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फिल्म रिव्यू- दी राजा साब

प्रभास की नई हॉरर-कॉमेडी फिल्म 'दी राजा साब' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.

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'दी राजा साब' का दूसरा पार्ट भी आने वाला है.

फिल्म: दी राजा साब
राइटर-डायरेक्टर: मारुति
एक्टर्स- प्रभास, ज़रिना वहाब, संजय दत्त, मालविका मोहनन, निधि अग्रवाल, ऋद्धि कुमार, बोमन ईरानी
रेटिंग- 1.5 स्टार 

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प्रभास की नई फिल्म 'दी राजा साब' एक हॉरर-कॉमेडी-फैंटसी फिल्म है. ये फिल्म कुछ भी हो सकती थी. सिवाय उसके जो ये है. एक ऐसी गड्डमड्ड फिल्म, जो आपके धैर्य की परीक्षा लेती है. 'बाहुबली' के बाद से प्रभास लगातार भारी-भरकम फिल्में कर रहे थे. मगर 'दी राजा साब' उस वजन को कम करती है. हल्की-फुल्की फिल्म. पेपर पर ये आइडिया बेशक टेम्पटिंग लगा होगा. मगर मारुति की अति-महत्वाकांक्षा इसके आड़े आ जाती है. इसमें प्रभास ने वो करने की कोशिश की है, जो वो 'बाहुबली' से पहले किया करते थे. मज़े. मगर दिक्कत ये है कि यहां सिर्फ प्रभास की मज़े कर पा रहे हैं. जनता नहीं. हालांकि इस चीज़ का ध्यान उन्हें ये फिल्म साइन करने से पहले भी रखना चाहिए था. जैसा कि अल्ताफ भाई राजा कह गए हैं कि वो दौर दूसरा था ये दौर दूसरा है.

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'दी राजा साब' की कहानी राजू नाम के लड़के और उसकी दादी की है. दादी को अल्जाइमर्स है. वो दैनंदिन की चीजें भी भूलने लगी हैं. मगर उनको एक चीज़ कभी नहीं भूलती. वो हैं उनके पति. उनके पति का नाम है कनगराजू. जो कि गायब हो गए हैं. दादी ने अपने पोते को उन्हें ढूंढकर लाने भेजा है. फिल्म की यही मोटा माटी कहानी है. लेकिन इस कहानी में कई मोड़ हैं. जहां से होती हुई ये फिल्म कहीं नहीं पहुंचती.

‘दी राजा साब’ क्या कहना चाहती है, ये बात आपको आखिर तक समझ नहीं आती. उसकी मंशा सिर्फ आपका मनोरंजन करने की है. मगर उसमें भी वो बढ़िया नंबर्स के साथ फेल हो जाती. इस फिल्म में इतने सारे Sub-plots हैं कि सब प्लॉट्स को एक्सप्लोर कर पाना संभव नहीं था. अगर उसमें से एकाध पर भी ध्यान दिया जाता, तो शायद मामला बहुत बेहतर हो सकता था. मसलन, दादी के शुरुआती जीवन को और खंगाला जा सकता था. उसमें बहुत गुंजाइश थी. या दादा कनगराजू की बैकस्टोरी में भी झांका जा सकता था. उसकी कुंठां की वजहें तलाशी जा सकती थीं. मगर ये फिल्म कोई भी सीरियस चीज़ नहीं करना चाहती. ये बात समझ आती है. मगर ये ऑल आउट कॉमेडी फिल्म भी नहीं बनना चाहती. इसमें हॉरर का पुट डाला जाता है. ठीक है. आज कल चल रहा है मार्केट में. इसके लिए भी हम राजी हैं. मगर मारुति इसमें फंतासी का एलीमेंट भी घोल देते हैं. जो इसे अझेल बना देती है.

सुपरस्टार्स की फिल्मों में लॉजिक तलाशना गुनाह है. मगर बुनियादी चीजें तो दुरुस्त होनी ही चाहिए. 'दी राजा साब' में किसी सेंसिबल बात या तार्किकता को जगह नहीं मिलती. यहां तक की कंटिन्यूटी का भी ध्यान नहीं रखा जाता. जिसे खालिस लापरवाही में गिना जाना चाहिए. इस फिल्म का एक बड़ा हिस्सा जंगल के बीच में बने भूतिया हवेली में घटता है. वहां अजीबोगरीब घटनाएं हो रही हैं. जिसमें जान जाने का भरपूर खतरा है. मगर इस पूरी सिचुएशन में कोई भी, कभी भी डरा हुआ नहीं लगता. मानों सबको पता है कि ये कॉमेडी फिल्म है. फिल्म के सभी किरदार उस हवेली में जमा हो जाते हैं. हर सीन में उनके कपड़े और मेक-अप टिप टॉप रहते हैं. मानों उस भूतिया हवेली में कोई हेयर, मेक- अप और कॉस्ट्यूम टीम बैठी है. बैठी है ये सबको पता है. मगर थोड़े बहुत एफर्ट्स तो करने चाहिए ताकि पब्लिक को पता न चले. सिनेमा का तिलिस्म तो बना रहना चाहिए.

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फिल्म में तीन हीरोइनें हैं. मालविका मोहनन, निधि अग्रवाल और ऋद्धि कुमार. इन तीनों लड़कियों के पास लड़के से प्यार करने के अलावा कोई काम ही नहीं है. जिन सीन में उन्हें रोमांस नहीं करना है, वहां वो बस चुपचाप खड़ी रहती हैं. उस वक्त उनमें और फिल्म देखने वाले दर्शकों में कोई फर्क नहीं रह जाता. अगर इन तीनों हीरोइनों के सीन्स फिल्म से निकाल दें, तो फिल्म का बहुत सारा वक्त बच जाएगा. जो फिल्म की लंबाई कम करने में काम आएगा. मगर फिर गाने नहीं बन पाते. जिससे फिल्म का प्रमोशन मुश्किल हो जाता. संजय दत्त ने तय कर लिया है कि वो देश में बनने वाली सभी बुरी फिल्मों का हिस्सा बनेंगे. यहां भी उन्होंने नेगेटिव किरदार निभाया है. जिसकी मार्किंग भी नेगेटिव में ही होगी.

जब आप इन सबसे फारिग होते हैं, तब आपका सामना फिल्म के अंतहीन क्लाइमैक्स से होता है. प्रभास को हर फिल्म में डेमी गॉड की तरह ट्रीट करने की आदत ही उनके डाउनफॉल का कारण बनी है. प्रभास को उनके फैंस ही नहीं, उनके डायरेक्टर्स भी भगवान की तरह देखते हैं. क्योंकि वही उन्हें पैसे कमाकर देते हैं. मगर इस फिल्म में जो हुआ, वो तो अंडे के लिए मुर्गी को काटने वाली बात हो गई न!

एक और मसला है, जो आपका फिल्म देखने का अनुभव किरकिरा करता है. वो है फिल्म का प्रोडक्शन डिज़ाइन. फिल्म जहां कही भी घटती है वो सभी लोकेशन्स बेहद बनावटी लगते हैं. क्योंकि उन्हें सेट पर शूट किया गया है. बाकी जो बचे खुचे सीन्स हैं उनमें VFX का काम इतना फीका है कि आपका जी उचटने लगता है. अगर आपके पास स्क्रिप्ट कायदे की नहीं है, तो कम से कम टेक्निकल विभाग में तो उसे कंपनसेट करने की कोशिश कीजिए. पब्लिक को स्टार के नाम पर कब तक बेवकूफ बनाते रहेंगे.

अगर प्रभास लगातार इतने दोयम दर्जे का काम करते रहेंगे, तो उनकी फिल्में कौन देखेगा! सलमान खान और प्रभास में कंपटीशन चल रहा है कि कौन अपने सुपर स्टारडम को पहले मटियामेट करेगा. और 'दी राजा साब' देखने के बाद मैं कह सकता हूं कि फिलहाल मामला टाई पर छूटा है.

एक चीज़ इस फिल्म में देखने लायक है, वो है प्रभास को बिना लोड लिए फन करते देखना. क्योंकि इस फिल्म में वो दुनिया की बजाय अपनी दादी को बचा रहे हैं. जिसे वो फुल ऑन एंजॉय कर रहे हैं.

‘दी राजा साब’ के आखिर ने बताया जाता है कि इसका दूसरा पार्ट भी आएगा. जिसका नाम होगा 'सर्कस- 1935'. इसे देखने के बाद समझ नहीं आया कि ये अनाउंसमेंट थी या धमकी! जो भी है. सावधान रहें, सतर्क रहें! 

वीडियो: ‘दी राजा साब’ पर फूटा दर्शकों का गुस्सा, प्रभास की फिल्म को रेडिट पर बताया कचरा

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