TMC के बागी सांसदों की सदस्यता जाएगी? जानिए दल-बदल कानून क्या कहता है
TMC Merger in NCPI: तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने अपनी पार्टी छोड़ कर NCPI में विलय करने का ऐलान किया है. इसपर लोकसभा के सभापति ओम बिरला का फैसला आना बाकी है. दल-बदल कानून को लेकर बहस छिड़ गई है. क्या कहता है कानून?

TMC के 20 सांसदों ने पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने का ऐलान कर दिया है. लेकिन क्या संसद में उनकी कुर्सी भी जा सकती है? यही इस वक्त सबसे बड़ा सवाल है. अलग-अलग एक्सपर्ट इस पर अलग-अलग राय दे रहे हैं. उनके राय संविधान, नियम-कानून और पुराने अदालती फैसलों पर आधारित हैं. लेकिन राय जानने से पहले बैकग्राउंड समझ लेते हैं.
ममता बनर्जी की पार्टी ‘Trinamool Congress’ ने 2024 चुनाव में 28 लोकसभा सीटें जीती थीं. मगर इन 28 में से 20 सांसदों ने अब ‘Nationalist Citizens Party of India यानी NCPI में विलय का ऐलान कर दिया है. जिसके बाद उन्होंने लोकसभा स्पीकर ‘ओम बिरला’ से लोकसभा में बैठने के लिए अलग जगह देने की मांग भी की है. इससे पहले शिवसेना और एनसीपी में भी इस तरह की टूट हो चुकी है. जब भी इस तरह के मामले आते हैं तो Anti-Defection Law यानी दल-बदल रोकने वाला कानून कीवर्ड बन जाता है.
यही सबके सवालों का केंद्र है कि क्या इसे दल-बदल माना जाएगा? इसे सरल ढंग से समझने की कोशिश करते हैं.
सांसदों का क्या तर्क है?बाग़ी सांसदों का तर्क है कि उनके साथ दो-तिहाई से ज़्यादा लोकसभा सांसद हैं. 28 में से 20 सांसद उनके साथ आ गए हैं. इसलिए उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. इसके लिए वो Goa Defection Case का हवाला दे रहे हैं. 2022 में बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने 12 विधायकों के BJP में जाने को वैध माना था. क्योंकि वो अपनी-अपनी पार्टियों के दो-तिहाई से ज़्यादा सदस्य थे. 10 कांग्रेस के थे, जबकि 2 ‘महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी’ के थो. ये घटना 2019 में हुई थी, जिसका फैसला 2022 में आया.
इस बारे में इंडियन एक्सप्रेस ने PRS लेजिस्लेटिव रीसर्च के ‘चक्षु रॉय’ से बातचीत की. उनका कहना है कि पहले भी संसद और विधानसभाओं में ऐसे विलय स्वीकार किए जाते रहे हैं. बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी कुछ मामलों में इन्हें सही माना है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से इस मुद्दे पर कोई फाइनल जजमेंट नहीं आया है.
कानून क्या कहता है?2022 में जब कोर्ट का फैसला आया तब भी पूरे विवाद के केंद्र में संविधान के Tenth Schedule का Paragraph 4 था. अब भी विवाद इसी पर टिका है. कंस्टीटूशन का यही 10th Schedule कहलाता है – ‘Anti Defection Law`’, यानी ‘दल-बदल विरोधी कानून’. इसे 1985 में एक संविधान संशोधन एक्ट के ज़रिए लाया गया था, ताकि ‘चुने’ हुए प्रतिनिधि आसानी से अपनी पार्टी न बदल सकें. लेकिन विलय इसमें एक अपवाद है.
अगर कोई पार्टी दूसरी पार्टी में मर्ज हो जाती है (विलय करती है) और कम-से-कम ‘दो-तिहाई’ विधायक या सांसद उस मर्जर से सहमत हैं, तब सदन से उनकी सदस्यता ख़त्म नहीं की जाएगी. यही है ‘Paragraph–4’. और यहीं से असली बहस शुरू होती है.
सांसदों के विरोध में तर्कदूसरी तरफ़, सीनियर अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल हैं. उनका मानना है कि इन सांसदों को डिसक्वालिफाई किया जा सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक़, सिब्बल कहते हैं कि यहां सिर्फ सांसदों का ग्रुप टूटा है. पार्टी नहीं टूटी है, Trinamool Congress नाम की असल राजनीतिक पार्टी का विलय ‘नहीं’ हुआ है. कपिल सिब्बल का कहना है कि 10th Schedule के Paragraph 4 का फ़ायदा इन सांसदों को तभी मिलेगा, जब राजनीतिक ‘पार्टी’ का Merger हो. सिर्फ सांसदों के गुट का नहीं. (जिन्हें Technical भाषा में ‘Legislature Party’ कहा जा रहा है).
इस राय से लोकसभा के पूर्व Secretary General ‘PDT आचार्य’ भी सहमत हैं. उनका कहना है कि Tenth Schedule के फोकस पर ‘राजनीतिक पार्टी’ है, ‘Legislature party’ नहीं. अगर ‘पार्टी’ Merge होती है, तभी उसके सांसदों को अपनी संसद सदस्यता की सिक्योरिटी मिलती है. इसपर PDT आचार्य ने 2023 के शिवसेना स्प्लिट केस का भी हवाला दिया. उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि Legislature Party, अपनी असल पॉलिटिकल पार्टी से अलग होकर ‘स्वतंत्र तरीके’ से काम नहीं कर सकती. इस उदाहरण के आधार पर सदन से सदस्यता जाने का खतरा बढ़ सकता है.
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सांसदों का काउंटर तर्कहालांकि कुछ ऐसे ही पुराने उदाहरण बाग़ी सांसदों के पास भी हैं. जैसे, 2019 का वाक़िया. जब TDP के 6 में से 4 राज्यसभा सांसद ‘BJP’ में चले गए थे. उस Merger को तत्कालीन सभापति ‘वेंकैया नायडू’ से मंज़ूरी मिल गई थी. फिर, इसी साल ‘अप्रैल 2026’ में आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसद ‘BJP’ में चले गए. इसे भी राज्य सभा के चेयरमैन सीपी राधाकृष्णन ने मंज़ूरी दे दी. जिसके बाद राज्यसभा सचिवालय ने इन सांसदों को आम आदमी पार्टी की जगह ‘BJP’ के खाते में दिखाना शुरू कर दिया.
ये इस बात का उदाहरण है कि पहले इस तरह के Merger को स्वीकार किया जा चुका है. ऐसे मामलों में आखिरी फैसला संबंधित सदन के ‘सभापति’ का होता है. इस बार भी ये फैसला लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला का होगा. अगर वो इस Merger को स्वीकार कर लेते हैं, तो इन सभी बाग़ी सांसदों की सदस्यता बनी रहेगी.
अब ओम बिरला ने भी अपना नज़रिया स्पष्ट कर दिया है. इंडिया टुडे से जुड़ीं ऐश्वर्या पालीवाल की रिपोर्ट के मुताबिक़, उन्होंने कहा है कि वो इस मामले पर तभी फैसला लेंगे, जब वो दोनों पक्षों को सुन लेंगे. इसे लेकर ममता बनर्जी की अगुआई वाले TMC सांसदों के गुट को भी उनके दफ़्तर से मेल गया है. उन्हें एक मीटिंग के लिए बुलाया गया है. अगर कोई पक्ष इस फैसले से संतुष्ट न हो तो इसे कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है.
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