साइंसकारी: आपकी गाड़ी के पेट्रोल में ब्लेंड होने वाला Ethanol कैसे बनता है?
भारत में पेट्रोल के साथ ब्लेंड होकर मिलता है Ethanol. ये ब्लेंडेड फ्यूल इस्तेमाल करके देश का इंपोर्ट बिल और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करने का इरादा है. इसलिए गन्ने, चावल, मकई से लेकर काई (शैवाल) तक से Ethanol को बनाया जा रहा है.

अमेरिका, चीन, ब्राजील और भारत. विश्व की चार बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और इनके डिवेलपमेंट के सामने एक चैलेंज—क्लाइमेट चेंज. एक कॉमन सल्यूशन जिस पर ये चारों देश अलग-अलग टेक्नॉलजी के साथ जुटे हैं- Ethanol.
दुनिया में एनर्जी रिलेटेड जितना कार्बनडायऑक्साइड एमिशन होता है, उसका करीब एक-चौथाई ट्रांसपोर्ट सेक्टर से होता है. नेट जीरो के वादे को पूरा करने के अलावा यहां एक पेच और फंस जाता है. पेट्रोल बनता है क्रूड ऑइल से. भारत 85% क्रूड ऑइल इंपोर्ट करता है. इसमें लगता है रोकड़ा. बहुत सारा रोकड़ा.
मगर गाड़ियां तो चलानी ही हैं. घोड़ा-गाड़ी पर लौटना तो पॉसिबल नहीं है. ये जरूर पॉसिबल है कि जो GHG एमिशन फैला रहा है, उसको टाटा-बाय-बाय कर दिया जाए. यानी पेट्रोल की जगह फ्यूल लगे- एथेनॉल.
ऐसा किया तो एक तीर से दो-तीन निशाने हो जाएंगे. GHG एमिशन और पेट्रोल बिल घट गया तो बल्ले-बल्ले, प्लस वॉर टाइप सिचुएशन में जो पेट्रोल की सप्लाई-चेन अटक जाता है, वो भी नहीं होगा.
ये सब सोच-साच के मिलेनियम की शुरुआत में ही भारत ने तय कर लिया था कि एथेनॉल को काम पर लगाया जाएगा. 2003 में एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम लॉन्च भी कर दिया गया. अब 23 साल बाद E5, E10, E20 से होते हुए E85 और E100 का दौर आ चुका है. साथ में लटक लेती हैं कई चुनौतियां भी.
एथेनॉल को बनाने की प्रोसेस में जो चुनौतियां आती गईं, उन्हें सॉल्व करते हुए एक के बाद दूसरी जेनरेशन्स आती गईं. और अमेरिका, चीन, ब्राजील के साथ भारत इन अलग-अलग जेनरेशन्स का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है.
एथेनॉल की जरूरत क्यों पड़ी?कोई भी फ्यूल होता है, उसका काम होता है गरमी पैदा करना. एलपीजी जलती है, गैस स्टोव में फ्लेम बनती है. लकड़ी-कोयला जलता है, गरमी बनती है. वैसे ही इंजन के अंदर पहले फ्यूल कंप्रेस होता है, फिर उसमें स्पार्क दिया जाता है. फ्यूल जलता है, गरमी पैदा होती है. इसके प्रेशर से पुर्जे मूव करते हैं और गाड़ी चलती है.
फ्यूल पेट्रोल हो तो भी ऐसा होता है, एथेनॉल हो तो भी और दोनों मिक्स हों तो भी. ये बात सही है कि पेट्रोल-डीजल माइलेज ज्यादा देते हैं, यस, देते हैं. इंजिन के पार्ट्स को खराब नहीं करते, यस. एथेनॉल की तुलना में बार-बार टैंक भी नहीं भराना पड़ता, यस. बट, एथेनॉल की तुलना में ग्रीन हाउस गैस एमिशन ज्यादा करते हैं? हां. दुनिया में कहीं कुछ हो तो इनके दाम उछलने लगते हैं? हां इंपोर्ट बिल बढ़ाते हैं? हां.
कैसे बनता है एथेनॉल?एथेनॉल या ethyl alcohol कई चीजों से बनता है, बन सकता है. अमेरिका में ज्यादातर मक्के से, भारत में अभी तक ज्यादातर गन्ने से बनता रहा है. अब फोकस चावल से बनाने पर शिफ्ट हो गया है. गेहूं-चावल के खेत की पराली से भी एथेनॉल बनता है. ब्राजील इसमें मास्टर हो चुका है. और चीन अलग ही चाल चल रहा है, algae होती है, काई या शैवाल, उससे बायोफ्यूल बनाए पड़ा है. सोर्स कोई भी हो, बेसिक्स सेम रहते हैं.
कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं? वही जो फिटनेस इंफ्लुएंसर्स डाइट में से काटने को कहते हैं. चावल भिगाते हैं तो माड़ निकलता है, स्टार्च. वो भी कार्ब है. चीनी में भी कार्ब है. हम कार्ब से भरी दुनिया में 90 ग्राम प्रोटीन इनटेक पूरा करने में ख़त्म हुए जा रहे हैं. दुनिया का कारोबार कार्ब से चल रहा है. इससे बनता है एथेनॉल. एकदम बेसिक तरीके से कहें तो शुगर, स्टार्च को सड़ाया जाता है, यानी fermentation होता है, तो एथेनॉल बन जाता है.
बायोफ्यूल की पहली जेनरेशन होती है जब खाने-पीने की चीज से एथेनॉल बनाया जाए. जैसे गन्ना, चावल, मकई टाइप.
पहले गन्ने का जूस निकाल लेते हैं. अब अगर इससे शक्कर बनानी है तो वो बना ली जाती है. उस प्रोसेस में जो बचता है गाढ़े रंग का, उसको molasses कहते हैं. अब या तो इसी molasses में या सीधा गन्ने के रस में मिला देते हैं yeast. वही, खमीर– एन्जाइम का झोंका!
बचपन में देखा था, दही, ब्रेड, भटूरे में पड़ता था. बड़ी शरारत करता था! तो ये ख़मीर एन्जाइम का काम करता है. इसको एक तरह से कैंची समझ लीजिए जो इन कार्ब्स को काट देती है. और निकलता है एथेनॉल.
मगर अभी ये लिक्विड गाड़ी में डालने लायक नहीं बना है. पहले इसको बॉइल करते हैं ताकि पानी निकल जाए. बॉइल करने से करीब 95% कंसंट्रेशन वाला एथेनॉल बचता है. अभी भी जो पानी बच गया है उसको निकालने के लिए एक खास छन्नी लगती है. Molecular sieve. इसमें इतनी कम जगह होती है कि पानी का मॉलिक्यूल इससे आर-पार हो जाता है और एथेनॉल अटक जाता है. जैसे चाय छानते वक्त चाय निकल जाती है, पत्ती रह जाती है.
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यानी एथेनॉल में पानी बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए. ये पानी में पूरी तरह घुल जाता है. फ्यूल टैंक में भी अगर नमी पहुंच जाए तो ईंधन के तौर पर एथेनॉल कम इफेक्टिव रह जाता है. प्लस इंजिन में जंग भी लग सकती है. इसी की शिकायतें आ रही हैं, खंडन हो रहे हैं, आपने सुना होगा.
गन्ने, चावल वगैरह से एथेनॉल बनाने में पानी का ही संकट सबसे ज्यादा होने लग रहा है.
एक लीटर एथेनॉल बनाने में जितना चावल लगता है, उसको उगाने में ही 10 हजार लीटर पानी लग जाता है. गन्ना भी भारत में ऐसी-ऐसी जगहों पर उगाया जाता है जहां पानी की किल्लत रहती ही है. इसको भी एथेनॉल बनाने में डायवर्ट कर दें तो पानी, पैसा सब क्राइसिस मोड में जा सकता है.
ऊपर से, MSP के चक्कर में ये फसलें वैसे ही किसानों की पहली पसंद रहती हैं. इनकी डिमांड एथेनॉल के चक्कर में बढ़ने लगी तो अलग दिक्कत. पैसे का चक्कर बाबू भइया.
वैसे, कई बार ऐसा होता है कि गोदामों में पड़े-पड़े ये अनाज सड़ने लगते हैं. फिर ये मंडी में जाने लायक तो बचते नहीं है. ऐसे में इनसे एथेनॉल बनाने से किसानों की आमदनी भी हो जाती है और अनाज बेकार भी नहीं जाता. मगर फिलहाल जल संकट और खाद्य सुरा सबसे बड़े रेड फ्लैग्स हैं.
यहां एंट्री होती है सेकंड जेनरेशन एथेनॉल की. फसलों में स्टार्च, शुगर तो होता है, मगर सिर्फ अनाज में नहीं. फसल की कटाई के बाद बचती है पराली. बेसिकली किसी पौधे के वो हिस्से जिनमें cellulose होता है. इससे कार्ब्स निकाले जाते हैं. और फिर वही, एन्जाइम ऐड करके एथेनॉल बना लिया जाता है. ब्राजील ने इसका मस्त ईकोसिस्टम क्रिएट कर रखा है. अपने यहां भी पानीपत और नुमालीगढ़ में इसके लिए दो रिफाइनरीज़ काम कर रही हैं.
इससे एक बड़ा फायदा और होता है कि किसान जो पराली जलाने लग जाते थे, वो उसको यहां बेच देते हैं. वो वाला पल्यूशन भी नहीं होता फिर. दिल्ली वालों का एयर प्यूरीफायर और N95 मास्क का खर्चा बच जाता. खैर!
जब ये ऑप्शन है तो फिर क्यों गन्ना-चावल लगाना है? पराली से बना लेना चाहिए. बना तो लेना चाहिए, पर वही ढाक के तीन पात. इतना आसान नहीं होता है ना.
पराली में cellulose के साथ और भी चीजें चिपकी रहती हैं. उनसे हमें मतलब नहीं है. बस एक स्टेप और बढ़ जाती है. पहले cellulose को अलग करना पड़ता है एसिडिक सल्यूशन डालकर. मान लीजिए स्टार्च किसी ताले में बंद है. पहले ये ताला तोड़ा जाएगा, फिर स्टार्च निकल पाएगा. फिर इतनी ज्यादा पराली होती भी नहीं है कि सिर्फ उससे बने एथेनॉल से काम चल जाए. प्लस खेतों से बचा-कुची पराली प्लांट्स तक पहुंचाना भी अलग ही चैलेंज है.
फिलहाल भारत फर्स्ट और सेकंड जेनरेशनs से ज्यादातर एथेनॉल बना रहा है. यानी अनाज और फसलों के non-food हिस्सों से. वहीं, चीन पहुंच चुका है तीसरी जेनरेशन पर.
खेत-वेत छोड़कर उसने रुख किया है तालाबों की तरफ. यहां उगती है algae. एल्गी, वही लिंकन मेमोरियल रिफ्लेक्टिंग पूल वाली जिससे ट्रंप बहुत परेशान हैं. नीला पेंट करके भी मुक्ति नहीं पा रहे हैं. खैर जब चीन ने एल्गी की ओर रूख किया तो एथेनॉल बनाने के लिए खेती की जमीन की जरूरत ही खत्म होती दिखी.
कई जगहों पर इसको seaweed की शक्ल में सागर किनारे भी उगाया जाता है. Algae के केस में भी पहले उसको ऐसिड से ट्रीट किया जाता है. इसके सेल्स को तोड़ा जाता है ताकि स्टार्च वगैरह एक्सपोज हो सके. बाकी फिर सेम, एन्जाइम से फरमेंटेशन और कार्ब्स एथेनॉल में कन्वर्ट हो जाते हैं.
भारत में भी इस टेक्नोलॉजी को एक्सप्लोर किया जा रहा है वैसे. चीन ने इसको कई तरह से डिप्लॉय कर रखा है. जो हरी Algae होती है, वो फोटोसिंथेसिस करती है. प्रकाश संश्लेषण माने सूरज की रोशनी में कार्बनडायऑक्साइड को सोखना और कार्ब्स की शक्ल में स्टोर कर लेना. तो एक तो ये CO2 को सोखकर हवा को साफ करती है. प्लस, इंडस्ट्रियल एरियाज में पानी से न्यूट्रियंट्स लेकर पानी को भी साफ करती है. एथेनॉल तो बना ही रही है.
बायोफ्यूल बनाने की चौथी जेनरेशन में एंट्री हो जाती है जेनेटिक मॉडिफिकेशन की. यहां Algae, bacteria, yeast वगैरह को और ज्यादा efficient बना दिया जाता है. ये मॉडिफिकेशन ज्यादा CO2 सोखने, ज्यादा बायोमास, ज्यादा sugar बनाने के टारगेट के साथ किया जाता है. एक तरह से कच्चा माल बढ़ा लिया जाता है. कई जगहों पर मेन फोकस CO2 को सोखने पर रहता है. यानी हवा से ज्यादा से ज्यादा कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन करके algae प्रोडक्शन पर फोकस रहता है.
हां, ये जरूर है कि जेनेटिक मॉडिफिकेशन का प्रोसेस भी कम कॉम्प्लिकेटेड तो है नहीं. प्लस महंगा तो है ही. अभी ज्यादा देशों में ये एक्सपेरिमेंटल स्टेजेस में ही है.
एथेनॉल नहीं तो और क्या?एथेनॉल के अपने साइड-इफेक्ट्स भी हैं. यही वजह है कि साइंस हमेशा एक कदम आगे की तैयारी में जुटी रहती है. पेट्रोल डीजल को रिप्लेस करना हो तो और रास्ता क्या हो सकता है?
जैसे पेट्रोल के साथ एथेनॉल की ब्लेंडिंग हो रही है, वैसे ही डीजल के साथ आइसोब्यूटनॉल को ब्लेंड करने की तैयारी भी है.
ये भी एक अडवांस्ड बायोफ्यूल है. बनता एथेनॉल की तरह ही है, मगर फ्यूल एफिशेंसी इसकी एथेनॉल से ज्यादा है. प्लस एथेनॉल जो इंजन के हिस्सों को क्षरण कर सकता है, आइसोब्यटनॉल में उतना नहीं होता. थोड़ा बहुत भले हो.
पर इसको डीजल में मिलाने की तैयारी है, पेट्रोल फिलहाल एथेनॉल के साथ ही बंधा है. पेट्रोल के साथ ब्लेंड करने के लिए मेथनॉल भी एक ऑप्शन है. मगर उसकी एनर्जी डेंसिटी एथेनॉल से कम है और क्षरण की पॉसिबिलिटी ज्यादा है. उसके इस्तेमाल के लिए इंजन को और ज्यादा मॉडिफिकेशन की जरूरत होगी. तो फिलहाल ए ही बेस्ट बेट है.
वैसे ट्रांसपोर्ट सेक्टर में कार्बन एमिशन घटाना है तो फ्यूल बदलने के अलावा और भी रिफॉर्म्स लाने पड़ेंगे. पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुधारना होगा, सड़कें सुधारनी होंगी, शहरों का लेआउट सुधारना पड़ेगा.
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