कोरोना वायरस को भगाने के लिए बेहतर क्या, साबुन या सैनिटाइज़र?
साबुन और सैनिटाइज़र में फर्क और इनके काम करने का तरीका भी जान लीजिए.
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सैनिटाइज़र और साबुन कैसे काम करते हैं, आइए बताते हैं.
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जब से कोरोना वायरस ने दस्तक दी है, साबुन और सैनिटाइज़र हमारे दोस्त हो गए हैं. हम शुरू से अमिताभ बच्चन की आवाज़ में सुन रहे थे, कोरोना से बचाव के लिए ज़रूरी है हाथ धोना, मास्क पहनना और आपस में उचित दूरी बनाए रखना. बहुत सारे लोगों ने थोक में साबुन और सैनिटाइज़र रख लिए हैं. लेकिन ये काम कैसे करते हैं? साबुन कोरोना वायरस जैसे सूक्ष्म जीवों को कैसे निबटा देता है. धूल, तेल और बाकी की गंदगी के साथ साबुन क्या करता है? और सैनिटाइज़र क्या काम करता है? साबुन और सैनिटाइज़र कितने अलग हैं. इनमें से बढ़िया कौन है?

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साइंसकारी के इस ऐपिसोड में साबुन और सैनिटाइज़र के काम करने का तरीका समझेंगे. आप कहेंगे, यार कुछ ज़्यादा ही लेट नहीं बता रहे. अब तो वैक्सीन आ गई. हम कहेंगे- नहीं. अभी साबुन और सैनिटाइज़र का काम खत्म नहीं हुआ है. और महामारी हो या ना हो, साबुन तो कब से इस्तेमाल होता आ रहा है. आगे भी साबुन का इस्तेमाल होगा. तो इनके काम करने का तरीका पता होना चाहिए न.

साबुन किसी भी ब्रांड का हो, उसका बुनियादी फॉर्मूला एक ही होता है.
पहला साबुन कैसे बना? साबुन का इतिहास बेबीलोनिया सभ्यता जितना पुराना है. कई दूसरी सभ्यताओं में भी हज़ारों सालों से साबुन का इस्तेमाल होता आया है. शुरुआत में जानवरों के फैट (वसा), राख और पानी को मिलाकर साबुन बना. शायद ऐसा संयोग से हुआ होगा. लेकिन ये संयोग साबुन बनाने की रेसिपी बन गया. साबुन बनाने की बुनियादी रेसिपी ये है -
सोप मॉलीक्यूल के पैर और पानी का छत्तीस का आंकड़ा है. ये वाला हिस्सा पानी के अणुओं से दूर भागता है. सोप मॉलीक्यूल के इस सिरे को हाइड्रोफोबिक एंड कहते हैं. हाइड्रोफोबिक को हिंदी में जलविरोधी कहते हैं. पानी का दुश्मन.
अगर आप अपने हाथ पर सिर्फ पानी डालेंगे, तो वो बस ऊपरी गंदगी को लेकर बह जाएगा. पूरी तरह साफ नहीं करेगा. लेकिन आपके पानी में सोप मॉलीक्यूल्स हों, तो पूरा खेल बदल जाएगा.
सोप मॉलीक्यूल गंदगी के साथ गुड पुलिस-बैड पुलिस खेलता है. सोप मॉलीक्यूल का जलविरोधी सिरा गंदगी से जाकर चिपक जाएगा. जबकि इसका जलस्नेही सिरा पानी से चिपका रहेगा. ऐसे सोप मॉलीक्यूल गंदगी को एक घेरे में ले लेते हैं. बहता हुआ पानी जलस्नेही सिरे को खींच लाता है. और जलविरोधी हिस्सा अपने साथ गंदगी भी बहा ले जाता है.

गंदगी को घेरकर ले जाते साबुन के मॉलीक्यूल.
साबुन बनाम कोरोना वायरस कोरोना वायरस की बाहरी दीवार फैट से बनी होती है. इसे लिपिड बाइलेयर कहते हैं. सोप मॉलीक्यूल का जलविरोधी सिरा इसकी तरफ खिंचा चला जाता है. और वो इस लिपिड बाइलेयर के अंदर जाने की कोशिश करता है. इस कोशिश में सोप मॉलीक्यूल इस लेयर को खोलकर रख देते हैं. पूरा वायरस बिखर जाता है. इसके बाद सोप मॉलीक्यूल सबकुछ पानी के साथ बहाकर ले जाते हैं.

कोरोना वायरस का ग्रे एरिया इसकी फैट लेयर है. साबुन इसे खोल देता है, जैसे कोई पंचर बनाने वाला टायर खोल देता है.
साबुन को सिर्फ छूकर नहीं रख देना है. अच्छे से हाथ के हर कोने को साफ करना है. कायदे से सारे कीटाणु खत्म करने के लिए साबुन से 20 सेकंड तक हाथ धोते रहना ज़रूरी है. सैनिटाइज़र कैसे काम करता है? हम कई बार ऐसी जगहों पर होते हैं, जहां पानी और साबुन से हाथ धोने की व्यवस्था नहीं होती. जब आपके आसपास पानी और साबुन न हो, तो हैंड सैनिटाइज़र काम आता है.
वायरस, बैक्टीरिया या अन्य सूक्ष्म जीवों को मारने के लिए एल्कोहल वाले हैंड सैनिटाइज़र इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है. हैंड सैनिटाइज़र में मेन हमलावर एल्कोहल होता है. लेकिन एल्कोहल तो कैमिकल्स की एक बहुत बड़ी कैटेगरी का नाम है.

सैनिटाइज़र में 60-90% एल्कोहल हो तो बढ़िया माना जाता है.
ज़्यादातर शराबों में इथेनॉल नाम का एल्कोहल होता है. सैनेटाइज़र बनाने में भी इथेनॉल का इस्तेमाल होता है. इसके अलावा प्रोपेनॉल और आइसोप्रोपेनॉल से भी आमतौर पर सैनेटाइज़र बनाया जाता है.
एल्कोहल वायरस और दूसरे सूक्ष्म जीवों की दीवार तोड़ देता है. वायरस पूरा खुल जाता है. इसके अंदर का माल बिखर जाता है. और वायरस पूरी तरह निष्क्रिय हो जाता है.
बस सैनिटाइज़र में एल्कोहल की मात्रा ठीक-ठाक होनी चाहिए. कोरोना वायरस जैसे सूक्ष्म जीव मारने के लिए सैनिटाइज़र में एल्कोहल की मात्रा 60% प्रतिशत से ज़्यादा होनी चाहिए. साबुन और सैनिटाइज़र में से कौन बढ़िया? वैसे तो सैनिटाइज़र लाने ले जाने में आसान होता है. कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन कई बार साबुन बेहतर काम करता है. अगर आपके हाथ पर धूल या ग्रीस वगैरह लगा हुआ है, तो सैनिटाइज़र ढंग से अपना काम नहीं कर पाएगा. वायरस को मारने के लिए एल्कोहल अच्छे से इन गंदगी की परतों को पार ही न कर पाएगा.
इसी कंडीशन में आप साबुन लगाएंगे, तो वो सबसे पहले ऊपर लगी गंदगी को बहाकर ले जाएगा. इसके बाद वो नीचे छुपे वायरस के टुकड़े कर देगा. और उसे बहाकर ले जाएगा.
वैक्सीन आ गई है लेकिन कोरोना वायरस अभी गया नहीं है इसलिए सावधानी की ढाल नीचे नहीं करनी है. सामाजिक दूरी का पालन कीजिए. मास्क लगाकर बाहर निकलें, और नियमित तौर पर हाथ धोते रहिए.

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साइंसकारी के इस ऐपिसोड में साबुन और सैनिटाइज़र के काम करने का तरीका समझेंगे. आप कहेंगे, यार कुछ ज़्यादा ही लेट नहीं बता रहे. अब तो वैक्सीन आ गई. हम कहेंगे- नहीं. अभी साबुन और सैनिटाइज़र का काम खत्म नहीं हुआ है. और महामारी हो या ना हो, साबुन तो कब से इस्तेमाल होता आ रहा है. आगे भी साबुन का इस्तेमाल होगा. तो इनके काम करने का तरीका पता होना चाहिए न.

साबुन किसी भी ब्रांड का हो, उसका बुनियादी फॉर्मूला एक ही होता है.
पहला साबुन कैसे बना? साबुन का इतिहास बेबीलोनिया सभ्यता जितना पुराना है. कई दूसरी सभ्यताओं में भी हज़ारों सालों से साबुन का इस्तेमाल होता आया है. शुरुआत में जानवरों के फैट (वसा), राख और पानी को मिलाकर साबुन बना. शायद ऐसा संयोग से हुआ होगा. लेकिन ये संयोग साबुन बनाने की रेसिपी बन गया. साबुन बनाने की बुनियादी रेसिपी ये है -
ऑइल या फैट + बेसिक आयनिक सॉल्ट + पानीजब ये चीज़ें साथ आती हैं, तब एक खास कैमिकल रिएक्शन होता है. इसे सेपोनिफिकेशन कहते हैं. यानी साबुन बनाने वाला प्रोसेस. साबुन के दो चेहरे हर चीज़ की तरह साबुन की बुनियाद भी उसके मॉलीक्यूल (अणु) हैं. साबुन की एक बूंद में करोड़ों सोप मॉलीक्यूल होते हैं. साबुन की सफाई का राज़ इन मॉलीक्यूल्स की बनावट में छुपा है.
सोप मॉलीक्यूल की बनावट एक कील जैसी होती है. इसका एक सिर होता है और लंबे से पैर.सोप मॉलीक्यूल के सिर को पानी बहुत पसंद होता है. जहां भी पानी के अणु होते हैं, ये हिस्सा उनके पास जाकर चिपक जाता है. सोप मॉलीक्यूल के इस सिरे को हाइड्रोफिलिक एंड कहते हैं. हाइड्रोफिलक यानी जलस्नेही. पानी से प्यार करने वाला.
लेफ्ट में कील. राइट में सोप मॉलीक्यूल. साबुन से कोई बिना सिर-पैर की बात न करियो.
सोप मॉलीक्यूल के पैर और पानी का छत्तीस का आंकड़ा है. ये वाला हिस्सा पानी के अणुओं से दूर भागता है. सोप मॉलीक्यूल के इस सिरे को हाइड्रोफोबिक एंड कहते हैं. हाइड्रोफोबिक को हिंदी में जलविरोधी कहते हैं. पानी का दुश्मन.
अगर आप अपने हाथ पर सिर्फ पानी डालेंगे, तो वो बस ऊपरी गंदगी को लेकर बह जाएगा. पूरी तरह साफ नहीं करेगा. लेकिन आपके पानी में सोप मॉलीक्यूल्स हों, तो पूरा खेल बदल जाएगा.
सोप मॉलीक्यूल गंदगी के साथ गुड पुलिस-बैड पुलिस खेलता है. सोप मॉलीक्यूल का जलविरोधी सिरा गंदगी से जाकर चिपक जाएगा. जबकि इसका जलस्नेही सिरा पानी से चिपका रहेगा. ऐसे सोप मॉलीक्यूल गंदगी को एक घेरे में ले लेते हैं. बहता हुआ पानी जलस्नेही सिरे को खींच लाता है. और जलविरोधी हिस्सा अपने साथ गंदगी भी बहा ले जाता है.

गंदगी को घेरकर ले जाते साबुन के मॉलीक्यूल.
साबुन बनाम कोरोना वायरस कोरोना वायरस की बाहरी दीवार फैट से बनी होती है. इसे लिपिड बाइलेयर कहते हैं. सोप मॉलीक्यूल का जलविरोधी सिरा इसकी तरफ खिंचा चला जाता है. और वो इस लिपिड बाइलेयर के अंदर जाने की कोशिश करता है. इस कोशिश में सोप मॉलीक्यूल इस लेयर को खोलकर रख देते हैं. पूरा वायरस बिखर जाता है. इसके बाद सोप मॉलीक्यूल सबकुछ पानी के साथ बहाकर ले जाते हैं.

कोरोना वायरस का ग्रे एरिया इसकी फैट लेयर है. साबुन इसे खोल देता है, जैसे कोई पंचर बनाने वाला टायर खोल देता है.
साबुन को सिर्फ छूकर नहीं रख देना है. अच्छे से हाथ के हर कोने को साफ करना है. कायदे से सारे कीटाणु खत्म करने के लिए साबुन से 20 सेकंड तक हाथ धोते रहना ज़रूरी है. सैनिटाइज़र कैसे काम करता है? हम कई बार ऐसी जगहों पर होते हैं, जहां पानी और साबुन से हाथ धोने की व्यवस्था नहीं होती. जब आपके आसपास पानी और साबुन न हो, तो हैंड सैनिटाइज़र काम आता है.
वायरस, बैक्टीरिया या अन्य सूक्ष्म जीवों को मारने के लिए एल्कोहल वाले हैंड सैनिटाइज़र इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है. हैंड सैनिटाइज़र में मेन हमलावर एल्कोहल होता है. लेकिन एल्कोहल तो कैमिकल्स की एक बहुत बड़ी कैटेगरी का नाम है.

सैनिटाइज़र में 60-90% एल्कोहल हो तो बढ़िया माना जाता है.
ज़्यादातर शराबों में इथेनॉल नाम का एल्कोहल होता है. सैनेटाइज़र बनाने में भी इथेनॉल का इस्तेमाल होता है. इसके अलावा प्रोपेनॉल और आइसोप्रोपेनॉल से भी आमतौर पर सैनेटाइज़र बनाया जाता है.
एल्कोहल वायरस और दूसरे सूक्ष्म जीवों की दीवार तोड़ देता है. वायरस पूरा खुल जाता है. इसके अंदर का माल बिखर जाता है. और वायरस पूरी तरह निष्क्रिय हो जाता है.
बस सैनिटाइज़र में एल्कोहल की मात्रा ठीक-ठाक होनी चाहिए. कोरोना वायरस जैसे सूक्ष्म जीव मारने के लिए सैनिटाइज़र में एल्कोहल की मात्रा 60% प्रतिशत से ज़्यादा होनी चाहिए. साबुन और सैनिटाइज़र में से कौन बढ़िया? वैसे तो सैनिटाइज़र लाने ले जाने में आसान होता है. कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन कई बार साबुन बेहतर काम करता है. अगर आपके हाथ पर धूल या ग्रीस वगैरह लगा हुआ है, तो सैनिटाइज़र ढंग से अपना काम नहीं कर पाएगा. वायरस को मारने के लिए एल्कोहल अच्छे से इन गंदगी की परतों को पार ही न कर पाएगा.
इसी कंडीशन में आप साबुन लगाएंगे, तो वो सबसे पहले ऊपर लगी गंदगी को बहाकर ले जाएगा. इसके बाद वो नीचे छुपे वायरस के टुकड़े कर देगा. और उसे बहाकर ले जाएगा.
वैक्सीन आ गई है लेकिन कोरोना वायरस अभी गया नहीं है इसलिए सावधानी की ढाल नीचे नहीं करनी है. सामाजिक दूरी का पालन कीजिए. मास्क लगाकर बाहर निकलें, और नियमित तौर पर हाथ धोते रहिए.


