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अंतरिक्ष में घूमते ऐस्टेरॉयड से क्या खोद लाया है जापान?

इससे ब्रह्माण्ड के नए राज़ उजागर हो सकते हैं.

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जापान का स्पेसक्राफ्ट हायाबुसा-2 और उसके सैंपल्स वाला कैप्सूल.इसमें अंतरिक्ष से लाई गई गैस भी है.(JAXA/ASA)
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आयुष
7 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 7 दिसंबर 2020, 05:21 PM IST)
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हायाबुसा. सुज़ुकी के एक बाइक मॉडल का नाम है. लौंडों के बीच बहुत पॉपुलर है. दरअसल जापान में एक खास तरह के बाज़ को हायाबुसा कहते है. यहीं से हायाबुसा बाइक का नाम आया.
इसी नाम से जापान का एक स्पेस मिशन भी है. हायाबुसा-2. ये मिशन छह साल पहले लॉन्च हुआ था. इसे एक ऐस्टेरॉयड के सैंपल पृथ्वी तक लाने के लिए भेजा गया था. अब ये लौट आया है. इसलिए चर्चा में बना हुआ है. हायाबुसा-2 खाली हाथ नहीं लौटा. पेटी भरके सामान लाया है. इस पेटी में भरा सामान ब्रह्माण्ड के नए राज़ उजागर कर सकता है.
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साइंसकारी के इस ऐपिसोड में हम मिशन हायाबुसा-2 की बात करेंगे.पहले स्पेस एजेंसी की बात कर लेते हैं. जैसे इंडिया की ISRO है, अमेरिका की NASA है, वैसे ही जापान की JAXA है. जापान ऐयरोस्पेस ऐक्सप्लोरेशन एजेंसी.
JAXA ने 3 दिसंबर 2014 को हायाबुसा-2 मिशन लॉन्च किया. ये पूरी तरह एक रोबॉटिक स्पेसक्राफ्ट था. यानी इसमें कोई इंसान बैठ के नहीं गया. इस मिशन को एक ऐस्टेरॉयड के पास भेजा गया. मकसद था उस ऐस्टेरॉयड को स्टडी करना. और उसके सैंपल्स पृथ्वी पर वापस लाना. ऐस्टेरॉयड यानी क्षुद्रग्रह. अंतरिक्ष में घूम रही चट्टानें, जो ग्रहों की तुलना में बहुत छोटी हैं. हमारे सौरमंडल में बहुत सारे ऐस्टेरॉयड हैं. जैसे बाकी ग्रह सूरज के चक्कर काटते हैं, वैसे ही ऐस्टेरॉयड भी सूरज के चक्कर काटते हैं.

ऐस्टेरॉयड के सैंपल किस काम के?

हायाबुसा-2 मिशन जिस ऐस्टेरॉयड से सैंपल लेकर आया है, उसका नाम है रयुगू. इस मिशन को पूरा होने में छह साल का वक्त लगा.
आप पूछेंगे कि क्यों इतना ताम-झाम कर रहे हैं? रयुगु एक C-टाइप ऐस्टेरॉयड है. ये ऐस्टेरॉयड हमारे सौरमंडल में मौजूद सबसे प्राचीन चीज़ों में एक हैं. वैज्ञानिकों को ऐसा लगता है कि ये ऐस्टेरॉयड सौरमंडल के शुरुआती दिनों में बने थे. और तब से अब तक इनमें वैसे बदलाव नहीं आए, जो ग्रहों में आ चुके हैं.
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ऐस्टेरॉयड रयुगू और उसकी हाई रिज़़ॉल्यूशन इमेज. (JAXA)

इस ऐस्टेरॉयड की स्टडी करने से सौरमंडल के बनने और विकसित होने की जानकारी मिल सकती है. साथ ही इससे पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति से जुड़े जवाब भी मिल सकते हैं.
जिज्ञासा के अलावा इस ऐस्टेरॉयड की स्टडी करने का कारण डर भी है. रयुगू पोटेंशियली हज़ार्डस ऐस्टेरॉयड की श्रेणी में आता है. यानी वे ऐस्टेरॉयड जिनसे पृथ्वी पर भविष्य में खतरा हो सकता है. इसलिए इन खतरों से निबटने के लिए हमें तैयार रहना होगा.

कैसे किया भैया?

जून 2018 में हायाबुसा-2 ऐस्टेरॉयड रयुगू के पास पहुंचा. इस स्पेसक्राफ्ट ने ऐस्टेरॉयड पर एक लैंडर और दो छोटे से रोवर तैनात किए. लैंडर यानी अंतरिक्ष में किसी सतह पर लैंड करने वाली चीज़. और रोवर यानी उस सतह पर सैर करने वाला हिस्सा. हायाबुसा-2 किसी ऐस्टेरॉयड पर रोवर चलाने वाला पहला मिशन है.
मेन स्पेसक्राफ्ट, लैंडर और रोवर में कई साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स लगे हुए हैं. इन्हीं की मदद से इस ऐस्टेरॉयड को स्टडी किया गया. ये मिशन का पहला मुख्य उद्देश्य था. दूसरा मुख्य उद्देश्य था इस ऐस्टेरॉयड के सैंपल इकट्ठे करना.
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रयुगू से सैंपल उठाने जाता हायाबुसा 2. (JAXA)

फरवरी 2019 में हायाबुसा-2 ने इस ऐस्टेरॉयड की सतह से सैंपल्स इकट्ठे किए. सैंपल्स इकट्ठे करने के लिए इसका एक हाथ अलग से बाहर निकला है. इसके कुछ महीनों बाद हायाबुसा ने तरफ एक इंपैक्टर फायर किया. यूं समझिए कि एक छोटा सा गोला दाग दिया. ताकि इस ऐस्टेरॉयड पर एक क्रेटर बन सके. क्रेटर यानी गड्ढा. ये आर्टिफिशियल क्रेटर इसलिए बनाया गया ताकि ऐस्टेरॉयड से सैंपल निकालने में सहूलियत हो.
कई बार इसी तरह सैंपल इकट्ठे करने के बाद हायाबुसा-2 पृथ्वी की ओर लौट आया. नवंबर 2020 में इस स्पेसक्राफ्ट ने एक कैप्सूल पृथ्वी की तरफ छोड़ा. इसी कैप्सूल में रयुगू ऐस्टेरॉयड के सैंपल्स हैं. 6 दिसंबर 2020 को ये कैप्सूल पृथ्वी पर आ गिरा. ये कैप्सूल दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया वूमेरा के पास गिरा. JAXA की एक टीम ने ये कैप्सूल सही सलामत उठा लिया. अब इसे जापान ले जाने की तैयारी हो रही है. इन सैंपल्स का कुछ हिस्सा अमरीकी स्पेस एजेंसी NASA को भी दिया जाएगा. दोनों मिलकर इसे कायदे से स्टडी करेंगे.

आगे-पीछे क्या है?

हायाबुसा स्पेसक्राफ्ट ने सैंपल कैप्सूल तो पृथ्वी पर भेज दिया है, लेकिन ये अंतरिक्ष में आगे निकल गया है. इसमें अभी भी काफी सारा फ्यूल बाकी है. हायाबुसा आगे जाकर कुछ और ऐस्टेरॉयड्स को स्टडी करेगा और उनकी जानकारी हमें भेजेगा.
नासा ने भी एक मिशन ऐस्टेरॉयड के सैंपल्स लाने के लिए भेजा था. इस मिशन का नाम है OSIRIS-Rex. हाल ही में इसने ऐस्टेरॉयड बेनू से सैंपल्स इकट्ठे किए हैं. और अब ये इन्हें लेकर आने की तैयारी में है. 2010 में जापान का हायाबुसा-1 मिशन एक ऐस्टेरॉयड के सैंपल पृथ्वी पर लेकर आया था. हायाबुसा-2 जापान का दूसरा सफल ऐस्टेरॉयड मिशन है.

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