The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Oddnaari
  • What is 'me time' and why is particularly important for women?

घरेलू महिलाओं को क्यों होती है इतनी घबराहट और बेचैनी?

इस बेचैनी का उपाय क्या है?

Advertisement
pic
8 दिसंबर 2021 (अपडेटेड: 7 दिसंबर 2021, 04:49 AM IST)
Img The Lallantop
औरतों के लिए 'मी टाइम' एक शर्म की तरह हो जाता है, जैसे वो अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रही हैं
Quick AI Highlights
Click here to view more
कल शाम काम ख़त्म करके घर जा रही थी. कैब में बैठते ही दफ्तर के एक साथी का मैसेज आ गया. छोटा सा काम था, इसलिए मैंने सोचा रास्ते में ही कर लेती हूं. मैंने कैब में ही लैपटॉप खोल लिया और मेल खोलकर देखने लगी. इत्ते में खाना बनाने वाली दीदी का फ़ोन आ गया. सब्ज़ी क्या बनाऊं दीदी? उनका सवाल सुनते ही दिमाग आर्टिकल से निकलकर सीधे फ्रिज टटोलने लगा. क्या सब्ज़ी रखी होगी, पालक पहले ख़राब होगी या मेथी, क्या पहले बनवाया जाए ये कैलकुलेट करने लगी. जैसे ये सब प्रोसेस हुआ, रूममेट का कॉल आ गया. कहने लगी रास्ते में ही हो तो मुझे भी पिक कर लो. एक साथ काम के बाद काम और दिमाग में ऑफिस के टास्क की अलग टेंशन. इन सब के कारण अजीब सी घबराहट होने लगी. वो होता है न अजीब सी बेचैनी. जैसे ट्रैन छूटने के डर से होती है. और हम भाग भाग कर सब काम करते हैं उस वक़्त. अंग्रेजी में जिसे एंक्शियस होना कहते हैं और ये फीलिंग हर किसी को होती है. कभी ना कभी. किसी ना किसी पॉइंट पर.

क्या है ये घबराहट?

जिस घबराहट, बेचैनी या एंक्शियस फीलिंग के बारे में हम बात कर रहे थे, वो हर किसी को होती है. आसान भाषा में कहूं तो लगातार चल रही चिंताओं के कारण हम ऐसा महसूस करते हैं. स्ट्रेस्ड फील करते हैं. और यही छोटी छोटी बातों के कारण होनी वाली चिंताएं पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज़्यादा है. और केवल नौकरी करने वाली महिलाओं में नहीं बल्कि घर संभालने वाली महिलाएं भी इससे बहुत परेशान रहती हैं.
आत्म संवाद
अकेले समय बिताना, आत्म संवाद करना जीवन के हर आयाम के लिए ज़रूरी है (सांकेतिक तस्वीर)

मैं ये बिलकुल नहीं कह रही कि पुरुषों को ये दिक्कत नहीं होती. उन्हें भी होती ही. पर उनके मुकाबले ये फीलिंग महिलाओं में ज़्यादा होती है. लगातार उनके दिमाग में कुछ न कुछ चलता ही रहता है. मसलन आप अपने आस पास देखिए. आपके आस पास की लड़कियों के दिमाग में यही चलता रहेगा दूध से मलाई निकालनी है, ये वाला सामान खत्म हो गया है, धुले हुए बर्तन जमाने हैं, सूखे हुए कपड़े उठाने है और न जाने क्या क्या. एक काम करते हुए वो 4 और कामों के बारे में सोचते रहती हैं.
मेरी मम्मी स्कूल में पढ़ाती हैं. रोज़ 4 बजे फ़ोन कर के पापा को याद दिलाती हैं कि बचा हुआ खाना फ्रिज में रख देना. बरतन खाली कर के धोने रख देना. शाम को दीदी आएंगी. ये रूटीन है. पापा मम्मी के बिना कहे भी ये काम कर देते हैं. कभी कभार भूल जाएं तो बात अलग है. लेकिन मम्मी उन्हें याद दिलाना कभी नहीं भूलतीं.
हमारी साथी हैं कुसुम. उनसे मैं एक बार इस बारे में बात कर रही थी. उन्होंने मुझे बताया कि उनके साथ भी एकदम ऐसा ही होता है. उन्हें घर पर और भी लोग साथ रहते हैं और वो भी बराबर समझदार है. लेकिन मौसम ख़राब दिखते ही या बारिश होते ही वो एक बार ये पूछने कॉल कर ही लेती हैं कि कपड़े उठा लिए या नहीं. और हर बार सूखे हुए कपड़े पहले ही उठ चुके होते हैं, पर मन कभी नहीं मानता. कॉल कर के पूछ लेने के बाद ही सुकून मिलता है.
एंग्ज़ाइटी
एंग्ज़ाइटी जेंडर न्यूट्रल मामला है. ये एक्सट्रा बोझ के कारण हो सकता है. (सांकेतिक तस्वीर)

आपलोग अपने आस पास देखिए. अपने घर की लड़कियों और महिलाओं को देखिये. आपको सभी में सेंस ऑफ़ रिस्पांसिबिलिटी बहुत ज़्यादा दिखेगी. सभी में ओन करने की टेंडेंसी ज़्यादा होती है. मतलब दूसरों पर वो पूरी तरह भरोसा नहीं कर पातीं कि उन्होंने उस काम को उतनी ही ज़िम्मेदारी से निभाया होगा. और इस कारण वो लगातार व्यस्त रहती हैं. कई बार चिड़चिड़ा जाती हैं. दुःखी या उदास भी हो जाती हैं. और अगले दिन से फिर उसी रूटीन में लग जाती हैं. मेरे आस पास की ज़्यादातर महिलाओं को मैंने कभी अपने लिए वक़्त निकालते नहीं देखा. 'Me Time' लेते नहीं देखा. कुछ को तो पता भी नहीं दे बला क्या है.
 

मी टाइम क्या बला है?

'Me Time' आपका वो टाइम होता है जिसमें आप खुद के लिए वक़्त निकालती है. वो वक़्त आपका होता है. जिसमें आप जो जी चाहे वो करती हैं. उसमें आप आराम कर सकती हैं, सो सकती हैं, कुछ पढ़ सकती हैं या वो कर सकती हैं जिससे आपको ख़ुशी मिलती है. बेसिकली आप खुद के लिए, खुद के आराम के लिए वो वक़्त निकालती हैं.
ज़रा याद करिये, आपने या आपकी आस पास की महिला ने कब खुद के लिए वक़्त निकाला. जिसमें आपने अपना ख्याल रखा हो, सिर्फ अपनी ख़ुशी या आराम के लिए कुछ किया हो. हम जानते हैं माओं को बच्चों के लिए, परिवार के लिए काम कर के ख़ुशी और सुकून भी मिलता है. But ladies, you deserve break for yourself.
और ये सभी के लिए ज़रूरी है. काम वाली दीदी से लेकर ऑफिस में काम करने वाली कलीग और हमारी घर की मां, दादी, मासी, बुआ, हर महिला. सभी को अपने लिए वक़्त निकालना चाहिए. ये सिर्फ मैं नहीं डॉक्टर भी कहती हैं. क्यों कहती हैं ऐसा आप खुद ही सुनिए -
"मर्दों के मुक़ाबले औरतों में डिप्रेशन रेट दोगुना पाया जाता है. हमारे समाज में औरत को एक जननी माना गया है, जिसका फ़र्ज़ है दूसरों के बारे में सोचना, दूसरों का खयाल रखना. और अगर कहीं वो अपने बारे में सोचने लगे, तो दूसरे ही नहीं, वो ख़ुद को भी सेलफिश मानने लगती हैं. एक औरत मल्टीपल रोल प्ले करती है, चाहे वो गृहणी हो या वर्किंग वुमन. उसे अपने सारे रोल्स को बखूबी निभाना पड़ता है. औरों की अपेक्षा के लिए भी और अपनी भी. ज़िंदगी की इस जद्दोजहद में उसे पता भी नहीं चलता कि वो कब स्ट्रेस्ड हो गई है, जब तक ब्रेकिंग पॉइंट्स नहीं आ जाते. जब तक वो डिप्रेशन या एंग्ज़ाइटी का शिकार नहीं हो जाती.
इसके लिए ज़रूरी है कि वो मी टाइम निकालें. मी टाइम एक तरह की मेडिसिन की जैसी है. मी टाइम एक तरह की एनर्जी है जो आपको दोबारा लड़ने की ताक़त देती है. आपको प्रोत्साहित करती है कि आप जीवन की परेशानियों के साथ फिर लड़ सकें. मी टाइम, एक वो समय है जो आप सिर्फ़ अपने लिए निकालते हैं. अपनी सोच और वैल्यू सिस्टम के साथ कनेक्ट करने के किए. अपनी ज़िंदगी, रिश्तों, सेहत के बारे में सोचने के लिए."
काम वाली दीदी छुट्टी तब लेती हैं जब उनके बच्चे बीमार हों या परिवार के साथ गांव जाना हो या कोई त्योहार हो. कभी भी अपने लिए, अपने आराम के लिए मैंने उन्हें छुट्टी लेते नहीं देखा. घर का कोई सदस्य बीमार को जाये तो हम उसका ख्याल रखने तुरंत छुट्टी ले लेते हैं. पर अपने मी टाइम के लिए छुट्टी लेने के बारे में सोचना भी गुनाह लगता है. ऐसा लगता है कि आप काम के साथ बेमानी कर रहे हैं.
हाउस हेल्प
जितना आपको ऑफ़-डे प्रिय है, उतना ही आपकी हाउस हेल्प को होगा

हमारे घर की महिलायें परिवार की शादी में जाने के लिए छुट्टी ले लेती हैं या समय निकाल लेती हैं पर कभी अपनी बचपन की दोस्त जो उसी शहर में रहती है उससे मिलने के लिए वक़्त नहीं निकाल पातीं. ये तो सिर्फ कुछ उदाहरण थे जो मैंने अपने आस पास देखे. आप भी ज़रा ठहर कर अपने आस पास की महिलाओं को देखिये. पूछिए उनसे कि कब उन्होंने खुद के लिए वक़्त निकाला था. मा टाइम की वैल्यू या उसका एफेक्ट उनसे पूछिए जो खुद के लिए वक़्त निकालते है. वो बतायेंगे आपको छोटा सा वो समय कितना सुकून देता है.
रोज़ भले 10 मिनट दें खुद को या महीने में एक दिन खुद के लिए निकालें. खुद भी निकालिए और अपने आस पास वालों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करिये. वैसे ही उन्हें बच्चों को भी थोड़ी देर अकेला छोड़ना चाहिए, उन्हें भी उनका मी टाइम देना चाहिए. जिससे वो अच्छे से दूसरों से कनेक्ट हो पाएंगे. ये आप सभी के लिए ज़रूरी है. अगर बच्चा पूरा समय सिर्फ आपके साथ ही बिताएगा तो वो इमोश्नली आप पर निर्भर हो जाएगा, जो कि सही नहीं है.आप खुद खुश रहेंगे तभी अपने आस पास वालों को रख सकेंगे
आपकी क्या राय है इसपर मुझे कमेंट सेक्शन में बताइये.

Advertisement

Advertisement

()