सोने के दाम देते रहते हैं झटका, हीरे की तरह इसे लैब में क्यों नहीं बनाते वैज्ञानिक?
सोना दुनिया की सबसे कीमतों चीजों में से एक होता है. ये ऐसी धातु है जिसकी अहमियत संस्कृति से लेकर अर्थव्यवस्थाओं तक में रहती है. मगर सोना इतना बहुमूल्य क्यों होता है? कभी खराब क्यों नहीं होता और क्या वैज्ञानिक इसको लैब में बना सकते हैं?

“देशहित में हमको ये तय करना पड़ेगा कि साल भर तक घर में कोई भी फंक्शन हो, कोई भी कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं खरींदेगे. हम सोना नहीं खरीदेंगे.’’
कुछ वक्त पहले पीएम मोदी ने लोगों से ये अपील की थी कि देशहित में सोना न खरीदें. संकट के वक्त में देश का पैसा बचाना है. इसलिए पीएम ने लोगों के नाम ये संदेश दे दिया.
कहीं कुछ भी हो रहा हो, देश में सोने के दाम बढ़ जाते हैं. रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, सोने के दाम बढ़ गए. ट्रंप ने टैरिफ लगाए, सोने के दाम बढ़ गए. त्योहार का सीजन आया, सोने के दाम बढ़ गए. शादी का सीजन आया, सोने के दाम बढ़ गए.
इतना अनप्रेडिक्टेबल तो UPSC का पेपर नहीं होता, जितनी सोने की कीमत. बट, जैसे UPSC निकालने का भूत आसानी से पीछा नहीं छोड़ता, वैसा ही होता है सोने का क्रेज.
कोई कल्चर हो, कोई रिलीजन हो, कोई इकॉनमी हो- सोना हर जगह एक अहम रोल में रहता है. कोई शुभ मानता है, कोई सेफ, और कोई स्टेटस सिंबल. बेसिकली सारी खुदाई एक तरफ, सोने की नवाबी एक तरफ.
मगर क्यों? सोने में ऐसा क्या है, जो किसी में नहीं है, हीरे में भी नहीं है? मतलब हीरा तो सदा के लिए होता है. महंगा भी होता है. और अब तो लैब में भी बन जाता है. सोना लैब में क्यों नहीं बना लेते?
आपको पता है, आपके हाथ की अंगूठी में लगा सोना, यूनिवर्स के किसी कोने में कभी चमक रहे एक सितारे का टुकड़ा है.
सोना इतना बहुमूल्य क्यों होता है?हजारों साल पहले की मेसोपोटामियन सभ्यता हो या सिंधू घाटी सभ्यता, सोने की कहानियां इतिहास में दर्ज हैं. करीब 8वीं शताब्दी में भारत में केमिस्ट्री के स्कॉलर हुए आचार्य नागार्जुन. उन्होंने जो रसरत्नाकर ग्रंथ लिखा, उसमें सोने के एक्सट्रैक्शन और प्यूरिफिकेशन के बारे में भी बताया.
सिंधु घाटी सभ्यता की कई जगहों पर लोग जो दफनाए गए थे, उनके साथ भी सोने का कुछ-कुछ सामान मिला है, कहीं जेवर हैं, कहीं बस मोती हैं. पर हैं. माने सोना कल्चर के लिहाज से भी बहुमूल्य हमेशा से रहा है, ऐसा मान सकते हैं.
इसके पीछे एक वजह तो होती है, कि सोना खराब नहीं होता. चांदी की तरह काला नहीं पड़ता, लोहे की तरह जंग नहीं खाता. सालों साल रखा रहेगा, जैसे का तैसा. इसीलिए इकॉनमीज भी इस पर rely करती हैं, कि डॉलर गिर जाएगा, शेयर्स डूब जाएंगे पर सोने की खुद की वैल्यू कम नहीं होगी.
ये सारी बातें तो हो गईं तारीख और खर्चा पानी के डोमेन के. अपन फोकस करते हैं साइंसकारी पर.
क्यों नहीं खराब होता है सोना?जितने एलिमेंट्स होते हैं, उनकी बेसिक यूनिट, यानी सबसे छोटी फंक्शनल इकाई होते हैं ऐटम या परमाणु. ऐटम के सेंटर में न्यूक्लियस के अंदर प्रोटॉन और न्यूट्रॉन होते हैं. और इनका चक्कर काट रहे होते हैं इलेक्ट्रॉन. ये सारी कहानी इसलिए बता रहे हैं क्योंकि इन्हीं सब के डिस्को के चक्कर में मेटल्स खराब हो जाते हैं यानी क्षरण हो जाता है.
बेसिकली ये जो प्रोट्रॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन की तिकड़ी है, ये एक-दूसरे से कितनी पास-कितनी दूर है, इससे डिसाइड होता है कि कोई मेटल कितना रिएक्टिव होगा. आप अपना गांव, शहर छोड़कर बाहर कहीं रहने लगते हैं, तो जाने-अन्जाने नए चाल-ढाल को अपना लेते हैं.

वैसे ही, इलेक्ट्रॉन अगर न्यूक्लियस से ज्यादा दूर हों, दोनों के बीच फोर्स कम हो, और बाहर से कोई दूसरा एलिमेंट आ जाए, तो ये बावन गज का दामन पहन मटक चलते हैं. यानी नए एलिमेंट से रिएक्ट कर जाते हैं और चेंज हो जाते हैं. ऐसे एलिमेंट्स को कहते हैं रिएक्टिव एलिमेंट्स. जैसे लोहे पर जंग लगना.
अब अगर यही दूरी कम हो, फोर्स ज्यादा हो, तो बाहर से कोई कितना ही खटकाए, ये कुंडी नहीं खोलते. यानी आसानी से रिएक्शन नहीं होता. इन्हें इनर्ट कहते हैं. जैसे गोल्ड.
गोल्ड में होते हैं 79 इलेक्ट्रॉन और 79 प्रोटॉन. बाहर वाले इलेक्ट्रॉन्स पर न्यूक्लियस की अच्छीखासी पकड़ होती है. इसलिए इन इलेक्ट्रॉन्स को तोड़ना आसान नहीं होता है. इसलिए हवा या नमी से ये खराब नहीं होता. ये जो रिएक्ट न करने की प्रॉपर्टी है, इसकी अपनी अलग ही इंपॉर्टेंस है.
नैनो स्केल पर गोल्ड काम करता है catalyst के तौर पर. यानी कई बार इसको ऐसे केमिकल रिएक्शन्स में इस्तेमाल किया जाता है, जहां ये बस रिएक्शन को ज्यादा तेज या स्मूद बनाता है, खुद चेंज नहीं होता. मगर क्योंकि गोल्ड ज्यादा रिएक्ट करता ही नहीं है, तो catalyst के तौर पर थोड़ा लिमिटेड इस्तेमाल हो पाता है.
21 मई, 2026 को अमेरिकन फिजिकल सोसायटी की फिजिकल रिव्यू जर्नल में एक पेपर पब्लिश हुआ. संतू बिस्वास और मैथ्यू एम मॉन्टिमोर का. ये साइंटिस्ट बेसिकली ये देखना चाहते थे कि ऐसा क्यों है कि गोल्ड ऑक्सिजन के साथ ज्यादा रिएक्ट नहीं करता है. इस स्टडी में पाया गया कि गोल्ड के ऐटम्स सर्फेस पर खुद को ऐसे अरेंज करते हैं कि ऑक्सिजन दरवाजे पर आए तो रिएक्शन आसानी से ना हो.
जैसे मानिए लोहा है. वो जब ऑक्सिजन से इंटरैक्ट करेगा तो ऑक्सिजन के मॉलिक्यूल O2 को एक-एक ऐटम में ब्रेक डाउन कर देगा. और फिर ये सिंगल ऐटम मेटल के साथ ही रेडी टू मिंगल हो जाता है. ऑक्सिजन लोहे से एक इलेक्ट्रॉन खींचकर उसे ऑक्सिडाइज कर देता है. ऐसे लगती है लोहे पर जंग.
सोने के केस में क्या होता है, सोने के ऐटम्स खुद को hexagonal पैटर्न में रीअरेंज कर लेते हैं. इससे सर्फेस बंपी हो जाता है और ऐटम्स टाइटली पैक्ड हो जाते हैं. ऑक्सिजन इनसे रिएक्ट नहीं कर पाती. इसलिए सोने के नैनोपार्टिकल्स catalyst के तौर पर बेहतर काम कर पाते हैं, क्योंकि वहां ये hexagonal पैटर्न अच्छे से नहीं डिवेलप कर पाते.
यानी अटॉमिक नंबर और ऐटम्स का अरेंजमेंट एक बड़ा रीजन हैं, जिसकी वजह से सोने की चमक फीकी नहीं पड़ती.
सोना बहुमूल्य इसलिए भी माना जाता है क्योंकि दुर्लभ एलिमेंट्स में से एक है. अभी तक दुनिया में 2.5-3 लाख टन सोना इस्तेमाल हो चुका है. इसमें से 45% हिस्सा जेवर बनाने में, 22% बार्स में और 17% सेंट्रल बैंकों में गया है. फिर कंप्यूटर, कम्यूनिकेशन इक्विपमेंट, स्पेसक्राफ्ट, जेट एयरक्राफ्ट इंजिन वगैरह में इस्तेमाल होता है. ये तो वो है जो इस्तेमाल हो चुका है. 60 हजार टन से ज्यादा इस्तेमाल करने लायक सोने के रिजर्व्स हैं.
यानी अभी जो टेक्नॉलजी हमारे पास है, उसके इस्तेमाल से इतना सोना माइन किया जा सकता है. प्लस करीब डेढ़ लाख टन गोल्ड रिसोर्सेज हैं. इनमें से कितना माइन किया जा सकता है, ये अभी देखा जाना है.
मजे की बात ये है कि ज्यादातर सोना ऐसी जगह है जहां से निकाल पाना इंपॉसिबल है.
जियॉलजिस्ट्स का मानना है कि 99% सोना असल में धरती की कोर में, यानी सतह से करीब तीन हजार किलोमीटर नीचे छिपा है. अगर ये किसी तरह सतह पर निकाल आए, तो पूरी धरती पर करीब आधा मीटर मोटी सोने की परत बिछ सकती है.
असल में, जब धरती बन रही थी, तब सारे एलिमेंट्स पिघले हुए थे. सोना होता है हेवी मेटल, तो ये अंदर बैठ गया. बाद में धरती काफी सॉलिड हो चुकी थी. तब Meteors यानी उल्कापिंडों की बारिश अपने साथ और सोना लेकर आई और ये क्रस्ट में, यानी सबसे बाहर वाली लेयर में, जमा हो गया. यानी ज्यादातर जो extract किया जाता है, वो उल्कापिंडों के सहारे बाद में आया है. धरती के अंदर की गरमी इसको पिघलाकर बाहर फेंक देती है और ये क्रैक्स में जमा हो जाता है.
सोने का दुर्लभ होना तो इसको बहुमूल्य बनाता है बट उससे भी ज्यादा माइंड ब्लोइंग है वो प्रोसेस जिससे गोल्ड बना है.
सोना धरती पर कहां से आया?हमारे ब्रह्मांड में जितने सितारे हैं, उनकी कोर में चलता रहता है न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्शन. यानी दो हल्के न्यूक्लियाई आपस में चिपकककर एक भारी न्यूक्लियस बनाते हैं. जैसे हाइड्रोजन के न्यूक्लिाई जुड़कर हीलियम. एक पॉइंट ऐसा आता है जब न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्शन की गुंजाइश नहीं रह जाती. तब सितारे की खुद की ग्रैविटी के असर से सितारे की कोर collapse हो जाती है. तब एक भयानक explosion होता है- सुपरनोवा और सितारा Neutron Star बन जाता है.
कभी ऐसा भी होता है कि दो Neutron Stars लाखों-करोड़ों साल तक एक-दूसरे का चक्कर काटते हुए आपस में टकरा जाते हैं. इस टक्कर से निकलता है न्यूट्रॉन्स सूप. ये न्यूट्रॉन्स न्यूक्लियाई से मिलकर ताबड़तोड़ नए ऐटम बनते हैं. मिलिसेकंड्स के अंदर तैयार हो जाता है सोना.
साल 2017 में दो न्यूट्रॉन स्टार्स की टक्कर- किलोनोवा को ऑब्जर्व किया गया था. इस दौरान धरती के mass से 10 गुना ज्यादा सोना बना होगा, ऐसा साइंटिस्ट्स ने एस्टिमेट लगाया था.
ये तो हमने जान लिया कि सोना आया कहां से है. हमारा इंटरेस्ट तो ये जानने में है कि जैसे हीरे लैब में बनाए जा सकते हैं, क्या सोना भी बन सकता है?
क्या लैब में बन सकता है सोना?कितना सही हो जाएगा ना? हो तो जाएगा मगर जो चीज सितारों में बन रही है, उसको लैब में बनाना इतना आसान तो नहीं होगा. फिर भी कई बार ऐसी कोशिशें हो चुकी हैं.
1941 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में रबी शेर और केनेथ बेनब्रिज ने ऐसा कर भी लिया. तब उन्होंने mercury या पारे की मदद से सोना बनाया था. मगर ये काफी रेडियोऐक्टिव था या कहें अनस्टेबल था.
फिर 1980 में लॉरेंस बर्कली नेशनल लैब में ग्लेन सीबोर्ग ने भी बिस्मथ के कई ऐटम्स से गोल्ड बनाने की कोशिश की, लेकिन इसमें रेडियोऐक्टिव वाली समस्या आ गई. दोनों ही एक्सपेरिमेंट्स में किसी और एलिमेंट से प्रोटॉन निकालकर सोना बनाने की कोशिश की गई थी.
2025 में CERN ने बताया कि ALICE प्रोग्राम ने भी सोना बनाया है. ALICE यानी A Large Ion Collider Experiment. आपको याद होगा शायद, हिग्स बोसॉन या गॉड पार्टिकल की खोज के लिए लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर शुरू किया गया था. ये उसी से जुड़ा है.
यहां बेसिकली nuclei को टकराया जाता है और देखा जाता है क्या बन रहा है. वो पता ये लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि बिग बैंग के फौरन बाद, ब्रह्मांड में क्या होता है?
2025 की मई में ALICE ने बताया लेड या सीसे के न्यूक्लियाई को बेहद हाई एनर्जी पर एक दूसरे टकराया गया. इससे ऐसा एक प्लाज्मा का सूप तैयार हुआ, जिससे मिलता जुलता मटीरियल बिग बैंग के बाद बना था.
इस प्लाज्मा सूप के अंदर ज्यादातर न्यूक्लियाई बिना एक-दूसरे से टकराए, करीब से ही निकल जा रहे थे. इनकी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड्स इतनी तगड़ी थीं कि इंटरैक्शन होने पर 3 प्रोटॉन्स न्यूक्लियस छोड़कर बाहर निकल पड़े. लेड का अटॉमिक नंबर होता है 82. यानी तीन प्रोटॉन रिलीज करके ये बन गया गोल्ड.
ALICE के अनेलिसिस में देखा गया कि 2015–2018 के बीच LHC में Run 2 के दौरान 86 अरब गोल्ड न्यूक्लियाई बनाए गए. Run 3 में इसके दोगुने. मगर फिर भी अगर जेवर बनाना हो इससे तो इससे भी कई अरब गुना ज्यादा की जरूरत होगी. ये सारे ऑब्जर्वेशन्स लैब एक्सपेरिमेंट के तौर पर तो सक्सेसफुल कहे जा सकते हैं, मगर इनसे इस्तेमाल लायक सोना शायद ही बन पाएगा. पूरा प्रोसेस इतना महंगा पड़ेगा कि फायदा नहीं होगा.
और खैर, लैब में बन भी जाएगा तो उसकी वो बात शायद ही हो. प्लेनेटरी साइंटिस्ट और कम्यूनिकेटर कार्ल सेगन ने कहा था We are made of star stuff. हम सितारों से ही बने हैं. ब्रह्मांड के बनने के साथ, धरती के बनते वक्त, सितारों के टूटने से, धरती पर उल्कापिंडों के आने से, इस तरह जो सोना बनता है, वो कहीं ना कहीं यूनिवर्स के साथ जुड़े हमारे तार की बानगी है.
वीडियो: साइंसकारी: क्या लैब में सोना बना सकते हैं?

