'थरूर नहीं हो सकते महिला विरोधी', किरेन रिजिजू भी मान गए ये बात!
शशि थरूर ने केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के साथ एक सेल्फी शेयर की. ये सेल्फी तब ली गई लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था. चूंकि 17 अप्रैल को महिला आरक्षण पर लोकसभा में बहस हुई, इसलिए चर्चा का सबसे मुख्य विषय भी यही था.

महिला आरक्षण संशोधन बिल लोकसभा में पारित नहीं हो पाया. इसके बाद भाजपा और मोदी सरकार के मंत्री विपक्षी दलों खासतौर पर कांग्रेस और उसके नेताओं को महिला विरोधी घोषित करने में लगे हैं. लेकिन एक कांग्रेसी नेता हैं जिसके लिए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू भी मान गए कि ‘उन्हें कोई महिला विरोधी नहीं कह सकता.’ ये नेता और कोई नहीं, तिरुअनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर हैं. असल में 18 अप्रैल शनिवार को संसद के स्पेशल सत्र के समापन के बाद शशि थरूर ने केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के साथ एक सेल्फी सोशल मीडिया पर पोस्ट की.
इस फोटो के साथ शशि थरूर ने कैप्शन में बताया कि उन्हें कोई महिला-विरोधी नहीं कह सकता और किरेन रिजिजू ने भी ये बात मान ली है.
फोटो के बारे में बताते हुए थरूर ने कहा कि इस फोटो में सदन की कार्यवाही खत्म होने के बाद विपक्षी दलों के सदस्य किरेन रिजिजू के साथ सदन के अंदर जमा थे. बातचीत के दौरान रिजिजू ने समझाया कि सत्ताधारी पार्टी ने विपक्ष को ‘महिला विरोधी’ क्यों कहा था? उन्हें बताया गया कि ऐसा आरोप उन पर (शशि थरूर पर) नहीं लगाया जा सकता. इस बात को रिजिजू ने भी मान लिया.
शशि थरूर ने एक्स पर लिखा,
लोकसभा में सदन स्थगित होने के बाद विपक्षी सांसदों की हमारे मिलनसार संसदीय कार्य मंत्री के साथ एक छोटी-सी अनौपचारिक बैठक हुई. जब किरेन रिजिजू ने समझाया कि वे और उनकी पार्टी विपक्ष को 'महिला विरोधी' क्यों कह रहे हैं, तो उन्हें यह बताया गया कि मुझे कोई भी कभी भी महिला विरोधी नहीं कह सकता! रिजिजू ने भी इस बात को मान लिया.

थरूर ने इस मौके का इस्तेमाल महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर अपनी व्यापक राय को दोहराने के लिए भी किया. उन्होंने लिखा,
चलिए, इस बात को स्वीकार करते हैं: महिलाएं इंसानी प्रजाति में कहीं ज्यादा बेहतर हैं. वे बेहतर मॉडल हैं. ह्यूमन्स 2.0. वे संसद और हर संस्थान में प्रतिनिधित्व की हकदार हैं. बस, उनकी तरक्की को एक शरारती और संभावित रूप से खतरनाक परिसीमन से न जोड़ें. जो हमारे लोकतंत्र को तबाह कर सकता है.
शशि थरूर की ये टिप्पणियां तब आईं, जब सरकार को 17 अप्रैल को एक बड़ा झटका लगा. सरकार का लाया हुआ संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, जिसका मकसद 2029 से महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को लागू करना था, लोकसभा में गिर गया. इस प्रस्ताव में 2011 की जनगणना पर आधारित परिसीमन प्रक्रिया के बाद लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने का भी प्रावधान था. साथ ही इस कोटे को समायोजित करने के लिए राज्यों की विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों की विधायिकाओं में भी सीटों में उसी अनुपात में बढ़ोतरी का प्रस्ताव था.
वोटिंग में, 298 सदस्यों ने विधेयक का समर्थन किया, जबकि 230 ने इसका विरोध किया. 528 सांसदों की भागीदारी के साथ, यह विधेयक संवैधानिक संशोधन पारित करने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों से पीछे रह गया.
वीडियो: प्रियंका गांधी ने मोदी सरकार को पुराना महिला आरक्षण बिल लाने की चुनौती क्यों दी?

