अखिलेश यादव ने I-PAC के साथ डील तोड़ी, ममता-स्टालिन की हार ने सपा की रणनीति बदल दी
Akhilesh Yadav on I-PAC: ममता बनर्जी और अखिलेश यादव के बीच राजनीतिक रिश्ते अच्छे माने जाते हैं तो उनके कहने पर सपा ने I-PAC को यूपी में चुनावी रणनीति के लिए जोड़ा था. लेकिन अब कहानी पलट गई है. चुनावों के नतीजों ने पूरा गेम बदल दिया.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा ट्विस्ट आया है. अखिलेश यादव की पार्टी यानी समाजवादी पार्टी ने चुनावी रणनीति बनाने वाली कंपनी I-PAC के साथ अपनी डील खत्म कर दी है. ये वही I-PAC है, जो अलग-अलग राज्यों में पार्टियों के लिए चुनावी मैनेजमेंट करती रही है. हालांकि, एक दिलचस्प बात ये है कि I-PAC के कुछ पुराने कर्मचारी अब अलग होकर नई कंपनी बना सकते हैं और सपा की मदद कर सकते हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ महीने पहले ये समझौता हुआ था. ममता बनर्जी की सलाह पर ही ये डील की गई थी. ममता और अखिलेश के बीच राजनीतिक रिश्ते अच्छे माने जाते हैं तो उनके कहने पर सपा ने I-PAC को यूपी में चुनावी रणनीति के लिए जोड़ा था. लेकिन अब कहानी पलट गई है. चुनावों के नतीजों ने पूरा गेम बदल दिया. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु दोनों जगह I-PAC काम कर रही थी. बंगाल में ममता की पार्टी TMC और तमिलनाडु में DMK के लिए. लेकिन नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आए.
दोनों राज्यों में पार्टियों को हार का सामना करना पड़ा. साथ ही दोनों राज्यों के सीएम अपनी सीट से भी चुनाव हार गए. इससे I-PAC की रणनीति पर सवाल खड़े हो गए. इसी के बाद अखिलेश यादव ने डील खत्म कर दी. हालांकि सपा की तरफ से अभी इस मामले की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है.
I-PAC विवादों में क्यों?I-PAC पहले से ही विवादों में थी. कंपनी के डायरेक्टर विनेश चंदेल को ED ने बंगाल के कोयला घोटाले से जुड़े मामले में गिरफ्तार कर लिया था. इसके बाद कंपनी की साख पर असर पड़ा. सूत्रों के मुताबिक, ED की कार्रवाई के बाद I-PAC ने बंगाल में अपना काम काफी हद तक समेट लिया था. ऑफिस बंद होने लगे, स्टाफ कम कर दिया गया, और गैर जरूरी चुनावी काम रोक दिए गए. इससे TMC और I-PAC के रिश्ते भी खराब होने लगे.
इसका असर सिर्फ कागज पर नहीं पड़ा बल्कि जमीन पर भी दिखा. I-PAC ने यूपी में अपना ऑफिस बंद कर दिया. बताया जा रहा है कि करीब 30-40 लोग इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे, उन्हें भी रोक दिया गया है. सूत्रों के मुताबिक पार्टी के अंदर I-PAC को लेकर नाराजगी थी. कई पुराने नेता मानते थे कि बाहरी एजेंसी आने से उनकी अहमियत कम हो रही है. तो ये फैसला कहीं न कहीं अंदरूनी दबाव का भी नतीजा हो सकता है.
तो अब सवाल ये कि अखिलेश यादव आगे क्या करेंगे? अखिलेश पहले भी बिना किसी बड़ी प्राइवेट एजेंसी के चुनाव लड़ चुके हैं. उनका फोकस ज़्यादातर जमीनी कार्यकर्ताओं पर रहता है जो इलाके की नब्ज़ जानते हैं. टिकट बांटने से लेकर रणनीति बनाने तक, वो लोकल फीडबैक पर भरोसा करते रहे हैं.
वीडियो: अखिलेश यादव ने जिस दुकान पर चाय पी, वहां छापा क्यों पड़ा?


