26 अगस्त की तारीख दुनिया की औरतों के लिए क्यों खास है?
102 साल पहले क्या हुआ था आज के दिन?

"उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझमें शोले भी हैं, बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है, दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़, जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे.."
ये मशहूर शायर-गीतकार कैफ़ी आज़मी की नज़्म 'औरत' का एक हिस्सा है. बहुत पॉपुलर नज़्म है. आपने कहीं सुनी भी होगी. जब भी इस नज़्म का ज़िक्र आता है, इसे 'अपने समय से आगे' वाली उपमा दे दी जाती है. रही भी होगी. पहली बार कोई पुरुष एक महिला को अपने पीछे या आगे नहीं, साथ चलने के लिए कह रहा है. हालांकि, इस नज़्म की एक व्याख्या ये भी है कि इसमें एक सटल-मैनस्प्लेनिंग निहित है. मैनस्प्लेनिंग माने महिलाओं के मुद्दों पर किसी पुरुष का ज्ञान देना, ऐसा ज्ञान जो उस मुद्दे पर उस पुरुष की अज्ञानता से उपजा हो. खैर, हम अभी हम उस विवाद में नहीं पड़ेंगे. आज बात करेंगे इस नज़्म के विषय की. औरत और पुरुष के साथ चलने की. बराबरी की.
बहुत क्लीशे फ्रेज़ है, मगर सत्य है. इतिहास उठा कर देख लीजिए, आप पाएंगे कि महिलाएं अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं. एक समाज में एक जैसे देखे जाने के अधिकार के लिए. कहीं भी सुरक्षित घूमने-फिरने के अधिकार के लिए. अपनी 50 फ़ीसदी हिस्सेदारी के लिए. 26 अगस्त को इसी लड़ाई का मील का पत्थर माना जाता है. आज का दिन दुनियाभर में महिलाओं की लड़ाई को सेलिब्रेट करने का दिन है. इसीलिए आज के दिन हम मनाते हैं, 'विमेन्स इक्वॉलिटी डे' (Women's Equality Day). 'विमेन्स डे' नहीं, इक्वॉलिटी डे.
तो आज आपको बताते हैं कि क्यों मनाया जाता है ये दिन और इस दिन के लिए क्या-क्या हुआ.
शुरू से शुरू करते हैंअमेरिका. यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका. दुनिया में सिविक प्रोग्रेसिवनेस और इंडिविजुआलिटी का पुरोधा. लेकिन ये मामला शुरू से नहीं था. ब्रिटिश सल्तनत से मिली आज़ादी के बाद अमेरिका ने 1787 में अपना संविधान अपनाया. तब वोट देने का अधिकार केवल गोरे लैंड-ओनिंग पुरुषों को दिया गया. अमेरिका के संस्थापकों का मानना था कि रिपब्लिक अभी नया-नया बना है, और इन लोगों का देश में सबसे ज़्यादा महत्व है. फिर 1800 के शुरुआती दशकों में अफ़्रीकन-अमेरिकन पुरुषों ने मताधिकार की मांग करना शुरू कर दिया. चूंकि ज़मीन होना, वोट देने की शर्त थी, तो गोरे पुरुष ज़मीन की तलाश में पश्चिम की ओर बढ़ते रहे. लेकिन कुछ ही सालों में कई राज्यों ने इस शर्त को भी हटा दिया. तो नया रूल ये बना कि जो भी पुरुष गोरा है, वोट दे सकता है.
लिंग और नस्ल के भेद की वजह से अमेरिका में ही रहने वाले कई नागरिक दशकों तक वोट देने से वंचित रखे गए. फिर आया US का ऐतिहासिक 13वां संशोधन. ग़ुलामी ख़त्म कर दी गई. और 1870 में, अमेरिकी संविधान के 15वे संशोधन में ये घोषणा की गई कि राज्य नस्ल, रंग या पिछली स्थिति के कारण नागरिकों को मताधिकार से वंचित नहीं रख सकता. ग़ौर करें, यहां भी लिंग भेद की बात नहीं की है. औरतों के अधिकारों की बात नहीं की गई. जबकि ग़ुलामी के ख़िलाफ़ महिलाओं ने ब्लैक लोगों का साथ दिया था, क्योंकि उन्हें लगता था की लड़ाई ग़ैर-बराबरी के ख़िलाफ़ है.

आख़िरकार, 1840 के दशक में महिलाओं के मताधिकार का आंदोलन शुरू हुआ. 1848 में सैनेका फॉल्स कन्वेंशन में महिलाओं के एक ग्रुप ने 'डिक्लेरेशन ऑफ़ सेंटीमेंट्स' नाम से एक दस्तावेज़ जारी किया. जब अमेरिका आज़ाद हुआ था, तो उसके संस्थापकों ने 'डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडिपेंडेंस' नाम का दस्तावेज़ जारी किया था, जिसमें लिखा था - "God made all men equal and gave them rights to life, liberty and the pursuit of happiness." अर्थात, ईश्वर ने सभी आदमियों को बराबर बनाया है और उन्हें जीवन, आज़ादी और ख़ुशी का बराबर अधिकार है. इसी दस्तावेज़ के विरोध में, या कहीं संशोधन के तौर पर, महिलाओं ने 'डिक्लेरेशन ऑफ़ सेंटीमेंट्स' जारी किया. और, लिखा - "all men and women are created equal." यानी, सभी पुरुषों और महिलाओं को बराबर बनाया गया है.
इसके बाद इस तरह के तमाम कन्वेंशंस हुए, सेमिनार हुए, आंदोलन हुए, विरोध प्रदर्शन हुए. कई महिलाएं जेल गए गईं. नए संगठन बने. और, अगले पांच दशकों तक संगठित तौर पर महिलाओं का ये आंदोलन चलाया गया. इसे 'विमेन सफरेज मूवमेंट' भी कहते हैं. इस आंदोलन को पहली बड़ी जीत मिली 1890 में, जब वायोमिंग राज्य ने महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया. इसके बाद अगले 25 सालों में अलग-अलग राज्यों ने महिलाओं की मांगे मान लीं और 1918 तक आते-आते महिलाओं को 15 राज्यों में वोट देने के अधिकार मिल गए. पहले विश्व युद्ध ने इस आंदोलन में एक बड़ा भूमिका निभाई. और, फिर आया डी-डे. 26 अगस्त, 1920. अमेरिकी संविधान का 19वां संशोधन. अमेरिका की महिलाओं को वोट देने का संवैधानिक हक़ मिल गया. हालांकि, ग़रीब और ब्लैक महिलाओं को इस अधिकार के लिए कई और सालों तक लड़ना पड़ा.

इसके पचास सालों बाद, 26 अगस्त, 1970 को अमेरिका की राष्ट्रीय महिला संगठन ने 'समानता के लिए हड़ताल' का आह्वान किया. ये महिलाओं के समान अधिकारों के पक्ष में एक देशव्यापी प्रदर्शन था. 37वें अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने आधिकारिक तौर पर इस तारीख़ को 'महिला अधिकार दिवस' घोषित किया. तब से ये रीत चली आ रही है. इस साल USA ने 'महिला समानता दिवस' की 102वीं वर्षगांठ मनाई.
भारत में कैसे मिला वोटिंग का अधिकारजिस दिन भारत आज़ाद हुआ, उस दिन से ही भारत में महिलाओं को वोटिंग के अधिकार मिल गए थे. लेकिन उस अधिकार को पाने के लिए आज़ादी से पहले भारतीय महिलाओं को एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी. उस वक़्त भी अनाप-शनाप भाषण देने वाले नेता थे. जो कहते थे कि अगर औरत वोट डालने जाएगी, तो उसकी दूध पिलाने की क्षमता चली जाएगी. कोई कहता कि औरत वोट डालने जाएगी, तो घर पर पति और बच्चों का ख्याल कौन रखेगा? ख़ुद महात्मा गांधी ने वोट देने के अधिकार से जुड़े आंदोलन को समर्थन नहीं दिया था. उनका कहना था कि पहले आज़ादी पर फोकस होना चाहिए और आज़ादी की लड़ाई में महिलाओं को पुरुषों का सपोर्ट करना चाहिए. इस तरह के आंदोलन वक़्त की बर्बादी हैं. हालांकि, महिलाएं इस अधिकार के लिए डटी रहीं. इसके चलते 1920 के दशक में ही एक-एक करके सभी प्रांतों में औरतों को वोट करने का अधिकार मिला और 1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तो औरतों को वोट करने का अधिकार मिला. वोट के अधिकार के लिए भारतीय औरतों के संघर्ष को आप इस वीडियो में देख सकते हैं.
मगर बराबरी केवल वोट डालने के अधिकार से नहीं आती. हर क्षेत्र में बराबर मौकों से आती है. कानून की बात करें तो धीरे-धीरे ही सही भारत आगे बढ़ रहा है. नैशनल डिफेंस अकादमी में लड़कियों को एंट्री मिल गई है, कुछ सालों में भारत को एक महिला प्रधान न्यायाधीश मिल सकती हैं. पर जब लोगों की सोच और मानसिकता की बात आती है तो हम पीछे रह जाते हैं. क्योंकि बड़े पद पर बैठे कई लोग औरतों को इसलिए नौकरी नहीं देते कि वो शादी करेगी, फिर बच्चा पैदा करेगी तो उसे छह महीने की मैटरनिटी लीव देनी पड़ेगी. या इस आधार पर औरतों को मौके देने से बचते हैं कि वो लड़की है. एक लड़की को लड़की होने के लिए जज किया जाता है.
हम हर साल 8 मार्च को विमेन्स डे मनाते हैं. वॉट्सऐप पर एक स्टेटस डाल देते हैं. बहुत हुआ तो फ़ेसबुक पर एक लंबा पोस्ट लिख देते हैं, लेकिन क्या हम अपने आस-पास की महिलाओं को वो डिग्निटी देते हैं, जिसकी वो हक़दार हैं? क्या शासन और प्रशासन में औरतों के लिए लेवल-प्लेयिंग फ़ील्ड बन सके, इसकी दिशा में हम काम कर रहे हैं? अब इस बारे में जो भी सोचते हैं हमें कॉमेंट सेक्शन में बताइए.

