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समुद्र के भीतर घुसने वाला है ये देश, मंत्री जी का बयान तो और चकरा देगा

भविष्य में ये देश कैसा होगा विदेश मंत्री ने प्लान बता दिया

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The Pacific nation of Tuvalu is planning to create a version of itself in the metavers
सांकेतिक इमेज (इमेज क्रेडिट-पिक्सल, फ्रीपिक)
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सूर्यकांत मिश्रा
30 नवंबर 2022 (अपडेटेड: 30 नवंबर 2022, 05:50 PM IST)
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कल्पना कीजिए अगर आप ऐसे देश या शहर में रहते हों जहां समुद्र का स्तर अचानक भयानक तौर पर बढ़ जाए तो आप क्या करेंगे? ज़ाहिर है आप जल्दी से जल्दी वहां से किसी सुरक्षित जगह पर चले जाएंगे. या सरकार से गुजारिश करेंगे कि आपकी हिफाजत करे. 

लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि दुनिया में एक देश ऐसा है जिसे समंदर निगलने जा रहा है और वहां की सरकार पूरे देश को फेसबुक वाले मेटावर्स में बसाने जा रही है. ये कोई कोरी गप्प और कपोल कल्पना नहीं है. वाकई में ऐसा होने वाला है. आइए जानते हैं कि कौन सा है ये देश और कैसे होगा ये सब.

ये छोटू सा देश प्रशांत महासागर (Pacific ocean) में बसा हुआ है. नाम है तुवालू (Tuvalu). वहां के विदेश मंत्री Simon Kofe ने बाकायदा घोषणा की है कि उनका देश मेटावर्स के अंदर अपना डिजिटल वाला जुड़वां देश बसाने जा रहा है. साइमन ने COP27 (United Nations Climate Change Conference) के दौरान इसके बारे में बताया. कारण तो सभी को पता है कि आखिर ऐसा क्यों किया जा रहा है क्योंकि तुवालू के आसपास समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है. 

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तो तुवालू की सरकार करेगी क्या?

इसे जानने के लिए पहले आपको ये समझना पड़ेगा कि मेटावर्स नेशन होता क्या है. इसे जलवायु परिवर्तन और तेजी से बनते बिगड़ते मौसम से निपटने का एक तरीका समझिए. सब कुछ होगा आभासी दुनिया में. क्लाउड कम्प्यूटिंग, वर्चुअल रियल्टी (आँखों पर भारी चश्मे वाली) के मेलजोल से बना एक ऐसा देश होगा जो साइबर स्पेस में ही रहेगा. जैसे फैंसी भाषा में ग्रीन वाशिंग (Green Washing) या ग्रीन एनर्जी और ग्रीन बिल्डिंग जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है. उसी तरह साइबर स्पेस का ये देश भी होगा.

तुवालू की जनसंख्या सिर्फ 12000 है. ऐसे में इस देश को अपने नागरिकों को एक जगह से दूसरी जगह बसाना शायद आसान होगा. लेकिन वो जहां भी रहे, डिजिटल टेक्नॉलॉजी उन सबको एकसाथ जोड़कर रखेगी. उनका ऑफिस और लगभग पूरी दुनिया वर्चुअल होगी. तो बस चाहिए एक फर्राटेदार इंटरनेट कनेक्शन. आसान भाषा में कहें तो आप शारीरिक रूप से कहीं भी होकर वर्चुअल रूप से अपने ऑफिस में मौजूद रह सकते हैं. हालांकि इसके पहले भी ऐसी कोशिशें हुई हैं, जैसे एस्टोनिया (Estonia) नाम का देश e-residency ऑफर करता है. मतलब आप आभासी तौर पर उस देश के नागरिक बन सकते हैं. लेकिन ये कहानी अभी तक सिर्फ कंपनी के रजिस्ट्रेशन तक ही पहुंच पाई है.  

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इतना कुछ जानने के बाद मुझे गालिब याद आते हैं. गालिब फरमाते हैं,

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कुल मिलाकर ये खयाल ही तो है क्योंकि मेटावर्स के हकीकत में बदलने पर दुनिया के खयाल भी बंटे हुए हैं. कुछ टेक एक्सपर्ट्स का कहना है कि भले बात सिर्फ 12000 लोगों की है लेकिन इतने लोगों का भी वर्चुअल दुनिया में एक साथ कम्युनिकेट करना आसान नहीं होगा. लैपटॉप या स्मार्टफोन से इतर वास्तव में ऐसा करना बेहद कठिन है. इसके साथ इस प्रकार की वर्चुअल दुनिया के लिए ऊर्जा सोर्स मिलना भी बड़ी चुनौती होगी. हम अभी 5G के दौर में हैं और 6G अभी दूर की कौड़ी है. ऐसे में इसके लिए बैंडविड्थ कैसे मिलेगी. मशहूर पत्रिका नेचर (Nature) के मुताबिक सिर्फ अगले दो सालों यानी 2025 तक इंटरनेट दुनिया की इलेक्ट्रिसिटी का 20 प्रतिशत अकेले डकार जाएगा. कहां से लाएंगे? 

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