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'रांड सांड सीढ़ी सन्यासी इनसे बचे सो आये कासी'

आज एक कविता रोज़ में पढ़िए कृष्ण कल्पित की कविता 'कासी'.

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5 मार्च 2017 (अपडेटेड: 4 मार्च 2017, 05:25 AM IST)
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काशी इन दिनों खासी चर्चा में है. सब तरफ काशी-काशी हो रहा है. काशी यानी वाराणसी यानी बनारस होली के हुड़दंग और रंग से पहले राजनीति के हुड़दंग और रंग में मगन है. मौका चुनाव का है. 'लल्लनटॉप' भी अपना शो लेकर बनारस पहुंच चुका है. सबको शाम का इंतजार है, जब यह शो शुरू होगा. फिलहाल शो शुरू होने से पहले हम कवि कृष्ण कल्पित की ‘कासी’ पर लिखी यह ताज़ा कविता खोज लाए हैं. आज एक कविता रोज़ में पढ़िए इसे ही...

कासी

बनिया ठाकुर तेली पासी सबको रोज़ बुलाये कासी रांड सांड सीढ़ी सन्यासी इनसे बचे सो आये कासी इसको उसको भाये कासी क्या-क्या खेल दिखाये कासी राम-घाट से असी-घाट तक सबको भंग पिलाये कासी मणिकर्णिका-घाट निशि-वासर मृतक मनुष्य जलाये कासी कासी का विकास कासी है काहे को घबराये कासी आसमान में उड़नहार को झट धरती पर लाये कासी जिसको आना हो आये पर सोच-समझ कर आये कासी ***

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