चांद पर 'बस्ती' बसाने की तैयारी के लिए इंसान भेजने का प्रोजेक्ट लटक सकता है?
1972 के बाद अब इंसान को चांद पर भेजने का नासा का प्लान भी जान लीजिए
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नासा का चांद और मंगल पर लंबे वक्त तक मौजूदगी बनाने का प्लान है.
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नासा दोबारा चांद पर इंसान भेजने की तैयारी कर रहा है. नासा का प्लान है कि 2024 तक चांद पर पहली महिला और अगला पुरुष भेजना है. नासा के इस प्रोग्राम का नाम है आर्टेमिस. लेकिन इस बार सिर्फ चांद पर पैर रखने नहीं जा रहे. नासा का इरादा इस बार पैर जमाने का है.
आर्टेमिस प्रोग्राम के लिए जिस रॉकेट का इस्तेमाल होगा, उसका नाम है स्पेस लॉन्च सिस्टम. शॉर्ट फॉर्म है SLS. लॉन्च के बाद ये कामयाब रहा तो अब तक का सबसे ताकतवर रॉकेट साबित होगा. लेकिन लॉन्च से पहले इसके कई टेस्ट होने बाकी हैं.
16 जनवरी 2021 को SLS के इंजन की टेस्ट फायरिंग हुई. इसमें चार RS-25 इंजन लगे हैं. रॉकेट के चारों इंजनों को वैसे ही फायर किया गया, जैसे वो लॉन्च के वक्त होंगे. कायदे से इंजन को आठ मिनट चलना चाहिए था. लेकिन एक मिनट पूरा होने से पहले ही इन्हें रोकना पड़ा. इससे आर्टेमिस प्रोग्राम के पहले मिशन की तारीख आगे बढ़ सकती है.

ये RS-25 इंजन स्पेस शटल में भी इस्तेमाल हुए थे.
साइंसकारी के इस ऐपिसोड में हम आर्टेमिस प्रोग्राम, SLS रॉकेट और मून मिशन्स की बात करेंगे. ये समझेंगे कि नासा क्यों और कैसे चांद पर दोबारा इंसान को भेजना चाहता है.
कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि नासा ने आर्टेमिस प्रोग्राम के लिए 18 ऐस्ट्रोनॉट्स को सिलेक्ट किया है. इनमें आधी महिलाएं हैं और आधे पुरुष. इन्ही में से एक नाम है राजा चारी. राजा चारी भारतीय मूल के ऐस्ट्रोनॉट हैं. इनका नाम सामने आने के बाद भारत में ये मिशन चर्चा में आ गया. अभी ये मिशन दोबारा खबरों में है. रॉकेट के टेस्ट और उसमें आने वाली रुकावटों के चलते. दुनिया का सबसे ताकतवर रॉकेट ऐसे बड़े स्पेस मिशन के दो मेन हिस्से होते हैं. पहला होता है रॉकेट. और दूसरा होता है स्पेसक्राफ्ट. स्पेसक्राफ्ट रॉकेट के ऊपर लगा होता है. रॉकेट का ये काम होता है कि वो स्पेसक्राफ्ट को अंतरिक्ष में ले जाए. सबसे ज़्यादा ऊर्जा पृथ्वी से बाहर निकलने में ही खर्च होती है. इसलिए रॉकेट मिशन का सबसे बड़ा हिस्सा होता है. स्पेसक्राफ्ट को पृथ्वी की कक्षा (ऑर्बिट) में छोड़ने के बाद रॉकेट नीचे आ जाता है. आगे का रास्ता स्पेसक्राफ्ट अकेले तय करता है.

ये SLS के लॉन्च की आर्टिस्टिक इमेज है.
आर्टेमिस प्रोग्राम में इस्तेमाल होने वाले रॉकेट का नाम है SLS (स्पेस लॉन्च सिस्टम). इसके ऊपर लगे स्पेसक्राफ्ट का नाम है ओरायन.
SLS रॉकेट में बीच में एक कोर स्टेज होगी. साइड में दो रॉकेट बूस्टर लगे होंगे. पहले आर्टेमिस मिशन लॉन्च के वक्त SLS लगभग 88 लाख पाउंड का थ्रस्ट पैदा करेगा. इतना बल आज तक किसी रॉकेट में नहीं देखा गया.
ये रॉकेट ओरायन स्पेसक्राफ्ट को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने में मदद करेगा. ओरायन स्पेसक्राफ्ट में बैठकर ऐस्ट्रोनॉट्स चांद की तरफ जाएंगे. लेकिन ये स्पेसक्राफ्ट चांद की सतह पर लैंड नहीं करेगा. चांद से पहले एक पड़ाव और है.

ओरायन जाकर गेटवे में जु़ड़ जाएगा.
गेटवे. ये आर्टेमिस प्रोग्राम का एक और अहम हिस्सा है. जैसे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पृथ्वी की परिक्रमा करता है, वैसे ही गेटवे नाम का एक स्टेशन चांद की कक्षा में परिक्रमा करेगा. ये इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की तुलना में काफी छोटा होगा. लेकिन ये लंबे वक्त तक चांद पर मौजूदगी बनाए रखने के लिए ज़रूरी सपोर्ट देगा.
ऐस्ट्रोनॉट्स को ले जाने वाला ओरायन स्पेसक्राफ्ट पहले गेटवे में डॉक करेगा. यानी वो गेटवे के साथ जुड़ जाएगा. फिर ऐस्ट्रोनॉट्स ओरायन से निकलकर गेटवे में दाखिल होंगे. गेटवे में ह्यूमन लैंडिंग सिस्टम लगे होंगे. इनमें बैठकर ऐस्ट्रोनॉट्स चांद की सतह पर उतरेंगे. और इसी की मदद से वापस लौटेंगे. चांद से लौटते वक्त ऐस्ट्रोनॉट्स दोबारा गेटवे में आएंगे. यहां से वो अपने स्पेसक्राफ्ट में बैठेंगे. और वापस पृथ्वी की तरफ आएंगे.

गेटवे से चांद पर रिसर्च करने में भी मदद मिलेगी.
कब, क्या और कैसे? अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा था कि 2024 तक इंसान दोबारा चांद पर कदम रखेंगे. ये आर्टेमिस प्रोग्राम का तीसरा मिशन होगा. इससे पहले तैयारी वाले मिशन भेजे जाएंगे.
सबसे पहले आर्टेमिस-1 लॉन्च होगा. इसमें कोई मनुष्य नहीं होगा. सिर्फ रॉकेट और स्पेसक्राफ्ट होंगे. स्पेसक्राफ्ट जाकर चांद के चक्कर काट आएगा.
इसके साल भर बाद आर्टेमिस-2 लॉन्च होगा. इस मिशन में स्पेसक्राफ्ट के अंदर ऐस्ट्रोनॉट्स बैठे होंगे. लेकिन वो चांद की सतह पर नहीं उतरेंगे. ये इनकी टेस्ट फ्लाइट होगी. ये लोग सिर्फ घूमकर आ जाएंगे.
इसके बाद आर्टेमिस-3 लॉन्च होगा. इसमें जो ऐस्ट्रोनॉट्स जाएंगे, वो जाकर चांद पर कदम रखेंगे. ये ऐस्ट्रोनॉट्स चांद पर लंबे वक्त तक मनुष्यों की मौजूदगी बनाने का इंतज़ाम करेंगे.

भविष्य में चांद पर बनने वाली कॉलॉनी की आर्टिस्टिक इमेज.
पहले ऐसी उम्मीद थी कि आर्टेमिस-1 साल 2021 में लॉन्च हो जाएगा. लेकिन इस इंजन टेस्ट में आने वाली रुकावट के बाद ये लेट हो सकता है. इस हिसाब से आर्टेमिस-3 अपनी 2024 वाली डेडलाइन मिस कर सकता है.
अब तक सिर्फ नासा ही चांद पर ऐस्ट्रोनॉट्स उतार पाया है. इसकी शुरुआत अमेरिका और रूस के बीच लगी एक रेस से हुई थी. चांद पर मनुष्यों का इतिहास द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध शुरू हुआ. इस युद्ध का एक मोर्चा अंतरिक्ष में भी खुला. दोनों देश अंतरिक्ष में रेस लगाने लगे. इसे स्पेस रेस कहा गया. 60 के दशक में ये रेस अपने चरम पर थी.
रूस ने अंतरिक्ष में पहला मनुष्य भेजा. अमेरिका यहां पीछे रह गया. अब चांद पर जाने की बारी थी. अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा ने चांद पर मनुष्य भेजने के लिए अपोलो प्रोग्राम शुरु किया.

नील आर्मस्ट्रॉन्ग के साथ चांद पर जाने वाले बज़ एल्ड्रिन.
साल 1969. नासा ने अपोलो-11 मिशन चांद की तरफ भेजा. इस मिशन में गए नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद पर कदम रखने वाले पहले इंसान बने. रूस चांद पर एक भी मनुष्य नहीं भेज पाया. नासा के 5 और अपोलो मिशन चांद पर ऐस्ट्रोनॉट्स को लेकर गए.
अमेरिका ने चांद पर कुल 12 लोग उतारे. इसके बाद नासा ने चांद पर लोगों को भेजना बंद कर दिया. 1972 में आखिरी बार किसी मनुष्य ने चांद पर कदम रखा. अपोलो 17 इस प्रोग्राम का आखिरी मिशन था. अपोलो के 50 साल बाद अब आर्टेमिस प्रोग्राम अमरीकी ऐस्ट्रोनॉट्स को चांद पर ले जाएगा. आर्टेमिस प्रोग्राम में क्या होगा? अपोलो एक ग्रीक देवता का नाम है. प्रकाश, कविता, नृत्य, संगीत, चिकित्सा, भविष्यवाणी और खेल के देवता. ग्रीक माइथोलॉजी में आर्टेमिस अपोलो की जुड़वा बहन और चांद की देवी हैं.

चांद पर रॉकेट फ्यूल बना लेने से काफी मुश्किलें दूर हो जाएंगी.
आर्टेमिस प्रोग्राम में जाने वाले मनुष्य चांद के अनछुए हिस्सों में जाएंगे. इनमें चांद का साउथ पोल (दक्षिणी ध्रुव) भी होगा. यहां पहले कोई नहीं पहुंचा. चांद पर पहुंचने के बाद क्या होगा?
1. पानी और दूसरे अहम संसाधनों की तलाश शुरू होगी. ऐसे संसाधन, जिनका इस्तेमाल कर लंबे वक्त तक चांद पर डेरा जमाया जा सकता है.
2. चांद के कई रहस्यों से पर्दा उठाने की कोशिश होगी, जिससे हम अपने ग्रह और ब्रह्माण्ड के बारे में अपनी समझ दुरुस्त कर सकें.
3. पृथ्वी के अलावा किसी और जगह पर रहना सीखेंगे. ये भी सीखेंगे कि अंतरिक्ष में कैसे काम चलाया जाता है.
4. इसके साथ वो टेक्नोलॉजी भी टेस्ट हो जाएगी जो ऐस्ट्रोनॉट्स को मंगल पर भेजने के लिए ज़रूरी है. मंगल जाने और लौटकर आने में तीन साल का वक्त भी लग सकता है. चांद वाले मिशन में मंगल मिशन की प्रैक्टिस हो जाएगी.

जो बाइडेन 20 जनवरी 2021 को व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति बनकर जाएंगे.
अमेरिका में राष्ट्रपति बदलने के साथ आर्टेमिस मिशन की डेडलाइन और आगे बढ़ सकती है. डॉनल्ड ट्रंप स्पेस में अमेरिका को श्रेष्ठ साबित करने लिए जितने उतावले थे, वैसा शायद जो बाइडेन न हों. लेकिन ये आर्टेमिस मिशन जब भी लॉन्च होंगे, देखने लायक होंगे.
आर्टेमिस प्रोग्राम के लिए जिस रॉकेट का इस्तेमाल होगा, उसका नाम है स्पेस लॉन्च सिस्टम. शॉर्ट फॉर्म है SLS. लॉन्च के बाद ये कामयाब रहा तो अब तक का सबसे ताकतवर रॉकेट साबित होगा. लेकिन लॉन्च से पहले इसके कई टेस्ट होने बाकी हैं.
16 जनवरी 2021 को SLS के इंजन की टेस्ट फायरिंग हुई. इसमें चार RS-25 इंजन लगे हैं. रॉकेट के चारों इंजनों को वैसे ही फायर किया गया, जैसे वो लॉन्च के वक्त होंगे. कायदे से इंजन को आठ मिनट चलना चाहिए था. लेकिन एक मिनट पूरा होने से पहले ही इन्हें रोकना पड़ा. इससे आर्टेमिस प्रोग्राम के पहले मिशन की तारीख आगे बढ़ सकती है.

ये RS-25 इंजन स्पेस शटल में भी इस्तेमाल हुए थे.
साइंसकारी के इस ऐपिसोड में हम आर्टेमिस प्रोग्राम, SLS रॉकेट और मून मिशन्स की बात करेंगे. ये समझेंगे कि नासा क्यों और कैसे चांद पर दोबारा इंसान को भेजना चाहता है.
कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि नासा ने आर्टेमिस प्रोग्राम के लिए 18 ऐस्ट्रोनॉट्स को सिलेक्ट किया है. इनमें आधी महिलाएं हैं और आधे पुरुष. इन्ही में से एक नाम है राजा चारी. राजा चारी भारतीय मूल के ऐस्ट्रोनॉट हैं. इनका नाम सामने आने के बाद भारत में ये मिशन चर्चा में आ गया. अभी ये मिशन दोबारा खबरों में है. रॉकेट के टेस्ट और उसमें आने वाली रुकावटों के चलते. दुनिया का सबसे ताकतवर रॉकेट ऐसे बड़े स्पेस मिशन के दो मेन हिस्से होते हैं. पहला होता है रॉकेट. और दूसरा होता है स्पेसक्राफ्ट. स्पेसक्राफ्ट रॉकेट के ऊपर लगा होता है. रॉकेट का ये काम होता है कि वो स्पेसक्राफ्ट को अंतरिक्ष में ले जाए. सबसे ज़्यादा ऊर्जा पृथ्वी से बाहर निकलने में ही खर्च होती है. इसलिए रॉकेट मिशन का सबसे बड़ा हिस्सा होता है. स्पेसक्राफ्ट को पृथ्वी की कक्षा (ऑर्बिट) में छोड़ने के बाद रॉकेट नीचे आ जाता है. आगे का रास्ता स्पेसक्राफ्ट अकेले तय करता है.

ये SLS के लॉन्च की आर्टिस्टिक इमेज है.
आर्टेमिस प्रोग्राम में इस्तेमाल होने वाले रॉकेट का नाम है SLS (स्पेस लॉन्च सिस्टम). इसके ऊपर लगे स्पेसक्राफ्ट का नाम है ओरायन.
SLS रॉकेट में बीच में एक कोर स्टेज होगी. साइड में दो रॉकेट बूस्टर लगे होंगे. पहले आर्टेमिस मिशन लॉन्च के वक्त SLS लगभग 88 लाख पाउंड का थ्रस्ट पैदा करेगा. इतना बल आज तक किसी रॉकेट में नहीं देखा गया.
ये रॉकेट ओरायन स्पेसक्राफ्ट को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने में मदद करेगा. ओरायन स्पेसक्राफ्ट में बैठकर ऐस्ट्रोनॉट्स चांद की तरफ जाएंगे. लेकिन ये स्पेसक्राफ्ट चांद की सतह पर लैंड नहीं करेगा. चांद से पहले एक पड़ाव और है.

ओरायन जाकर गेटवे में जु़ड़ जाएगा.
गेटवे. ये आर्टेमिस प्रोग्राम का एक और अहम हिस्सा है. जैसे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पृथ्वी की परिक्रमा करता है, वैसे ही गेटवे नाम का एक स्टेशन चांद की कक्षा में परिक्रमा करेगा. ये इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की तुलना में काफी छोटा होगा. लेकिन ये लंबे वक्त तक चांद पर मौजूदगी बनाए रखने के लिए ज़रूरी सपोर्ट देगा.
ऐस्ट्रोनॉट्स को ले जाने वाला ओरायन स्पेसक्राफ्ट पहले गेटवे में डॉक करेगा. यानी वो गेटवे के साथ जुड़ जाएगा. फिर ऐस्ट्रोनॉट्स ओरायन से निकलकर गेटवे में दाखिल होंगे. गेटवे में ह्यूमन लैंडिंग सिस्टम लगे होंगे. इनमें बैठकर ऐस्ट्रोनॉट्स चांद की सतह पर उतरेंगे. और इसी की मदद से वापस लौटेंगे. चांद से लौटते वक्त ऐस्ट्रोनॉट्स दोबारा गेटवे में आएंगे. यहां से वो अपने स्पेसक्राफ्ट में बैठेंगे. और वापस पृथ्वी की तरफ आएंगे.

गेटवे से चांद पर रिसर्च करने में भी मदद मिलेगी.
कब, क्या और कैसे? अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा था कि 2024 तक इंसान दोबारा चांद पर कदम रखेंगे. ये आर्टेमिस प्रोग्राम का तीसरा मिशन होगा. इससे पहले तैयारी वाले मिशन भेजे जाएंगे.
सबसे पहले आर्टेमिस-1 लॉन्च होगा. इसमें कोई मनुष्य नहीं होगा. सिर्फ रॉकेट और स्पेसक्राफ्ट होंगे. स्पेसक्राफ्ट जाकर चांद के चक्कर काट आएगा.
इसके साल भर बाद आर्टेमिस-2 लॉन्च होगा. इस मिशन में स्पेसक्राफ्ट के अंदर ऐस्ट्रोनॉट्स बैठे होंगे. लेकिन वो चांद की सतह पर नहीं उतरेंगे. ये इनकी टेस्ट फ्लाइट होगी. ये लोग सिर्फ घूमकर आ जाएंगे.
इसके बाद आर्टेमिस-3 लॉन्च होगा. इसमें जो ऐस्ट्रोनॉट्स जाएंगे, वो जाकर चांद पर कदम रखेंगे. ये ऐस्ट्रोनॉट्स चांद पर लंबे वक्त तक मनुष्यों की मौजूदगी बनाने का इंतज़ाम करेंगे.

भविष्य में चांद पर बनने वाली कॉलॉनी की आर्टिस्टिक इमेज.
पहले ऐसी उम्मीद थी कि आर्टेमिस-1 साल 2021 में लॉन्च हो जाएगा. लेकिन इस इंजन टेस्ट में आने वाली रुकावट के बाद ये लेट हो सकता है. इस हिसाब से आर्टेमिस-3 अपनी 2024 वाली डेडलाइन मिस कर सकता है.
अब तक सिर्फ नासा ही चांद पर ऐस्ट्रोनॉट्स उतार पाया है. इसकी शुरुआत अमेरिका और रूस के बीच लगी एक रेस से हुई थी. चांद पर मनुष्यों का इतिहास द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध शुरू हुआ. इस युद्ध का एक मोर्चा अंतरिक्ष में भी खुला. दोनों देश अंतरिक्ष में रेस लगाने लगे. इसे स्पेस रेस कहा गया. 60 के दशक में ये रेस अपने चरम पर थी.
रूस ने अंतरिक्ष में पहला मनुष्य भेजा. अमेरिका यहां पीछे रह गया. अब चांद पर जाने की बारी थी. अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा ने चांद पर मनुष्य भेजने के लिए अपोलो प्रोग्राम शुरु किया.

नील आर्मस्ट्रॉन्ग के साथ चांद पर जाने वाले बज़ एल्ड्रिन.
साल 1969. नासा ने अपोलो-11 मिशन चांद की तरफ भेजा. इस मिशन में गए नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद पर कदम रखने वाले पहले इंसान बने. रूस चांद पर एक भी मनुष्य नहीं भेज पाया. नासा के 5 और अपोलो मिशन चांद पर ऐस्ट्रोनॉट्स को लेकर गए.
अमेरिका ने चांद पर कुल 12 लोग उतारे. इसके बाद नासा ने चांद पर लोगों को भेजना बंद कर दिया. 1972 में आखिरी बार किसी मनुष्य ने चांद पर कदम रखा. अपोलो 17 इस प्रोग्राम का आखिरी मिशन था. अपोलो के 50 साल बाद अब आर्टेमिस प्रोग्राम अमरीकी ऐस्ट्रोनॉट्स को चांद पर ले जाएगा. आर्टेमिस प्रोग्राम में क्या होगा? अपोलो एक ग्रीक देवता का नाम है. प्रकाश, कविता, नृत्य, संगीत, चिकित्सा, भविष्यवाणी और खेल के देवता. ग्रीक माइथोलॉजी में आर्टेमिस अपोलो की जुड़वा बहन और चांद की देवी हैं.

चांद पर रॉकेट फ्यूल बना लेने से काफी मुश्किलें दूर हो जाएंगी.
आर्टेमिस प्रोग्राम में जाने वाले मनुष्य चांद के अनछुए हिस्सों में जाएंगे. इनमें चांद का साउथ पोल (दक्षिणी ध्रुव) भी होगा. यहां पहले कोई नहीं पहुंचा. चांद पर पहुंचने के बाद क्या होगा?
1. पानी और दूसरे अहम संसाधनों की तलाश शुरू होगी. ऐसे संसाधन, जिनका इस्तेमाल कर लंबे वक्त तक चांद पर डेरा जमाया जा सकता है.
2. चांद के कई रहस्यों से पर्दा उठाने की कोशिश होगी, जिससे हम अपने ग्रह और ब्रह्माण्ड के बारे में अपनी समझ दुरुस्त कर सकें.
3. पृथ्वी के अलावा किसी और जगह पर रहना सीखेंगे. ये भी सीखेंगे कि अंतरिक्ष में कैसे काम चलाया जाता है.
4. इसके साथ वो टेक्नोलॉजी भी टेस्ट हो जाएगी जो ऐस्ट्रोनॉट्स को मंगल पर भेजने के लिए ज़रूरी है. मंगल जाने और लौटकर आने में तीन साल का वक्त भी लग सकता है. चांद वाले मिशन में मंगल मिशन की प्रैक्टिस हो जाएगी.

जो बाइडेन 20 जनवरी 2021 को व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति बनकर जाएंगे.
अमेरिका में राष्ट्रपति बदलने के साथ आर्टेमिस मिशन की डेडलाइन और आगे बढ़ सकती है. डॉनल्ड ट्रंप स्पेस में अमेरिका को श्रेष्ठ साबित करने लिए जितने उतावले थे, वैसा शायद जो बाइडेन न हों. लेकिन ये आर्टेमिस मिशन जब भी लॉन्च होंगे, देखने लायक होंगे.

