कल शाम काम ख़त्म करके घर जा रही थी. कैब में बैठते ही दफ्तर के एक साथी का मैसेज आगया. छोटा सा काम था, इसलिए मैंने सोचा रास्ते में ही कर लेती हूं. मैंने कैब मेंही लैपटॉप खोल लिया और मेल खोलकर देखने लगी. इत्ते में खाना बनाने वाली दीदी का फ़ोनआ गया. पूछने लगीं - "सब्ज़ी क्या बनाऊं दीदी?" उनका सवाल सुनते ही दिमाग आर्टिकल सेनिकलकर सीधे फ्रिज टटोलने लगा. क्या सब्ज़ी रखी होगी, पालक पहले ख़राब होगी या मेथी,क्या पहले बनवाया जाए ये कैलकुलेट करने लगा. एक साथ काम के बाद काम और दिमाग मेंऑफिस के टास्क की अलग टेंशन. इन सब के कारण अजीब सी घबराहट होने लगी. वो होता है नअजीब सी बेचैनी. जैसे ट्रेन छूटने के डर से होती है. और ये फीलिंग हर किसी को होतीहै. कभी ना कभी किसी ना किसी पॉइंट पर. इसी पर बात करेंगे आज के म्याऊ में औरखोजेंगे कि आखिर इसका समाधान क्या है.