DMK ने तमिलनाडु को 10 लाख करोड़ के कर्ज में छोड़ा? CM विजय के इस दावे में कितनी सच्चाई है
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक, तमिलनाडु की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है. वित वर्ष 2025 के आखिर में राज्य की बकाया देनदारी 9.56 लाख करोड़ रुपये थी. यह दूसरे किसी भी राज्य से ज्यादा है. TVK चीफ विजय ने इसके लिए पिछली DMK सरकार को जिम्मेदार बताया है.

अगस्त 2021. तमिलनाडु में AIADMK को हराकर DMK की सरकार बनी. सरकार में वित्त मंत्री बने पी. थियागा राजन. तीन महीने बाद उन्होंने तमिलनाडु की आर्थिक हालत पर एक व्हाइट पेपर जारी किया. इसमें कहा गया कि राज्य का खजाना खाली है. इसके लिए उन्होंने 10 साल सत्ता में रही AIADMK को जिम्मेदार बताया.
कट टू मई 2026. तमिलनाडु में DMK सत्ता से बाहर हो गई है. TVK पार्टी के चीफ सी. जोसेफ विजय मुख्यमंत्री बने हैं. सरकार बनते ही विजय ने भी व्हाइट पेपर लाने की बात कही है. साथ में उन्होंने डीएमके पर राज्य को 10 लाख करोड़ रुपये के कर्ज में छोड़ने का आरोप लगाया.
इन आरोपों के मद्देनजर चलिए तमिलनाडु के आर्थिक हालात पर एक नजर डाल लेते हैं.
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक, तमिलनाडु की फाइनेंशियल हालत अच्छी नहीं है. वित्तीय वर्ष 2025 के आखिर में राज्य की बकाया देनदारी 9.56 लाख करोड़ रुपये थी. यह भारत में दूसरे किसी भी राज्य से ज्यादा है. लेकिन दूसरी तरफ तमिलनाडु देश में सबसे तेजी से विकास करने वाला राज्य भी है. वित्त वर्ष 2026 में राज्य की ग्रोथ रेट 10.8 प्रतिशत रही है. वहीं वित्त वर्ष 2025 में ये 11.2 फीसदी थी.
तेज विकास कर रहे राज्यों के पास ज्यादा कर्ज लेने की भी क्षमता होती है. क्योंकि कर्ज चुकाने की उनकी क्रेडिबिलिटी भी ज्यादा होती है. तमिलनाडु का पूरा कर्जा वित्त वर्ष 2025 में राज्य की जीडीपी का 30.6 प्रतिशत था. ये वित्त वर्ष 2022 से लगातार घट रहा है. 2022 में राज्य की कुल देनदारी 32.2 फीसदी थी. इससे पहले वित्त वर्ष 2021 में कोरोना महामारी के चलते ये 26.5 फीसदी से बढ़कर 31.8 फीसदी हो गई थी.
डीएमके के व्हाइट पेपर में क्या था?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2021 में DMK के व्हाइट पेपर में भी राज्य की खराब आर्थिक स्थिति का जिक्र किया गया था. इस वक्त भी तमिलनाडु सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाला राज्य था. यानी विजय ने जिस 10 लाख करोड़ रुपये के कर्ज का जिक्र किया है वह केवल पिछली DMK सरकार की देन नहीं है. इसमें उनसे भी पहले की सरकारों का योगदान है.
16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट में भी इस ओर इशारा किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2012 में नॉर्थ ईस्ट और पहाड़ी राज्यों को छोड़कर बाकी राज्यों में तमिलनाडु जीडीपी के अनुपात में सबसे कम कर्ज लेने वाले राज्यों में दूसरे नंबर पर था. लेकिन साल 2021 तक ये कर्ज राज्य के कुल जीडीपी के 31 प्रतिशत तक पहुंच गया.
कोविड से जुड़े खर्चे ने सभी राज्यों के कर्ज में बढ़ोतरी की है. लेकिन इसके अलावा तमिलनाडु के कर्ज का एक बड़ा कारण फिक्स्ड खर्च है, जो पेंशन, वेतन और पिछले कर्ज का ब्याज चुकाने में लगता है. PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च ने अक्टूबर, 2025 में राज्यों की आर्थिक हालत की एक स्टडी की थी. इसके मुताबिक, तमिलनाडु उन पांच राज्यों में शामिल है जो वित्त वर्ष 2026 में अपने राजस्व का 60 प्रतिशत से ज्यादा वेतन, पेंशन और ब्याज चुकाने पर खर्च करते हैं. इस लिस्ट में हिमाचल प्रदेश 83 फीसदी के साथ पहले नंबर पर है. वहीं पंजाब 74 फीसदी के साथ दूसरे, केरल 69 फीसदी के साथ तीसरे, तमिलनाडु 62 फीसदी के साथ चौथे और असम 61 फीसदी के साथ पांचवें नंबर पर है.
मुफ्त बिजली से खजाने पर प्रेशरइन फिक्स्ड मामलों में सरकारें जितना ज्यादा खर्च करती हैं, उतना ही स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विषयों पर कम खर्च कर पाती हैं. इस रेफरेंस में विजय की ओर से हर दो महीने में 200 यूनिट मुफ्ट बिजली देने का वादा भी महत्वपूर्ण हो जाता है. इससे खजाने पर हर साल 1,730 करोड़ रुपये का खर्च आएगा.
मामला मुफ्त बिजली देने भर का नहीं है. TVK ने हर परिवार की एक महिला को हर महीने 2500 रुपये, हर परिवार को साल में छह मुफ्त सिलेंडर और 10 लाख बेरोजगार ग्रेजुएट्स को हर महीने 4 हजार रुपये देने का वादा किया है. विजय के इन वादों को पूरा करने में सालाना लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का खर्चा आने वाला है. इससे पहले साल 2025-26 में DMK ने वेल्फेयर स्कीम्स और सब्सिडी बांटने में 65 हजार करोड़ रुपये खर्च किए थे. विजय की घोषणाओं पर आने वाली सालाना लागत इससे लगभग 52 फीसदी ज्यादा है.
तमिलनाडु की वित्तीय स्थिति में सुधार करना बेहद जरूरी है. क्योंकि राज्य की आबादी बूढ़ी हो रही है. RBI की एक स्टडी के मुताबिक, साल 2026 तक केरल और तमिलनाडु के 'वृद्धावस्था श्रेणी' (Ageing Category) में पहुंचने की संभावना है. ये ऐसी स्थिति है, जिसमें किसी राज्य की 15 फीसदी से ज्यादा आबादी 60 साल से ज्यादा उम्र की होती है.
रिजर्व बैंक के आकलन के मुताबिक 'Ageing Category' से जूझ रहे राज्यों को सोशल सेक्टर में काफी ज्यादा खर्च करना पड़ता है, जिसके चलते राजकोषीय घाटा बढ़ता है. इससे निपटने के लिए RBI ने एक व्यापक स्ट्रेटजी बनाने की जरूरत पर जोर दिया है.
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