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AI आपकी जॉब भले ना छीने लेकिन पीने वाला पानी जरूर खत्म कर देगा!

AI एक चीज जरूर हमसे ले जाएगा या ले जा सकता है. AI हमारा पीने का पानी (AI is accelerating water risk) ले जा सकता है. पानी जिसकी कमी पहले से है. मगर AI के इस्तेमाल ने उसकी खपत बहुत बढ़ा दी है.

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29 अगस्त 2024 (पब्लिश्ड: 03:32 PM IST)
AI Is Accelerating the Loss of Our Scarcest Natural Water Resource
AI हमारा पानी पी रहा है (तस्वीर साभार: Copilot)
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AI को आए अभी जुम्मा-जुम्मा 2 साल ही हुए हैं. सॉरी मुझे अपना वाक्य दुरुस्त करना चाहिए. AI चैट बॉट को आए अभी दो साल हुए हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तो दशकों से है, ये मुआ चैट-बॉट अभी आया है. लेकिन जब से आया है जवाब कम देता है, सवाल ज्यादा छोड़ देता है. ऐसा ही एक सवाल है कि क्या AI हमारी जॉब खाने वाला है? इस बारे में हम निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते. 

लेकिन AI एक चीज जरूर हमसे ले जाएगा या ले जा सकता है. अगर उसका जल्द समाधान नहीं ढूंढा गया तो. AI हमारा पीने का पानी ले जा सकता है. पानी जिसकी कमी पहले से है. मगर AI के इस्तेमाल ने उसकी खपत बहुत बढ़ा दी है. पता है, आपको लग रहा होगा कि कहां से खरीदे ऐसी बकवास डिक्शनरी. जनाब आप एक गिलास ठंडा जल लीजिए. बाकी हम बताते हैं.

AI Is Accelerating the Loss of Our Scarcest Natural Water Resource
जल लीजिए (प्राइम)
ग्राफिक कार्ड पानी पीता है?

आज एक दम कोई स्टोरी मीटर नहीं सेट करेंगे. सीधे पॉइंट पर आएंगे, बस उसके पहले थोड़ा सा AI और ग्राफिक कार्ड को समझ लेते हैं. आप कोई सा भी चैट बॉट इस्तेमाल करते हैं, उसको चलाने के लिए चाहिए होता है GPU. GPU मतलब एक कंप्यूटर चिप, जिसका उपयोग कंप्यूटर से लेकर लैपटॉप, स्मार्टफोन और अन्य डिवाइसेज में पिक्चर, वीडियो, 2D और 3D एनिमेशन को डिस्प्ले करने के लिए किया जाता है. आम भाषा में इसे ग्राफिक्स कार्ड और वीडियो कार्ड भी कहते हैं. इसी चिप की मदद से इमेज और वीडियो स्क्रीन पर जल्दी लोड होते हैं. नॉर्मल लैपटॉप तो बेसिक सा जीपीयू और अगर तगड़ा गेमिंग लैपटॉप तो जबर वाला. अब इसी GPU की जरूरत चैटबॉट को होती है. मतलब, उनके सिस्टम से लेकर क्लाउड स्टोरेज को. मसलन, चैट जीपीटी के एक मॉडल को ट्रेन करने के लिए 10,000 जीपीयू यूनिट्स की जरूरत पड़ी थी.

AI Is Accelerating the Loss of Our Scarcest Natural Water Resource
ग्राफिक कार्ड (सांकेतिक तस्वीर)

बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स में इन जीपीयू के काम करने से एनर्जी जनरेट होती है और वहां का तापमान बढ़ जाता है. इसको ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होता है पानी. पानी जो चिलर्स जैसे सिस्टम से बहता है. ये एक किस्म का सिस्टम है, जिसमें पानी के पाइप के जरिए बहुत बढ़े हुए तापमान को कंट्रोल किया जाता है. ऐसी जगह पर परंपरागत AC काम नहीं आते. खाड़ी के देशों में इनका इस्तेमाल बहुत आम है. Forbes की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टेक कंपनियों ने इन डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल बहुत बढ़ा दिया है. रपट के मुताबिक, एक kWh एनर्जी से जो हीट उत्पन्न होती है, उसके लिए 9 लीटर पानी लगता है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि kWh एनर्जी मापने की एक इकाई है. कोई भी डिवाइस या प्रोडक्ट एक घंटे में जितनी ऊर्जा की खपत करेगा उसे kWh में मापा जाएगा. माने कि अगर एक चैट बॉट लगातार एक घंटे काम किया तो 9 लीटर पानी हवा हो गया.  

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AI Is Accelerating the Loss of Our Scarcest Natural Water Resource
सांकेतिक तस्वीर 

ऐसे शायद ये आंकड़ा छोटू लगे मगर United Nations Environmental Report के मुताबिक, 2027 तक AI सर्वर को 6.6 billion m³ पानी की जरूरत होगी. इसमें सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि सारे तामझाम में फ्रेश वाटर इस्तेमाल होता है. क्योंकि समुद्र के पानी में नमक होता है और वो चिलर्स के काम का नहीं. मतलब, पहले से ही दुनिया की आबादी का बड़ा हिस्सा साफ पानी को तरस रहा. ऊपर से AI. हालांकि, अच्छी बता ये है कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी कंपनियां इसके बारे में गंभीरता से सोच रही हैं. उनका लक्ष्य साल 2030 तक कोई और उपाय निकालने का है.

गूगल के मुताबिक,

ताजा, साफ पानी पृथ्वी पर सबसे कीमती संसाधनों में से एक है... हम जल सुरक्षा और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र को सपोर्ट करने के लिए तत्काल कार्रवाई कर रहे हैं.

माने कि साफ है कि AI से सबसे बड़ा खतरा पीने के पानी को है. लेकिन चूंकि मामला टेक दिग्गजों से जुड़ा है तो उम्मीद है कि AI से पूछकर ही कोई हल निकाल लिया जाएगा. हां, तब तक आप चैट बॉट से थोड़ा कम चिट-चैट करें. आधे घंटे भी जो आपने बतिया लिया तो कितना पानी बर्बाद हुआ. पता ही होगा आपको.  

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