राज्यपाल का थलापति विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं करना कितना सही?
तमिलनाडु में किसी भी एक दल को बहुमत नहीं मिला है. यहां त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बन गई है. विजय की पार्टी TVK 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है. कांग्रेस ने अपने पांच विधायकों का समर्थन उन्हें दिया है. विजय 113 विधायकों के समर्थन के साथ राज्यपाल से मिले. लेकिन राज्यपाल ने उन्हें 118 का नंबर लाने के लिए कह दिया.

तमिलनाडु में किसी दल को बहुमत नहीं मिला. थलपति विजय की पार्टी TVK के हिस्से सबसे ज्यादा 108 सीट आएं. बहुमत का जादुई आंकड़ा 118 है. कांग्रेस के समर्थन के बाद विजय के पास हुईं 113 सीट. इसी नंबर के साथ विजय अब तक दो बार राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर से मिल चुके हैं. लेकिन राज्यपाल ने उनको सरकार बनाने की हरी झंडी नहीं दी है. सबकी नजरें अब राजभवन पर ही टिकी हैं. ऐसे में समझते हैं कि ऐसी परिस्थिति में संविधान राज्यपाल को क्या-क्या अधिकार देता है और उनकी लिमिटेशन क्या है?
संवैधानिक ढांचे की नजर से देखें तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 163 के मुताबिक, राज्यपाल सामान्य तौर पर मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं. लेकिन फिलहाल राज्य में कोई मंत्रिपरिषद अस्तित्व में नहीं है. ऐसे में राज्यपाल का विवेकाधिकार एक्टिव हो जाता है. अनुच्छेद 164 (1) कहता है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी, लेकिन संविधान में स्पष्ट तौर पर नियुक्ति प्रक्रिया का जिक्र नहीं है. यही मौजूदा विवाद की मूल जड़ है.
अनुच्छेद 188 के तहत सभी चुने हुए विधायक सदन में बैठने से पहले राज्यपाल के सामने शपथ लेते हैं. Rameshwar Prasad बनाम भारत संघ 2006 में पक्षकारों के इस तर्क को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया था कि शपथ दिलाना राज्यपाल का प्राथमिक और मूलभूत संवैधानिक दायित्व है, न कि उनकी विवेकाधीन शक्ति. यह फैक्ट मौजूदा संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है.
सरकारिया आयोग की सिफारिशें क्या कहती हैं?
साल 1983 में केंद्र और राज्य के संबंधों को डिफाइन करने के लिए सरकारिया आयोग गठित हुआ था. इस आयोग ने त्रिशंकु विधानसभा में राज्यपाल के लिए प्राथमिकता का ऑर्डर तय किया था. इस आयोग की सिफारिश के मुताबिक, अगर किसी एक दल को पूर्ण बहुमत हो तो राज्यपाल को पहले उसे बुलाना चाहिए. लेकिन अगर ऐसा नहीं हो तो राज्यपाल को पहले चुनाव से पहले बने जिस गठबंधन (Pre Poll Alliance) को बहुमत हो उसे बुलाना चाहिए.
इसके बाद सबसे बड़े दल को बुलाना चाहिए जो दूसरे दलों के समर्थन से बहुमत का दावा करे. इसके बाद चुनाव के बाद हुए गठबंधन (Post poll Alliance) को जिसमें सभी पार्टनर सरकार में शामिल हों. सबसे आखिर में उस Post poll Alliance को बुलाना चाहिए जिसको कुछ दल बाहर से समर्थन दे रहे हों.
तमिलनाडु की मौजूदा स्थिति देखें तो TVK साफ तौर पर इस ऑर्डर में दूसरे नंबर पर आती है. क्योंकि यह सबसे बड़ी पार्टी है, जो दूसरे दलों के समर्थन से सरकार बनाने का दावा कर रही है. सरकारिया आयोग की सिफारिशों के मुताबिक राज्यपाल को सबसे पहले TVK को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना चाहिए. हालांकि सरकारिया आयोग की सिफारिशें राज्यपाल के लिए बाध्यकारी नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल को किसी पार्टी को बुलाने की प्रक्रिया पर कोई बाध्यकारी जजमेंट नहीं दिया है.
विधानसभा के पटल पर बहुमत साबित होना चाहिए
साल 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया था. यह मामला अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के मनमाने इस्तेमाल से जुड़ा था. इसमें 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने साफ किया कि किसी भी मुख्यमंत्री या दल के पास बहुमत है या नहीं यह टेस्ट केवल विधानसभा के पटल (Floor Test) पर ही होना चाहिए. हालांकि यहां एसआर बोम्मई सरकार पहले से सत्ता में थी और उनके बहुमत पर सवाल था. यहां मामला नई सरकार के गठन का है.
राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति और उनकी सीमा
संविधान का अनुच्छेद 163 राज्यपाल को कुछ मामलों में अपने विवेक (Discretion) के इस्तेमाल की शक्ति देता है. लेकिन रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल कानून के दायरे में ही कोई फैसला ले सकते हैं. दरअसल बिहार में साल 2005 में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला. राज्यपाल बूटा सिंह ने किसी भी पार्टी को मौका दिए बिना हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाते हुए विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी और 23 मई 2005 को विधानसभा भंग कर दी गई. तब तक सदन की कोई बैठक नहीं हुई थी. किसी विधायक ने शपथ नहीं ली थी.
इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को असंवैधानिक और मालाफाइड घोषित कर दिया. कोर्ट ने यह कहा कि हॉर्स ट्रेडिंग पर फैसला लेने का अधिकार स्पीकर का है, राज्यपाल का नहीं. राज्यपाल की रिपोर्ट केवल उनके स्टेटमेंट पर आधारित नहीं हो सकती. इसके लिए उनके पास ऑब्जेक्टिव कंटेंट होना चाहिए. बिहार में चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी थी. इसलिए कोर्ट ने विधानसभा बहाल नहीं की. लेकिन इस फैसले से ये साफ हो गया कि राज्यपाल बिना किसी को मौका दिए अगर विधानसभा भंग करके राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करते हैं तो उनके फैसले को चुनौती दी जा सकती है.
कर्नाटक 2018 का उदाहरण तमिलनाडु की वर्तमान स्थिति से सबसे ज्यादा मिलता-जुलता है. BJP को 104 सीटें, कांग्रेस को 78 और JD(S) को 38 सीटें मिली थीं. बहुमत का आंकड़ा 112 था. कांग्रेस और JD(S) ने मिलकर 116 विधायकों के समर्थन का पत्र राज्यपाल को सौंपा. इसके बावजूद राज्यपाल वाजूभाई वाला ने 104 सीटों वाली BJP को आमंत्रित किया और येदियुरप्पा को 17 मई 2018 को शपथ दिलाकर 15 दिन का समय दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने रात को ही सुनवाई कर इस 15 दिन की अवधि को घटा दिया. कोर्ट ने 18 मई को आदेश दिया कि फ्लोर टेस्ट 19 मई को शाम 4 बजे होगा. यानी शपथ के बाद 36 घंटे से भी कम. येदियुरप्पा बहुमत सिद्ध न कर सके और त्यागपत्र देकर चले गए. इससे ये साबित हुआ कि राज्यपाल सबसे बड़ी सिंगल पार्टी को आमंत्रित कर सकता है, लेकिन कोर्ट उसको बहुमत जुटाने के लिए अतिरिक्त समय नहीं देने देगा.
तमिलनाडु में TVK के पास कांग्रेस के समर्थन से 113 सीटें हैं. जबकि येदियुरप्पा के पास केवल 104 थीं. यदि 104 सीटों वाले दल को शपथ मिल सकती थी तो 113 सीटों के साथ विजय को शपथ देने से पूर्व 118 का आंकड़ा मांगना न्यायिक परंपरा के उलट मालूम होता है.
लॉ एक्सपर्ट शुभम सांकृत ने बताया,
“तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने के लिए 118 विधायकों का समर्थन लाने की मांग कर रहे हैं. उनका ये रुख न्यायिक परंपरा और संवैधानिक भावना के मुताबिक नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर Bommai, Rameshwar Prasad और Nabam Rebia जैसे महत्वपूर्ण फैसलों में आयोगों की सिफारिशों का जिक्र किया है. लेकिन त्रिशंकु विधानसभा में सरकार गठन की प्रक्रिया पर कोई सीधा बाध्यकारी जजमेंट नहीं दिया है.”
शुभम के मुताबिक इसके चलते इस मामले में राज्यपाल का पद राजनीतिक विवाद का कारण बना रहेगा और कोर्ट को बार-बार हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. तमिलनाडु का मामला इस संवैधानिक अधूरेपन का सबसे ताजा और जीवंत उदाहरण है. उन्होंने आगे बताया कि ऐसी स्थिति में सबसे बेहतर संवैधानिक विकल्प यही होता कि राज्यपाल सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए बुलाते और एक तय समयसीमा के भीतर सदन में बहुमत साबित करने को कहते. आखिरकार बहुमत का टेस्ट राजभवन में नहीं विधानसभा के फ्लोर पर होना चाहिए.
वीडियो: थलपति विजय की पार्टी बहूमत से दूर, क्या DMK-AIADMK मिलकर खेल बिगाड़ देंगी?

