बिंदिया तो चमकेगी, लेकिन औरतों पर राय थोपने वालों की अक्ल कब चमकेगी?
बिंदी को लेकर चिंदीपना दिखाने वाले ये एक बात हिंदी में समझ लें.
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सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि बिंदी 'हिंदू' परिधान का ज़रूरी हिस्सा है, इसे मॉडल्स के माथे से हटाकर फैशन ब्रांड्स हिंदू विरोधी काम कर रहे हैं. बाईं फोटो- इंस्टाग्राम/ फैब इंडिया, दाईं फोटो- Pixabay
सोशल मीडिया ने ये पूरा हफ्ता दो चीज़ों पर बहस पर बिता दिया. एक आर्यन खान. दूसरा 'हिंदू' परिधान. आर्यन खान वाला मसला तो आपको पता चल ही गया होगा अब तक कि एक क्रूज़ में पार्टी कर रहे थे. वहां से एनसीबी ने उनको गिरफ्तार कर लिया. नशा-ड्रग्स का मामला है. कोर्ट बार-बार उनकी ज़मानत याचिका खारिज कर रहा है.'हिंदू' परिधान ट्रेंड कर रहा है फैब इंडिया के जश्न-ए-रिवाज वाले विज्ञापन के बाद से ही. फैब इंडिया ने दीवाली को 'जश्न-ए-रिवाज़' बता दिया. वैसे होता रिवाज है, रिवाज़ नहीं. ये एक उर्दू टर्म है, हिंदी में इसका मतलब होगा परंपराओं का त्योहार. ऐड आया और आहत होने के मौके तलाशने वाली जनता का जैकपॉट लग गया. हिंदू-मुस्लिम वाला प्रौपागैंडा चलाने वालों की चांदी हो गई. हिंदुत्व के खतरे में होने की बात सामने आई और ऐसा होते ही कथित हिंदुओं की सामूहिक चेतना जागृत हो गई. ऐसी जागृत हुई कि फैब इंडिया को बैन तक करने की मांग होने लगी.
ब्रांड को, उसके प्रोडक्ट्स को, उसके मॉडल्स को मनभर कोस लेने के बाद उस विज्ञापन का पोस्टमॉर्टम हुआ. पोस्ट मॉर्टम करने वाले हिंदूवादी फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स ने महीन जांच के बाद निष्कर्ष निकाला-
पूरे विज्ञापन में एक भी मॉडल ने बिंदी नहीं लगाई है. बिंदी के बिना हिंदू लुक पूरा नहीं होता है. इसलिए ये विज्ञापन एंटी हिंदू है. मुस्लिम समर्थक है. हिंदू सभ्यता को खत्म करने की कोशिश की जा रही है.यहां से पूरा फोकस बिंदी पर शिफ्ट हो गया. लोग बिंदी की महत्ता बताने लगे. बताने लगे कि माथे पर लगी बिंदी फोकस करने में मदद करती है. इसलिए हिंदू पुरुष तिलक और हिंदू औरतें बिंदी लगाती हैं. इस पूरे नैरेटिव को एक कदम आगे बढ़ाते हुए शेफाली वैद्य नाम की एक राइट विंग यूज़र ने कैम्पेन चला दिया नो बिंदी नो बिजनेस का. शेफाली ने फैब इंडिया के साथ-साथ दूसरे ऐसे ब्रांड्स पर निशाना साधा जिनके विज्ञापनों में मॉडल्स ने बिंदी नहीं लगाई थी.
Shefali Vaidya के ट्वीट का स्क्रीनशॉट.इस पूरी कवायद के दौरान फैब इंडिया ने अपने कैम्पेन का नाम जश्न-ए-रिवाज से बदलकर झिलमिल सी दीवाली कर दिया. ये करके उनके बिजनेस को कितना फायदा हुआ या नहीं ये हम नहीं कह सकते. लेकिन कुछ अतिवादियों के दबाव में उठाए गए इस कदम को सही बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता है. इस पूरी बहस के बीच कुछ सवाल हमारे मन में आए, जिनके जवाब अगर आपके पास हों तो ज़रूर दीजिएगा.
1. भाषा क्या है? क्या धर्म की कोई भाषा होती है? दीवाली को आप जश्न ए रोशनी लिखें, दीपों का त्योहार लिखें या फेस्टिवल ऑफ लाइट्स लिखें. क्या भाषा बदलने से त्योहार के मायने बदल जाएंगे? क्या उससे जुड़ी परंपराएं, मान्यताएं बदल जाएंगी? क्या त्योहार का महत्व बदल जाएगा?
2. ये हिंदू परिधान क्या होता है? ये कब शुरू हुआ? अब तक तो परिधान भारतीय और वेस्टर्न कैटेगिरी में बंटे मिलते थे. साड़ियां मिलती थीं उन जगहों के नाम से जहां वो बनाई जाती हैं. कांजीवरम, भागलपुरी, बनारसी. अपने खास डिज़ाइन के नाम से पैंठनी, लहरिया, चुनरी प्रिंट... पर कभी किसी परिधान का नाम हिंदू साड़ी, हिंदू सलवार कमीज़ न सुन और न कहीं लिखा हुआ देखा. ऐसा करके उन चीज़ों पर पर धर्म की लकीर खींचने की कोशिश हो रही है जो अब तक साझा रहा है. और जिसे साझा बने रहना चाहिए.
3. और फोकस सबका बिंदी पर ही क्यों है? क्योंकि औरतों को पैट्रनाइज़ करना, उनको ज्ञान देना कि उन्हें क्या और कैसे पहनना चाहिए ज्यादा आसान है? हिंदुत्व को बचाने का ठेका घूम-फिरकर औरत के माथे (इस बार लिटरली) क्यों भाई? पुरुष कुछ भी करे चलता है, पर औरत की बिंदी गायब तो धर्म पर खतरा मंडराने लगता है. गज़ब हाल है!
बिंदी या किसी भी चीज़ का आपके धर्म में महत्व है, इसका ये मतलब नहीं कि आप इसे लोगों पर थोपने लगें. लोगों को अपनी पसंद और कम्फर्ट के हिसाब से पहनने-ओढ़ने और मेकअप करने की आज़ादी होनी चाहिए. आप बिंदी लगाइए अगर आपको वो अच्छा लगता है, मत लगाइए अगर नहीं अच्छा लगता. और हां, ऐसे लोगों से एकदम संभलकर रहिए जो बिंदी के नाम पर आपको बरगला रहे हैं. क्योंकि आप वो हैं जो आप होना चाहती हैं. न कि वो जो आप पहनती हैं.

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