लेरेशन जोड़ने के प्रस्ताव पर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं. उन्होंने कथित तौर पर CEC ज्ञानेश कुमार को लिखा कि अभी वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का काम रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट, 1950 के सेक्शन 21(3) के तहत हो रहा है. ये वह प्रावधान है, जो आयोग को वोटर लिस्ट (रोल) के विशेष संशोधन का आदेश देने की इजाजत देता है.
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उन्होंने लिखा कि SIR के लिए तय किए गए फॉर्म केवल उसी खास प्रक्रिया (SIR) के लिए ही थे. वे कानूनी फॉर्म नहीं थे. न ही किसी कानून का हिस्सा थे. फॉर्म 6 (नए मतदाता का रजिस्ट्रेशन) और फॉर्म 8 (रजिस्ट्रर्ड मतदाता की डिटेल में बदलाव या सुधार) "कानून के तहत तय" किए गए फॉर्म हैं. और ‘मतदाता पंजीकरण नियम, 1960’ में संशोधन किए बिना इन्हें बदला नहीं जा सकता. जोशी ने खास तौर पर इस बात को खारिज कर दिया कि SIR के आदेश या गाइडलाइन में लिखा कोई वाक्य कानून से तय फॉर्म को बदल सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों इलेक्शन कमिश्नर्स ने ज्ञानेश कुमार से कहा था कि 'रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' में संशोधन के बिना ऐसा नहीं किया जा सकता. चुनाव आोयग से सलाह मशवरा करने के बाद केंद्र सरकार ही इन नियमों को नोटिफाई कर सकती है.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी इन आपत्तियों का समर्थन किया है. कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियां भी सरकार, चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की आलोचना कर रही हैं.
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