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राघव चड्ढा का ये बिल कानून बन जाता तो वो AAP नहीं छोड़ पाते, चुनाव लड़ने पर बैन भी लगता

Raghav Chadha का तब कहना था कि उनके बिल के प्रस्तावित नियमों से नेताओं को पार्टी बदलने से पहले सही तरह से सोचना पड़ेगा. उनके मुताबिक, ऐसा करने से नेता 'सिर्फ पार्टी की राजनीति' करने के बजाय अपना असल काम (कानून बनाना) बेहतर तरीके से कर सकेंगे.

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27 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 27 अप्रैल 2026, 01:52 PM IST)
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2022 में राघव चड्ढा राज्यसभा के सबसे युवा सांसद बने थे. (PTI)
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राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) जॉइन करने का ऐलान किया है. राघव चड्ढा और उनके साथ छह अन्य AAP सांसद BJP में शामिल हो रहे हैं, तो इस पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये कदम 'दल-बदल विरोधी कानून' (Anti-defection Law) के तहत सही है? खास बात ये है कि राघव चड्ढा ने एक ऐसा बिल पेश किया था, जो अगर कानून बन जाता, तो वह और उनके साथी सांसद इस तरह AAP नहीं छोड़ पाते. ना BJP में जाते. अगर पार्टी छोड़ भी देते, तो चुनाव लड़ने पर बैन लगने तक की नौबत आ जाती.

राघव चड्ढा के लाए बिल में ऐसा क्या था?

चार साल पुरानी बात है. 2022 में राघव चड्ढा ने राज्यसभा में बतौर सबसे युवा सदस्य अपना पहला प्राइवेट मेंबर बिल - संविधान (संशोधन) बिल, 2022 - पेश किया था. इस बिल में राघव चड्ढा ने संविधान के दसवें शेड्यूल में बदलाव की बात की थी. उनका प्रस्ताव था कि अगर कोई सांसद या विधायक अयोग्य घोषित होता है, तो उसके छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए.

राघव चड्ढा ने अपने बिल में यह भी कहा था कि अगर पार्टी में कोई विभाजन होता है तो उसे केवल दो-तिहाई (2/3) नहीं, बल्कि तीन-चौथाई (3/4) बहुमत से होना चाहिए, ताकि 'राजनीतिक लालच' को कम किया जा सके.

मौजूदा कानून में किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य एक साथ किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं या अलग गुट बनाते हैं, तो इसे 'कानूनी विलय' माना जाता है. ऐसे में उन सदस्यों की सदस्यता रद्द नहीं होती है और वे दल-बदल कानून के तहत अयोग्य नहीं ठहराए जाते हैं.

राघव चड्ढा के बिल में संविधान के दसवें शेड्यूल के आर्टिकल 102 और 191 में बदलाव किया जाता. दो-तिहाई की शर्त बदलकर तीन-चौथाई हो जाती. राघव चड्ढा ने इसे लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए जरूरी कदम बताया था.

उनका कहना था कि इस तरह के सख्त नियमों से नेताओं को पार्टी बदलने से पहले सही तरह से सोचना पड़ेगा. उनके मुताबिक, ऐसा करने से नेता 'सिर्फ पार्टी की राजनीति' करने के बजाय अपना असल काम (कानून बनाना) बेहतर तरीके से कर सकेंगे.

अगर उनका यह बिल पास हो गया होता, तो इस समय राघव चड्ढा और उनके साथी सांसदों को BJP में शामिल होने के लिए दो तिहाई से ज्यादा AAP सांसदों का समर्थन चाहिए होता. अभी तो राघव ने छह अन्य सांसदों के साथ होने का दावा किया है, लेकिन कानून बन जाता तो उन्हें छह नहीं, सात सांसदों को जरूरत पड़ती. अगर सदस्यता रद्द कर दी जाती, तो उन्हें छह साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध का सामना करना पड़ता.

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