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डॉक्टर वी शांता, जिन्होंने लगातार 65 बरस तक कैंसर के मरीज़ों की सेवा की थी

शांता ने अब इस दुनिया को अलविदा कह दिया है.

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19 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 19 जनवरी 2021, 03:32 PM IST)
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डॉक्टर वी शांता, जिन्होंने 93 की उम्र में आखिरी सांस ली. (फोटो- अद्यार इंस्टीट्यूट की आधिकारिक वेबसाइट/PTI)
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93 बरस की वो डॉक्टर, जो पिछले 65 साल से लगातार कैंसर के मरीज़ों की सेवा कर रही थी, अब हमें छोड़कर जा चुकी है. हम बात कर रहे हैं सीनियर ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर वी शांता (Senior Oncologist Dr.V. Shanta) की. 93 बरस की थीं. 19 जनवरी 2021 की सुबह उन्होंने आखिरी सांस ली. 'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 जनवरी की रात डॉक्टर शांता को सीने में दर्द की शिकायत हुई. तबीयत बिगड़ने पर उन्हें रात में ही चेन्नई के एक प्राइवेट अस्पताल ले जाया गया. डॉक्टर्स ने उनके ब्लड वेसल में एक ब्लॉकेज पाया, उसे रिमूव करने की कोशिश की ही जा रही थी कि वी शांता ने सुबह करीब साढ़े 3 बजे दम तोड़ दिया. उनके शव को अंतिम दर्शन के लिए उनके कैंसर इंस्टीट्यूट के पुराने परिसर में रखा जाएगा, जहां लोग उनके अंतिम दर्शन कर सकेंगे.

वी शांता के जाने पर कई नामी लोग उन्हें याद कर रहे हैं. श्रद्धांजलि दे रहे हैं. पीएम नरेंद्र मोदी ने भी शांता के लिए ट्वीट किया-

"डॉक्टर वी शांता को कैंसर केयर की शीर्ष गुणवत्ता सुनिश्चित करने के उनके उत्कृष्ट प्रयासों के लिए याद किया जाएगा. गरीबों और पिछड़ों की सेवा करने में अद्यार कैंसर इंस्टीट्यूट चेन्नई सबसे आगे है. मैं 2018 के अपने इंस्टीट्यूट के दौरे को याद करता हूं. डॉक्टर वी शांता के जाने से दुखी हूं. ओम शांति."


कौन थीं डॉक्टर वी शांता?

वो महिला, जिन्होंने अपनी सारी ज़िंदगी कैंसर के मरीज़ों की सेवा में लगा दी. वो महिला, जिसने भारत में कैंसर के इलाज को बेहतर बनाने के लिए दिन-रात मेहनत की. जिनका एक ही मकसद था, ये कि भारत में कैंसर को लेकर लोग जागरूक हों और लोगों को बेहतर और किफायती इलाज मिल सके. शुरू से शुरुआत करते हैं.

आज़ादी के पहले का भारत. साल था 1927. चेन्नई में 11 मार्च के दिन एक बच्ची का जन्म हुआ. नाम रखा गया विश्वनाथन शांता, यानी वी शांता. जिस परिवार में इनका जन्म हुआ, उस परिवार के दो महान वैज्ञानिक आगे चलकर नोबेल प्राइज़ विजेता भी बने. हम बात कर रहे हैं डॉक्टर सीवी रमन और एस चंद्रशेखर की. सीवी रमन शांता के ग्रैंडअंकल थे, तो एस चंद्रशेखर अंकल थे. यानी समझ जाइए कि वी शांता का परिवार शिक्षा को तवज्जो देना वाला था. इसलिए शांता की पढ़ाई को लेकर भी कोई बड़ी अड़चन नहीं आई. पैरेंट्स ने सपोर्ट किया. 'द हिंदू' के आर्टिकल के मुताबिक, शांता ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बचपन से ही वो मेडिकल फील्ड में करियर बनाना चाहती थीं, परिवार वालों ने साथ दिया, लेकिन कहीं न कहीं पैरेंट्स को इस बात की चिंता भी थी कि क्या वो मेडिसीन जैसी कठोर और डिमांडिंग फील्ड में पैर जमा पाएंगी भी या नहीं. खैर, शांता के पैरेंट्स को उनकी शंका का जवाब जल्द ही मिल गया था.


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डॉक्टर मुथुलक्ष्मी रेड्डी, जिन्होंने अद्यार कैंसर इंस्टीट्यूट खोला था. (फोटो- अद्यार इंस्टीट्यूट की आधिकारिक वेबसाइट)

शांता ने 1949 में MBBS की डिग्री ली. 1952 में DGO यानी डिप्लोमा इन गायनोलॉजी एंड ऑब्सटेट्रिक्स पूरा किया. और इसी फील्ड में 1955 में MD की डिग्री ली. शांता पढ़ाई कर ही रही थीं कि दूसरी तरफ एक नई पहल शुरू हो रही थी. चेन्नई के अद्यार में कैंसर इंस्टीट्यूट  की नींव रखी जा रही थी. ये काम कर रही थीं डॉक्टर मुथुलक्ष्मी रेड्डी. उनका नाम भारत में मेडिसीन की फील्ड में ग्रेजुएट होने वाली पहली महिलाओं में शामिल है. अद्यार इंस्टीट्यूट की आधिकारिक वेबसाइट की मानें तो डॉक्टर मुथुलक्ष्मी 1912 में ग्रेजुएट हुईं, यानी डॉक्टर बनीं. फिर दो यूरोपियन्स के साथ मिलकर विमन इंडिया एसोसिएशन (WIA) की शुरुआत की 1918 में. 1922 में उन्हें पता चला कि उनकी बहन को कैंसर है. इसी बीमारी ने 1923 में मुथुलक्ष्मी की बहन की जान ले ली. इस घटना ने मुथुलक्ष्मी को इतना झकझोर दिया कि उन्होंने कैंसर की फील्ड में काम करने की ठानी. भारत में कैंसर अस्पताल खोलने का फैसला किया. WIA के सपोर्ट से 1949 में कैंसर रिलीफ फंड खोला और फिर अद्यार में छोटी सी झोपड़ी में कैंसर इंस्टीट्यूट की शुरुआत की. इसी इंस्टीट्यूट से वी शांता जुड़ीं अप्रैल 1955 में. जॉइनिंग रेसिडेंट मेडिकल ऑफिसर के तौर पर हुई. तब से लेकर आखिरी सांस तक वी शांता इस इंस्टीट्यूट से जुड़ी रहीं. निधन के वक्त वो अद्यार कैंसर इंस्टीट्यूट की अध्यक्ष थीं.


क्या-क्या किया वी शांता ने?

अद्यार एक पब्लिक चैरिटेबल इंस्टीट्यूट है. सरकारी इंस्टीट्यूट नहीं है. जब वी शांता इससे जुड़ी थीं, तब यहां केवल 12 बेड्स थे. लेकिन आज यहां 535 मरीज़ों के लिए बेड्स है. यहां गरीब कैंसर पेशेंट्स का मुफ्त में इलाज किया जाता है. 2013 में NDTV को दिए एक इंटरव्यू में शांता ने बताया कि उन्होंने अस्पताल को दो भागों में बांटा हुआ है. एक जनरल वॉर्ड, दूसरा प्राइवेट वॉर्ड. प्राइवेट वॉर्ड में भर्ती होने वाले कैंसर पेशेंट से इलाज के पैसे चार्ज किए जाते हैं, और इन पैसों से जनरल वॉर्ड में भर्ती हुए गरीब कैंसर मरीज़ों का इलाज होता है. अद्यार इंस्टीट्यूट की शुरुआत एक झोपड़ी से हुई थी, लेकिन आज इसका नाम बड़े अस्पतालों में शामिल है. ये सब कुछ वी शांता की 65 बरस की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है. उन्होंने कैंसर को लेकर जागरूकता लाने के लिए, इलाज की क्वालिटी बेहतर करने के लिए लगातार काम किया. वी शांता ने 2019 में दिए एक इंटरव्यू में कहा था,

"हमने 12 पलंग, दो डॉक्टर्स, दो नर्स, दो टेक्निशियन्स, दो सेक्रेटेरिएट स्टाफ के साथ एक कॉटेज अस्पताल के तौर पर शुरुआत की थी. आज मुझे गर्व है कि हम देश के अच्छे इंस्टीट्यूट में शामिल हैं. 30 फीसद मरीज़ों का हम एकदम मुफ्त में इलाज करते हैं. 40 फीसद मरीज़ों से हम पैसे लेते हैं. बाकी बचे 30 फीसद मरीज़ों से पैसे तो लेते हैं, लेकिन काफी कम."


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डॉक्टर शांता चाहती थीं कि कैंसर को लेकर ज्यादा से ज्यादा रिसर्च की जाए. (फोटो- वीडियो स्क्रीनशॉट)

डॉक्टर शांता ने जिस समय मेडिकल की पढ़ाई की, डॉक्टर बनीं, उस दौरान लड़कियों को लेकर लोगों की एक ही सोच थी, ये कि इन्हें पढ़ाकर क्या करेंगे, इन्हें तो शादी करके घर संभालना है. शांता के पास भी ये ऑप्शन था, लेकिन उन्होंने इसे नहीं चुना. डॉक्टर शांता का कहना था कि आपका काम बोलता है. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था,

"शुरुआत में लोगों का सपोर्ट मिलना और डोनेशन मिलना आसान था. क्योंकि हमारे पास डॉक्टर मुथुलक्ष्मी का साथ था. लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, मैंने सीखा कि आपकी पारदर्शिता और कोशिश आपकी मदद करती है. आपकी कमाई मरीज़ की संतुष्टी से मापी जानी चाहिए, न कि पैसों से."

एक इंटरव्यू में डॉक्टर शांता से सवाल किया गया कि वो खाली समय में क्या करती हैं. जवाब में उन्होंने कहा,

"इंस्टीट्यूट की बेहतरी के लिए बहुत कुछ सोचना-करना होता है, ऐसे में मुझे कुछ और सोचने का वक्त ही नहीं मिलता. मेरे पास कोई 'व्यक्तिगत' वक्त नहीं है. लेकिन जब भी थोड़ा वक्त मिलता है, मैं किताबें पढ़ती हूं. कभी-कभी गानें सुनती हूं, खासतौर पर क्लासिकल म्यूज़िक."

डॉक्टर शांता ने उस वक्त कैंसर के इलाज की दुनिया में कदम रखा था, जब भारत में इसे लेकर अच्छा इलाज क्या, ठीक-ठाक जानकारी ही नहीं थी. लोगों को लगता था कि कैंसर हुआ, मतलब इलाज मौत ही है. वी शांता का मानना था कि कैंसर को लेकर ज्यादा से ज्यादा रिसर्च होनी चाहिए. 2015 में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था,

"कैंसर के बचाव पर ज़ोर दिया जाना चाहिए. कैंसर को लेकर इंश्योरेंस होना चाहिए. फिजिशियन्स की ट्रेनिंग होनी चाहिए. रिसर्च ज्यादा से ज्यादा होनी चाहिए. ये चार चीज़ें होनी ही चाहिए. लोगों को समय-समय पर अपना चेकअप करवाना चाहिए, ताकि कैंसर का पता शुरुआती स्टेज में ही लग जाए. ऐसे में मरीज़ को ठीक करना ज्यादा मुमकिन रहता है."

वी शांता को पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और मैग्सेसे अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था. उनका कहना था कि अवॉर्ड आपके कामों को मान्यता देने का एक ज़रिया है, इसका ये मतलब नहीं कि आपका काम खत्म हो गया. ये एक इंस्पीरेशन है, जो हमसे कहती है कि अभी तो और आगे जाना है.

डॉक्टर शांता से और उनके इंस्टीट्यूट में इलाज करवाने के लिए देश के कोने-कोने के लोग जाते हैं. 19 जनवरी की सुबह वाकई उन मरीज़ों के लिए पीड़ादायक रही होगी, जो इस उम्मीद में कि डॉक्टर शांता उनका इलाज करेंगी, दूर घर से अस्पताल आए थे.


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