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जम्मू-कश्मीर में कैदियों को पहनाई गई 'पायल' गजब का डिवाइस है

भारत में पहली बार जम्मू-कश्मीर पुलिस जमानत पर छूटे कैदियों को ये डिवाइस पहना रही है. पायल (Anklet) की तरह पैर में फिट या कहें लॉक हो जाने वाले इस डिवाइस में GPS लगा होता है, जिससे उस शख्स की हर मूवमेंट ट्रैक हो सकती है. हालांकि डिवाइस ट्रेकिंग से बहुत कुछ ज्यादा कर सकता है.

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7 नवंबर 2023 (अपडेटेड: 8 मार्च 2024, 10:25 PM IST)
The officials of the State Investigation Agency (SIA) of the J&K Police have introduced the GPS tracker anklet for monitoring of bail-out terror accused.
जीपीएस anklet (तस्वीर साभार: PTI/ Gosafe)
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साल 2011 में हॉलीवुड अभिनेत्री Lindsay Lohan को एक अपराध के कारण सजा सुनाई गई. लेकिन जेल में भीड़ के चलते उनको हाउस अरेस्ट में रखा गया. चर्चित हस्तियों से लेकर राजनेताओं तक को हाउस अरेस्ट में रखा जाता रहा है. लेकिन Lindsay का केस चर्चा का विषय बना. कारण, अरेस्ट के दौरान अभिनेत्री को पैरों में एक ट्रैकर पहनाया गया था. GPS तकनीक से इनेबल इस ट्रैकर का मकसद उनकी हर गतिविधि को रिकॉर्ड करना था. आपको लगेगा 12 साल बाद काहे ई सब बता रहे. वजह से जनाब, क्योंकि...  

भारत में पहली बार जम्मू-कश्मीर पुलिस जमानत पर छूटे कैदियों को ये डिवाइस पहना रही है. पायल (anklet) की तरह पैर में फिट या कहें लॉक हो जाने वाले इस डिवाइस में GPS लगा होता है, जिससे उस शख्स की हर मूवमेंट ट्रैक हो सकती है. हालांकि डिवाइस ट्रैकिंग से बहुत कुछ ज्यादा कर सकता है.

क्या है Anklet?

नाम के पीछे का कारण इसको पायल की तरह पैर में पहने जाने से आया है. वैसे इस डिवाइस को ‘Electronic ankle bracelet’ भी कहते हैं. अमेरिका, UK, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देश ऐसी डिवाइस का इस्तेमाल काफी समय से कर रहे हैं. इससे जमानत, पैरोल और घर में नजरबंदी के दौरान आरोपी व्यक्तियों की गतिविधियों पर नजर रखने और जेलों में भीड़भाड़ को कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

इत्तू सा डिवाइस भला क्या कर लेगा? 

दिमाग में सवाल ही मत लाइए कि ऐसे डिवाइस का क्या फायदा. कोई भी इसको काट लेगा, तोड़ देगा, खराब कर देगा, पानी में डाल देगा, वगैरा-वगैरा, ऐसा कछु नहीं होने वाला. क्योंकि ये महज एक लॉकिंग और ट्रैकिंग डिवाइस नहीं है, बल्कि तकनीक का बेहतरीन नमूना है. खुली जेल जैसे काम करता है. शुरुआत करते हैं इसके लॉक मैकेनिज्म से.

Anklet में होता है चाबी और पासवर्ड वाला सिस्टम. ये चाबी और पासवर्ड सिर्फ पुलिस या संबंधित विभाग के पास ही होते हैं.

डिवाइस का जो बेल्ट वाला हिस्सा होता है जिसे पैरों में पहनाया जाता है वो Fiber Optic का बना होता है. फाइबर ऑप्टिक वही प्रोडक्ट है जिससे दुनिया-जहान में समुंदर के अंदर इंटरनेट का जाल बिछाया जाता है. अंदाजा लगा लीजिए कि जब समुंदर की गहराई में हजारों टन पानी का दबाव और शार्क के दांत भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते तो फिर क्या ही होगा. अगर किसी ने इसको काटने-फाड़ने की कोशिश भी की तो पुलिस टीम को कुछ ही सेकंड में पता चल जाएगा.

बेल्ट से इतर जो बॉक्स होता है, जिसमें पूरी असेंबली होती है, वो बना होता है वाटरप्रूफ और इंसुलेशन वाले मटेरियल से. वाटरप्रूफ मतलब वाकई में पानी से सेफ रहने वाला. हमारे स्मार्टफोन जैसे नहीं जिसमें वाटर रजिसटेंट होता है.

ये तो हुई बाहर के कपड़ों की बात. अब जरा अंदर झांकते हैं. Anklet के अंदर होता है एक GPS ट्रैकर, Accelerometer, ब्लूटूथ, Geo-Fence, SOS बटन, जीएसएम और LTE टॉवर सिग्नल और वाइब्रेशन मोटर और बहुत लंबी चलने वाली Li-on Battery बैटरी. 

एक बार में पूरे कल-पुर्जे बता दिए. अब जानते हैं कि ये करते क्या हैं.

# GPS ट्रैकिंग मतलब सीधे सैटेलाइट से कनेक्टिविटी. सेलुलर नेटवर्क नहीं हो और ब्लूटूथ रेंज से बाहर हो तो भी पुलिस को निगरानी रखने में कोई दिक्कत नहीं आएगी. GPS वही तकनीक है जो रास्ता दिखाने से लेकर निगरानी रखने के लिए गूगल मैप से लेकर दूसरे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में इस्तेमाल होती है.

# ब्लूटूथ भी एक तरीका है जिसमें एक निश्चित रेंज में ट्रैकिंग होती है. इसे घर के अंदर होने वाली गतिविधि को ट्रैक करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

# जीएसएम और LTE की मदद से सबसे नजदीक के टेलिकॉम टॉवर से डिवाइस को जोड़ा जाता है. इसके लिए सिम या ई-सिम का इस्तेमाल होता है.

# वाइब्रेशन मोटर का इस्तेमाल कैदी को सिग्नल भेजने के लिए होता है. मतलब अगर बहुत देर तक कोई हलचल नहीं है तो पुलिस इसका इस्तेमाल करती है. जो डिवाइस वाइब्रेट होने के बाद भी कोई गतिविधि नहीं तो समझ लीजिए कुछ ही देर में दरवाजे की घंटी बजने वाली है.

#  जियो फेंस मतलब डिवाइस या कैदी का इलाका तय करना. आसान भाषा में कहें तो अगर एक निश्चित दायरे से बाहर निकले तो अलार्म बजेगा. इसके लिए सॉफ्टवेयर और GPS की मदद ली जाती है.

# SOS बटन कैदी के लिए है. अगर उसे कोई दिक्कत है या मुसीबत है तो बटन दबाकर आसपास के लोगों को और पुलिस को आगाह किया जा सकता है.

# इस सारी गतिविधि को पुलिस मोबाइल से लेकर पुलिस स्टेशन में लगे टीवी तक में देख सकती है और रिकॉर्ड कर सकती है. डिवाइस में कोई कैमरा नहीं होता.

वैसे तो इस डिवाइस को हाउस अरेस्ट या जमानत पर रिहा कैदियों को थोड़े समय के लिए पहनाया जाता है. लेकिन आजकल कुछ देशों में इसे जीवनभर के लिए भी पहनाया जा रहा है. अमेरिका में एक 70 साल के सेक्स ओफेंडर को जीवन भर इस डिवाइस को पहनने का आदेश दिया गया है.

अब जम्मू-कश्मीर पुलिस ने NIA कोर्ट के आदेश के चलते एक आरोपी पर GPS ट्रैकर वाली डिवाइस का इस्तेमाल करना चालू किया है. आप पूरी खबर यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं. आखिरी बात, इस डिवाइस को निजी उपयोग के लिए नहीं खरीदा जा सकता है.

वीडियो: जम्मू-कश्मीर में नार्को टेरर का बड़ा प्लान हुआ फेल, पाकिस्तान की थी साज़िश?

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