AI का जवाब है 'HI'? Vibe Coding पर उछलने से पहले रियलटी चेक
क्या है AI की नई चरस Vibe Coding. एकदम Gen Z टाइप मामला है. यो ब्रो टाइप. वेबसाइट बनाने के लिए आपको सिर्फ कमांड देनी है किसी भी AI चैट बॉट को. पायथन तो छोड़िए आपको बेसिक कोडिंग की जरूरत भी नहीं. आप जितना ज्यादा डिटेल बताएंगे उतनी अच्छी वेबसाइट बन जाएगी.

AI के मार्केट में Vibe Coding ने आजकल बड़ी पॉजिटिव वाइब बना रखी है. टेक की दुनिया में इसे नो-कोड (No-Code) और लो-कोड (Low-Code) के नाम से भी जाना जाता है. सुंदर पिचाई जैसे टेक दिग्गज तो इसकी चर्चा कर ही रहे हैं, आम आदमी भी इससे अपनी वाइब मैच कर रहा. इसकी मदद से कोई भी अपनी वेबसाइट बना सकता है. पायथन जैसी बड़ी चीजें तो छोड़िए, अगर आपको कोडिंग का ककहरा भी नहीं पता तो भी आप इसकी मदद से महज घंटे भर में अपनी वेबसाइट बना सकते हैं. सॉफ्टवेयर इंजीनियर और आईटी प्रोफेशनल की जरूरत ही खत्म. हमें लगा इसके बारे में आपको बता देना चाहिए ताकि आपका हाल भी Amazon जैसा बेहाल नहीं हो.
क्या है Vibe Coding?Amazon के साथ क्या हुआ वो बताएंगे, मगर पहले जरा वाइब कोडिंग समझ लेते हैं. Open AI के को-फाउंडर Andrej Karpathy ने सबसे पहले इसका जिक्र किया था. एकदम Gen Z टाइप मामला है. यो ब्रो टाइप. आपको सिर्फ नॉर्मल लैंग्वेज में कमांड देनी है किसी भी AI चैट बॉट को. उदाहरण के लिए, arena.ai पर कमांड दीजिए कि मेरे लिए एक टेक वेबसाइट बना दो जिसका फोकस मोबाइल के प्रोसेसर और बैटरी पर हो. वेबसाइट में लिथियम-आयन बैटरी की जगह नई तकनीक वाली सिलिकॉन कार्बन बैटरी पर होना चाहिए.
वेबसाइट में आईफोन और एंड्रॉयड के बीच तुलना करने का फीचर हो, लेकिन इसमें कुछ भी नेगेटिव नहीं बताना है. वेबसाइट SEO फ़्रेंडली हो और एक बार में 10000 हिट को हैन्डल कर सके. कहने का मतलब आपको बस एक प्रॉम्प्ट देना है. इसके बाद चैट बॉट आपसे कई सारे सवाल पूछेगा जो अच्छी बात है. मसलन वेबसाइट किस लिए है. कौन से इलाके को टारगेट करना है. वगैरा-वगैरा. आप जितना ज्यादा डिटेल बताएंगे उतनी अच्छी वेबसाइट बन जाएगी. यकीन मानिए कुछ मिनटों में एक काम करने वाली वेबसाइट बन जाएगी.
आप चाहें तो वेबसाइट को एजेंट मोड में भी बदल सकते हैं. माने आपको अपने से कुछ नहीं करना पड़ेगा. AI का एजेन्टिक मोड अपने से सब करता रहेगा. कॉन्टेन्ट भी पोस्ट करेगा और बैक एंड पर देखभाल भी. वाइब कोडिंग का भौकाल इतना कि दुनिया की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी Amazon ने तो हजारों इंजीनियर्स को कथित तौर पर बाहर निकाल दिया. करना ही क्या था. कमांड ही तो देनी है. कोई भी दे देगा.
उसके Kiro AI coding assistant ने ऐसी कमांड दी की कंपनी को आपातकालीन बैठक बुलानी पड़ी. Financial Times के मुताबिक AI कोडिंग की वजह से कंपनी को 2025 के आखिरी महीनों में कई बार दिक्कत हुई जब उसकी कई सर्विस Kiro AI coding assistant की वजह से बंद रही थीं. Amazon की वेबसाइट पिछले कुछ दिनों में कई बार डाउन हुई है. उसका ऐप भी कई बार क्रैश हुआ है. एक हफ्ते के अंदर चार बार. सॉफ्टवेयर में झोल की वजह से यूजर्स ऐप पर चेक आउट ही नहीं कर पा रहे थे. वाइब कोडिंग और Kiro की वाइब मैच नहीं हुई.
चाय बनी मगर उबली नहींक्या हुआ वो समझने के लिए चाय बनाते हैं. पहले नॉर्मल फिर AI वाली. नॉर्मल वाली में आप पतीली पर पानी गर्म करोगे. चाय-पत्ती-अदरक-शक्कर-दूध डालकर अच्छे से पकाओगे. AI से चाय बनाने के लिए आपको उसको कमांड दोगे. एक कप चाय अदरक वाली बना देना. AI ने चाय बना दी, मगर उबालना भूल गया क्योंकि उसको कमांड नहीं दी थी. अब चलो उसको पता है कि उबालना होता है तो उबाल तो दी, मगर कितनी देर. कम या ज्यादा तो चाय बेस्वाद.
चलो ये भी उसको पता है, लेकिन दूध डालते ही चाय फट गई तब भी वो तो उबालते रहेगा. क्योंकि उसको थोड़े ना पता है कि भईया चाय फट गई. लेकिन जो आप चाय बनाओगे तो आपको पता चल जाएगा.
कहने का मतलब वेबसाइट बना लेना आसान है, मगर उसको संभालना बिना मानव के संभव ही नहीं. कोडिंग करवा के वेबसाइट बना लोगे लेकिन जब उसमें दिक्कत आएगी तो कौन संभालेगा. AI जो भी काम करेगा वो अपने Large Language Models (LLMs) के दम पर करेगा. अगर वहां सोल्यूशंस नहीं तो डिब्बा गोल. लेकिन सॉफ्टवेयर इंजीनियर के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि उसके पास कंट्रोल और कॉमन सेंस है. सबसे बड़ी बात, उसके पास ह्यूमन इंटेलिजेंस है.
इसका एक और उदाहरण देता हूं. 10 फ़रवरी, 1996 को चेस में 12 बार वर्ल्ड चैंपियन गैरी कैस्पारॉव और IBM के कंप्यूटर ‘डीप ब्लू’ के बीच महा मुकाबला हुआ. इस मुकाबले पर दुनिया की नजर थी क्योंकि आईबीएम का दावा था कि उनका कंप्यूटर 1 सेकंड में अरबों चालें सोच सकता है. गैरी कितना सोच लेंगे. हार जाएंगे.
मगर गैरी ने मुकाबला 4-2 से जीता. पता है क्यों? क्योंकि ब्लू भईया डीप में जाकर अरब चालें सोच सकते थे. वही उनकी लिमिट थी. मगर गैरी के सोचने की कोई लिमिट नहीं और उन्होंने वो चाल सोची जो ब्लू भईया नहीं सोच पाए. कुल जमा बात ये कि इंसानी दिमाग का कोई विकल्प फिलहाल नहीं है.
और भी कई उदाहरण हैं. जैसे अभी एक Humanoid Robot रास्ते में एक आदमी से भिड़ गया था क्योंकि वो उसके बीच में आ गया. अब कॉमन सेंस होता तो सॉरी बोलकर निकल लेता. एक और रोबो रेस्टोरेंट में पगलाकर नाचने लगा था. वैसे ये सब एक तरफ रख दें तो Amazon को सब समझ आ गया. उसने Kiro AI के ऊपर एक नहीं दो मैनेजर बिठाए हैं.
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दोनों मैनेजर एकदम मैकेनिकल तरीके से चेक करेंगे कि Kiro AI ने जो कमांड दिया है वो सही है या नहीं. कहने का मतलब मौज मस्ती के लिए वाइब कोडिंग ठीक आई, लेकिन जो आप अपने काम को लेकर गंभीर हैं तो वेबसाइट और ऐप बनाने वालों से अपना काम करवाइए. कहने का मतलब ये भी कि सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी कहीं नहीं जाने वाली. उल्टा जिनको कोडिंग के साथ AI का ज्ञान भी है, उनकी पूछ परख और बढ़ने वाली है.
एक बात और बता देते हैं. चाय का उदाहरण शार्क टैंक में आए एक प्रोडक्ट से आया है. कुछ साल पहले जब AI आया ही था तब एक बंदा एक कुकर जैसा प्रोडक्ट लाया था जिसे AI इनेबल बताया था. जजों ने चाय जैसे कई सवाल पूछे जिनका कोई जवाब नहीं मिला. माने AI बिना 'HI' (Human intelligence) के नहीं चलने वाली.
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